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पूरी दुनिया कर्ज के संकट में, अमीर देश ही इसे दूर करने में कर सकते हैं मदद

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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022 (19:46 IST)
ग्लासगो। दुनियाभर के देश ऋण संकट की ओर बढ़ रहे हैं। आर्थिक मंदी और बढ़ती मुद्रास्फीति ने खर्च सीमा बढ़ा दी है जिससे कई सरकारों के लिए अपने बकाया पैसे का भुगतान करना लगभग असंभव हो गया है। सामान्य समय में वे देश पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज ले सकते थे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने ऐसा करना और भी मुश्किल बना दिया है। नतीजतन कुछ देश अपना कर्जा चुकाने की निर्धारित समय सीमा तक इसे चुका नहीं पाएंगे।
 
श्रीलंका और जाम्बिया पहले ही भुगतान न करने वाले देशों में अपना नाम लिखवा चुके हैं। दोनों देश आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और आने वाले समय के विश्व की तस्वीर पेश कर रहे हैं। इस चिंताजनक परिदृश्य का एक मुख्य कारण यह है कि दुनियाभर के देश अनिवार्य रूप से अमेरिकी डॉलर या यूरो में पैसा उधार लेने और भविष्य के ऋण भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा भंडार रखने के लिए मजबूर हैं।
 
लेकिन उन भंडारों को अन्य महत्वपूर्ण मांगों का सामना करना पड़ता है। उन्हें तेल और अन्य आयात खरीदने और अपनी घरेलू मुद्रा के विश्वसनीय मूल्य को बनाए रखने की आवश्यकता होती है। दुर्भाग्य से कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उनके पास जो भंडार है, वह इन सभी मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, विशेष रूप से ऊर्जा की कीमतें बढ़ने के बाद जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया।
 
साथ ही विदेशी मुद्राओं में खरीदना अधिक महंगा हो गया है, क्योंकि यूएस फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं। ऐसी खबरें हैं कि श्रीलंका के पास कोई भंडार नहीं बचा है जबकि कहा जाता है कि पाकिस्तान महीने-दर-महीने आधार पर अपना काम चला रहा है।
 
देश आमतौर पर पुराने ऋण को आगे बढ़ाने के लिए नए बॉण्ड जारी करते हैं (उन्हें व्यापारयोग्य आईओयू के रूप में सोचते हैं)। यह प्रक्रिया तब तक ठीक काम करती है, जब तक कि इसमें कोई समस्या नहीं आती। जुलाई 2022 में किसी भी उभरते हुए देशों ने कोई नया बॉण्ड जारी नहीं किया, जो दर्शाता है कि निवेशक कम मुद्रा भंडार के जोखिम से चिंतित हैं और अब उन्हें उधार देने में कोई दिलचस्पी नहीं है।
 
चीन ने भी वैश्विक जोखिम को देखते हुए अपने जोखिम को सीमित रखने के लिए महामारी की शुरुआत के बाद से अपने ऋण को कम कर दिया है इसलिए बॉण्ड बाजार या चीन के बिना, देश ऋण के वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख कर रहे हैं। उदाहरण के लिए केन्या और घाना ने हाल ही में बजट की कमी को दूर करने के लिए बैंक ऋण लिया।
 
और जबकि इन ऋणों की सटीक शर्तें ज्ञात नहीं हैं, बैंक आमतौर पर उच्च ब्याज दरों और कम अवधि में भुगतान की मांग करते हैं, जो केवल देश के वित्तीय तनाव के स्तर को बढ़ा सकता है। अन्य देश कुछ तेल-समृद्ध खाड़ी देशों की ओर रुख कर रहे हैं, जो वर्तमान में उच्च ऊर्जा कीमतों से फायदा उठा रहे हैं। मिस्र और पाकिस्तान को सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर से कर्ज मिला है जबकि तुर्की ने भी यूएई से कर्ज लिया है।
 
ये ऋण स्वागतयोग्य जीवनरेखा हो सकते हैं, लेकिन वे अमीर देशों के लिए अपना प्रभाव बढ़ाने और निर्भरता उत्पन्न करने के अवसर भी पैदा करते हैं। कुल मिलाकर दुनिया के कुछ सबसे गरीब और कर्जदार देशों के खिलाफ कई कारक काम कर रहे हैं।
 
यदि वैश्विक ऋण संकट उत्पन्न होता है तो उसके बाद राजनीतिक उथल-पुथल की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। श्रीलंका की चूक का व्यापक विरोध हुआ जिससे राष्ट्रपति को इस्तीफा देना पड़ा। और शोध से पता चलता है कि चरमपंथी दल वित्तीय संकट के बाद बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
 
तरलता और पारदर्शिता : लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे परिदृश्य से बचने में मदद करने में देर नहीं हुई है। सबसे पहले अमेरिका और यूरोपीय संघ को अपनी ब्याज दरों में वृद्धि को धीमा करना चाहिए। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी, अमेरिका और यूरोपीय संघ की ब्याज दरों में वृद्धि दुनियाभर में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को कम करती है और इसकी वजह से देशों के विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो रहे हैं।
 
यह भी स्पष्ट नहीं है कि ब्याज दरों में ये बढ़ोतरी घरेलू मुद्रास्फीति की समस्याओं का समाधान कर रही है। यदि धनी देश वैश्विक ऋण संकट को बढ़ाए बिना मुद्रास्फीति को कम करना चाहते हैं तो उन्हें व्यापार बाधाओं को कम करना चाहिए, जो कृत्रिम रूप से कीमतें बढ़ाते हैं।
 
उदाहरण के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों आयातित कृषि उत्पादों पर शुल्क लगाते हैं जिससे उनके उपभोक्ताओं के लिए भोजन की कीमत बढ़ जाती है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) को अपने आपातकालीन ऋण से जुड़ी मितव्ययिता आवश्यकताओं को कम या नरम करना चाहिए। उदाहरण के लिए जाम्बिया के नए आईएमएफ सौदे के लिए ऐसे समय में ईंधन और भोजन पर कम सरकारी सब्सिडी की आवश्यकता होती है, जब कीमतें बढ़ रही हों।
 
ये नीतियां राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय हैं और इसके बजाय देशों को चीन और तेल समृद्ध देशों से मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। जिन देशों को आईएमएफ से उधार लेने पर मजबूर होना पड़ता है, वे चरमपंथी राजनीतिक तत्वों को प्रोत्साहित करने के जोखिम का सामना करते हैं। यह समय रूढ़िवादी राजकोषीय आवश्यकताओं को आगे बढ़ाने का नहीं है जिनकी प्रभावशीलता संदिग्ध है।
 
इसके बजाय आईएमएफ को इन कठिन आर्थिक परिस्थितियों के दौरान वैश्विक तरलता को प्राथमिकता देनी चाहिए। अंत में चीन को ऋण वार्ता में अग्रणी व पारदर्शी भूमिका निभानी चाहिए। कर्ज की समस्या का सामना कर रहे कई देशों पर चीन का पैसा बकाया है, यह प्रक्रिया अक्सर गोपनीय होती है।
 
उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि चीन, जाम्बिया के साथ कर्ज के संबंध में वार्ता में भाग लेने के लिए सहमत हो गया है लेकिन श्रीलंका में ऐसा नहीं किया है। चीन ने पाकिस्तान और अर्जेंटीना को आपातकालीन ऋण और ऋण राहत प्रदान की है, हालांकि इस सहायता की प्रभावशीलता या सीमा अज्ञात है।
 
अधिक पारदर्शी दृष्टिकोण वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता को कम करेगा और अन्य लेनदारों को चीन के साथ समन्वय करने में मदद देगा। हालांकि इस बिंदु तक चीन का उधार पारदर्शी नहीं रहा है, लेकिन अधिक स्पष्टता से चीन के विदेशी निवेश के साथ-साथ वैश्विक ऋण बाजार को भी लाभ होगा। वैश्विक समुदाय को एक और वैश्विक आर्थिक संकट को रोकने के लिए मिलकर काम करना चाहिए और लाखों लोगों को अनावश्यक पीड़ा से बचाने में मदद करनी चाहिए।
 
Edited by: Ravindra Gupta(भाषा)

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