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कुंडली, मकान और शरीर, जानिए भविष्य बदलकर करोड़पति बनाने वाली जानकारी

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अनिरुद्ध जोशी

एक घर कुंडली में होता है और दूसरा घर वह जिसमें आप रहते हैं। जिस तरह कुंडली में ग्रह होते हैं उसी तरह आपके घर में भी ग्रह होते हैं। जिस तरह आपके घर में ग्रह होते हैं उसी तरह आपके शरीर को यदि घर माने तो उसमें भी ग्रह होते हैं। इसका मतलब तीन घर हो गए- पहला वह घर जिसे कुंडली कहते हैं या जो आकाश के 360 डिग्री के 12 भागों में विभाजित है। दूसरा वह घर जिसमें आप और आपका परिवार रहता है और तीसरा वह घर जिसे शरीर कहते हैं, क्योंकि आप शरीर में ही तो रहते हैं। आओ अब जानते हैं इन तीनों को सुधारने का तरीका जिससे आपका भविष्य बदल जाएगा और सभी सुखों के साथ ही आप करोड़पति भी बन जाएंगे।
 
 
कुंडली के घर को कैसे सुधारे?
यहां लाल किताब अनुसार ग्रहों के कुछ सामान्य उपचार बताए जा रहे हैं। आपका जो ग्रह बुरा फल दे रहा है सिर्फ उसी का उपाय करना चाहिए। हालांकि यह कुंडली के किसी जानकार से पूछकर ही करें।
 
 
- सूर्य के लिए पिता का सम्मान करें और गुढ़, ताम्बा व गेंहू का दान करे। सूर्य को जल चढ़ाएं। सोना धारण करें।
- चन्द्र के लिए माता का सम्मान करें। चावल, दूध और चांदी का दान करे। प्रदोष का व्रत करे। चांदी धारण करें।
- मंगल के लिए भाई का सम्मान करें और सफेद या काला सुरमा आंखों में लगाए। मूंगा या पितल धारण करें।
- बुध के लिए बहन, बुआ, मौसी, विधवा महिला और कन्याओं का सम्मान करें। नाक छिदवाएं। पन्ना धारण करें।
- गुरु के लिए दादा, धर्म और गुरु का सामान्य करें। माथे पर पिला तिलक लगाएं। पीपल की जड़ में जल चढ़ाएं, चने की दाल का दान करे। पुखराज धारण करें।
- शुक्र के लिए पत्नी का सम्मान करें। अपने भोजन में से गाय को कुछ भाग दें। घी, कर्पुर, दही का दान करें। सुघंधित पदार्थो का प्रयोग करें। हीरा धारण करें।
- शनि के लिए काका, मामा आदि का सम्मान करें। कीकर की दातुन करें। कौवे को रोटी खिलाएं। छाया दान करें। जोड़ लगा हुआ लोहे का छल्ला या नीलम धारण करें।
- राहू के लिए संयुक्त परिवार में रहें। ससुराल से सम्बन्ध न बिगाड़े। जौ को दूध से धोकर बहते पानी में बहाएं। मुली का दान करे या कोयला बहते पानी में बहाएं। गोमेद धारण करें या जेब में चांदी की ठोश गोली रखें।
- केतु के लिए कान छिदवाएं और कुत्ते को रोटी खिलाते रहें। काले और सफेद तिल बहते पानी में बहाएं। तिल, नींबू और केले का दान करें।
 
 
घर को कैसे सुधारें?
कुंडली में ग्रह अच्छे हैं, लेकिन यदि आपके घर का वास्तु अच्छा नहीं है तो अच्छे ग्रह भी अच्छा असर देने वाले साबित हो इसकी गारंटी नहीं। यह भी तय नहीं कि वे बुरा फल देंगे या नहीं। दूसरी ओर अब यदि आपका घर वास्तु अनुसार है तो कुंडली में बैठे बुरे ग्रह बुरा फल देंगे इसकी गारंटी नहीं, लेकिन अच्छे घर से अच्छा फल जरूर मिलेगा। तो यदि संकट हो तो दोनों को ही दुरस्त करें।
 
 
- वास्तु अनुसार घर में चार कोण होते हैं, ईशान कोण, नैऋत्य कोण, आग्नेय कोण और वायव कोण। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। पूर्व दिशा के स्वामी सूर्य, देवता इंद्र होते हैं। पितृस्थान की प्रतिक यह दिशा खुली होना चाहिए। पश्चिम दिशा के देवता वरूण और ग्रह स्वामी शनि है। यह दिशा भी वास्तु नियमों के अनुसार होना चाहिए। उत्तर दिशा के देवता कुबेर और ग्रह स्वामी बुध है। यह माता का स्थान है। इसी दिशा को खाली रखना जरूरी है। दक्षिणी दिशा काल पुरुष का बायां सीना, किडनी, बाया फेफड़ा, आतें हैं एवं कुंडली का दशम घर है। यम के आधिपत्य एवं मंगल ग्रह के पराक्रम वाली दक्षिण दिशा पृथ्वी तत्व की प्रधानता वाली दिशा है। यह स्थान भी भारी होना चाहिए।
 
 
- घर का मुख्‍य द्वार सिर्फ पूर्व या उत्तर में होना चाहिए। हालांकि वास्तुशास्त्री मानते हैं कि घर का मुख्‍य द्वार चार में से किसी एक दिशा में हो। वे चार दिशाएं हैं- ईशान, उत्तर, वायव्य और पश्चिम। लेकिन हम यहां सलाह देंगे सिर्फ दो ही दिशाओं में से किसी एक का चयन करें। पूर्व इसलिए कि पूर्व से सूर्य निकलता है और पश्चिम में अस्त होता है। उत्तर इसलिए कि उत्तरी ध्रुव से आने वाली हवाएं अच्छी होती हैं और दक्षिणी ध्रुव से आने वाली हवाएं नहीं। घर को बनाने से पहले हवा, प्रकाश और ध्वनि के आने के रास्तों पर ध्यान देना जरूरी है।
 
 
- ईशान कोण जल एवं भगवान शिव का स्थान है और गुरु ग्रह इस दिशा के स्वामी है। ईशान कोण में पूजा घर, मटका, कुंवा, बोरिंग वाटरटैंक अदि का स्थान बान सकते हैं।
- आग्नेय कोण अग्नि एवं मंगल का स्थान है और शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी है। आग्नेय कोण को रसोई या इलैक्ट्रॉनिक उपकरण आदि का स्थान बना सकते हैं।
- वायव कोण में वायु का स्थान है और इस दिशा के स्वामी ग्रह चंद्र है। वायव कोण को खिड़की, उजालदान आदि का स्थान बना सकते हैं।
- नैऋत्य कोण पृथ्‍वी तत्व का स्थान है और इस दिशा के स्वामी राहु और केतु है। नैऋत्य को ऊंचा और भारी रखना चाहिए।
 
 
भूमि का ढाल : सूरज हमारी ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है अत: हमारे वास्तु का निर्माण सूरज की परिक्रमा को ध्यान में रखकर होगा तो अत्यंत उपयुक्त रहेगा। सूर्य के बाद चंद्र का असर इस धरती पर होता है तो सूर्य और चंद्र की परिक्रमा के अनुसार ही धरती का मौसम संचालित होता है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव धरती के दो केंद्रबिंदु हैं। उत्तरी ध्रुव जहां बर्फ से पूरी तरह ढंका हुआ एक सागर है, जो आर्कटिक सागर कहलाता है वहीं दक्षिणी ध्रुव ठोस धरती वाला ऐसा क्षेत्र है, जो अंटार्कटिका महाद्वीप के नाम से जाना जाता है। ये ध्रुव वर्ष-प्रतिवर्ष घूमते रहते हैं। दक्षिणी ध्रुव उत्तरी ध्रुव से कहीं ज्यादा ठंडा है। यहां मानवों की बस्ती नहीं है। इन ध्रुवों के कारण ही धरती का वातावरण संचालित होता है। उत्तर से दक्षिण की ओर ऊर्जा का खिंचाव होता है। शाम ढलते ही पक्षी उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं। अत: पूर्व, उत्तर एवं ईशान की और जमीन का ढाल होना चाहिए।

 
शरीर को कैसे सुधारें-
इसके लिए आयुर्वेद और योग सबसे उत्तम साधना है। कहते हैं कि पहला सुख निरोगी काया। यदि आपका शरीर अस्वस्थ है तो फिर सबकुछ व्यर्थ है।... हमारे शरीर पर ग्रहों का असर होता है। कहना चाहिए की शरीर में ग्रहों के स्थान नियुक्त है। यह समझे कि प्रत्येक ग्रह शरीर के भिन्न भिन्न स्थानों पर असर डालता है।
 
 
शरीर में मस्तक के बीचोबीच सूर्य का, नेत्रों में मंगल का, जिभ और दांत पर बुध का, वीर्य पर शुक्र का, नाभि पर शनि का, सिर और मुख पर राहु का, कंठ से लेकर हृदय तक एवं पैरों पर केतु का, हृदय पर चंद्र का और रक्त पर मंगल का प्रभाव पड़ता है। इसी तरह यदि हम देखें तो शरीर के भीतर जल पर चंद्र का, वायु पर गुरु का और हड्डी पर शनि का प्रभाव पड़ता है।
 
 
इसी तरह हाथों में कनिष्ठा बुध की, अनामिका सूर्य की, मध्यमा शनि की, तर्जनी गुरु की और अंगुठा शुक्र का है। अंगुठे के नीचे का स्थान भी शुक्र का है। अंगुलियों के प्रत्येक पोरे राशियों के स्थान है। चारों अंगुलियों में 12 पोर होते हैं। इसीलिए शरीर को स्वस्थ रखना इसीलिए जरूरी है कि ग्रहों का आप पर विपरित असर न हो।
 
 
एक और महत्वपूर्ण बात यह कि हम जो भोजन करते हैं उस भोजन में भी ग्रहों का प्रभाव होता है। जैसे दूध में चंद्र का, बेसन में मंगल और हल्दी में गुरु का प्रभाव होता है। इसीलिए हमें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खा चाहिए यह ध्यान देना जरूरी है। हिन्दू शास्त्रों में तिथि अनुसार भोज्य पदार्थों का सेवन या त्याग का वर्णन किया गया है।
 

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