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महिला क्रिकेटरों के साथ बीसीसीआई ने किया 'क्रूर मजाक'

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सीमान्त सुवीर

दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट संगठन बीसीसीआई ने 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की ठीक पूर्व संध्या पर भारतीय महिला क्रिकेटरों के साथ जो क्रूर मजाक किया है, वो आसानी से हजम नहीं हो पा रहा है...नए अनुबंध के तहत जहां विराट कोहली समेत 5 क्रिकेटरों को एक साल के लिए 7 करोड़ रुपए मिलेंगे तो वहीं दूसरी ओर महिला टीम की कप्तान मिताली राज समेत तीन खिलाड़ियों को केवल 50 लाख रुपए ही दिए जाएंगे.. बीसीसीआई ने विश्व कप की उपवजेता टीम की सितारा खिलाड़ियों को पुरुष टीम के सी ग्रेड के लायक भी नहीं समझा, जिनके बैंक खातों में 1-1 करोड़ रुपए आने वाले हैं... 
 
 
भारत में बड़े-बड़े मंचों से महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा देने की बातें करने वालों की सोच आज कितनी घटिया है, इसका प्रमाण 7 मार्च को बीसीसीआई की नई अनुबंध सूची से मिल गया। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अक्टूबर 2017 से सितंबर 2018 तक के लिए वार्षिक खिलाड़ी अनुबंध के लिए अपने तमाम खिलाड़ियों पर सालाना 125 करोड़ रुपए फीस के रूप में खर्च करने जा रहा है, लेकिन उसकी नजर में वो भारतीय महिला क्रिकेट स्टार आज भी तुच्छ हैं, जो इंग्लैंड में आयोजित आईसीसी विश्व कप में पिछले साल केवल 9 रन से विश्व विजेता बनते-बनते चूक गई थीं।
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आईसीसी विश्व कप भारतीय महिला क्रिकेट के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ और इसके बाद से ही हमारी लड़कियां विदेशी जमीन पर लगातार जीत का परचम लहरा रही हैं। आप ये जानकार हैरान रह जाएंगे कि महिला विश्व कप में भारत ने कोई मैच नहीं हारा और फाइनल में वह इंग्लैंड से भले हार गई, लेकिन उनकी इस शानदार कामयाबी को 19 करोड़ भारतीय दर्शकों ने देखा। अक्षय कुमार तो तिरंगे के साथ स्टेडियम के भीतर थे तो अमिताभ बच्चन सोशल मीडिया पर इन लड़कियों की पीठ थपथपा रहे थे। विराट और धोनी से लेकर नरेंद्र मोदी तक ने भारतीय महिला टीम की सफलता को सलाम किया था...
 
 
सिर्फ तालियां और पीठ थपथपाने से चूल्हा नहीं जलता और न ही पेट की भूख शांत होती है.. महिला टीम के विश्व कप उपविजेता बनने के बाद उन्हें पुरुषों की तुलना में मैच फीस मिलने की बातें हवा में तैरने लगी थीं। यदि बीसीसीआई महिला क्रिकेटरों को पुरुषों के बराबर का दर्जा नहीं दे सकता तो कम से कम उनके अनुबंध में सम्मानजनक राशि तो दे ही सकता था। भारत में पुरुष और महिला में किस तरह जमीन-आसमान का अंतर है, उसे ये आंकड़ें बयां करते हैं।
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पुरुष क्रिकेटरों में 5 को 'ए प्लस' के तहत 7 करोड़, 'बी' ग्रेड में 3 करोड़ रुपए और 'सी' ग्रेड में 1 करोड़ रुपए का अनुबंध है, जबकि महिला में ग्रेड 'ए' में 50 लाख रुपए, ग्रेड 'बी' में 30 लाख रुपए और ग्रेड 'सी' में 10 लाख रुपए देने का प्रावधान किया है।

भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज, स्टार गेंदबाज झूलन गोस्वामी, स्टार बल्लेबाज हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना को बीसीसीआई ने पुरुषों के सी ग्रेड में दिए जाने वाले रुपए के लायक भी नहीं समझा। भारतीय बेटियों के साथ बीसीसीआई का यह मजाक ठीक उस रोज की पूर्व संध्या पर किया है, जब अगले दिन पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रही है...
 
 
महिलाओं के साथ किए जाने वाले भेदभाव में भारत अकेला देश नहीं है। जनवरी 2018 में ही बीबीसी की चीन की संपादक कैरी ग्रेसी ने यह कहकर अपना इस्तीफा दे दिया था कि यहां पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले महिला कर्मचारी को कम वेतन दिया जाता है। याद दिलाना जरूरी है कि कैरी बीबीसी में 30 साल से काम कर रही थीं और लैंगिक भेदभाव के कारण आखिरकार उनका गुस्सा फूट ही पड़ा।
 
 
दो साल पहले ऑस्ट्रेलिया में एक सर्वे हुआ था, जिसमें सामने आया था कि ऑस्ट्रेलिया में एक शीर्ष स्तर की महिला प्रबंधक अपने पुरुष समकक्ष के मुकाबले औसतन 1 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (73 हजार डॉलर) कम वेतन पाती हैं। महिलाओं को समान दर्जा देने की बातें करना आसान है, लेकिन इस पर जब अमल करने की बात आती है तो पुरुष प्रधान समाज की त्योरियां चढ़ जाती हैं।
 
डाइचे वैले की रिपोर्ट : डाइचे वैले की रिपोर्ट को यहां शामिल करना प्रासंगिक है। आइसलैंड में कानून बनाया गया है, जिसके तहत महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन देना होगा। दुनियाभर में वेतन के मामले में लैंगिक असमानता को देखते हुए यह कदम एक उम्मीद की किरण है। 
 
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) का कहना है कि आइसलैंड दुनिया में सबसे ज्यादा लैंगिक समानता वाला देश है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसरों और राजनीतिक सशक्‍तीकरण के क्षेत्र में मौजूद अंतर के विश्लेषण के आधार पर यह बात कही गई है। दूसरी तरफ यमन की स्थिति इस मामले में सबसे खराब है। 
 
दुनियाभर में महिलाओं का सालाना औसत वेतन 12 हजार डॉलर है, जबकि पुरुषों का औसत वेतन 21 हजार डॉलर है। डब्ल्यूईएफ का कहना है कि वेतन के मामले में समानता कायम करने के लिए दुनिया को 217 वर्ष लगेंगे। वेतन में अंतर को पाटने के लिए ब्रिटेन की जीडीपी में अतिरिक्त 250 अरब डॉलर, अमेरिका की जीडीपी में 1750 अरब डॉलर और चीन की जीडीपी में 2.5 ट्रिलियन डॉलर डालने होंगे।
 
 
2017 के दौरान महिला और पुरुषों के बीच प्रति घंटा मेहनताने का अंतर 20 वर्ष के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। सरकारी आकंड़ों के मुताबिक, एक फुल टाइम पुरुष कर्मचारी ने महिला कर्मचारियों की तुलना में 9.1 प्रतिशत ज्यादा वेतन पाया। आर्थिक भागीदारी और अवसरों के मामले में जो देश टॉप पर है उनमें बुरुंडी, बारबाडोस, बहामास, बेनिन और बेलारूस शामिल हैं।
 
डब्ल्यूईएफ के मुताबिक, इन सभी देशों में महिला और पुरुषों के बीच आर्थिक अंतर 20 प्रतिशत से कम है। इस मामले में जिन पांच देशों की स्थिति सबसे खराब है, उनमें सीरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, यमन और ईरान शामिल हैं। वहां आर्थिक लैंगिक अंतर कम से कम 65 प्रतिशत है। विश्व स्तर पर वरिष्ठ प्रबंधकीय पदों पर सिर्फ 22 प्रतिशत महिलाएं हैं। 
 
यूरोपीय आयोग ने अंतर को कम करने के लिए नवंबर 2017 में एक दो वर्षीय योजना का प्रस्ताव रखा था। पिछले पांच साल के दौरान इस मामले में यूरोपीय संघ में कोई खास प्रगति नहीं हुई। यहां महिलाएं पुरुषों के मुकाबले प्रति घंटा 16.3 प्रतिशत कम कमाती हैं यानी आप कितना भी जोर लगा लें, लेकिन पुरुषों की तुलना में महिलाओं की प्रतिभा को कम ही आंका जाएगा, फिर चाहे वह भारत देश हो या दुनिया के अन्य देश, महिलाओं का शोषण बदस्तूर जारी है...

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