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बिहार में शिशु मृत्युदर में कमी लेकिन कम नहीं हो रहा कुपोषण

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मंगलवार, 16 नवंबर 2021 (07:42 IST)
बिहार नवजात शिशुओं को सुरक्षित रखने में तो सफल हुआ है, किंतु उनके पोषण के मामले में अभी भी काफी पीछे है। राज्य में शिशु मृत्युदर (IMR) प्रति हजार 29 है तो दूसरी ओर यहां के 41 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
 
बिहार में शिशु मृत्युदर के मामलों में बीते दस सालों में 23 अंकों की कमी आई है। सैम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार अब यह आंकड़ा 2009 के 52 से घटकर 2019 में प्रति हजार 29 पर आ गया है। किंतु कुपोषण के मामले में स्थिति भयावह है।
 
देशभर में कुपोषित बच्चों की संख्या महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात में सर्वाधिक है। बिहार में पांच साल से कम उम्र के 41 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। सभी आयु वर्ग के बच्चों को यदि शामिल करें तो यह आंकड़ा 42।9 फीसद पर पहुंच जाता है। कोरोना महामारी के कारण इस आंकड़े में और वृद्धि होने की संभावना है।
 
कोरोना काल में आईएमआर में आई इस कमी को राज्य सरकार बड़ी उपलब्धि मानते हुए इसे स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में किए व्यापक प्रयासों का परिणाम मानती है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय कहते हैं, ‘‘कोरोना महामारी के दौरान आईएमआर को बढ़ने से रोक पाना एक बड़ी चुनौती थी। संक्रमण की चुनौतियों के बीच शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है।''
 
नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए उनके संपूर्ण टीकाकरण, नियमित स्तनपान व समुचित पोषण जैसे उपाय बेहतर साबित हुए हैं। राज्य में स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव संबंधी विभिन्न सुविधाओं की मौजूदगी तथा विभाग द्वारा चलाए जा रहे गृह आधारित नवजात देखभाल, कमजोर नवजात देखभाल कार्यक्रम, संस्थागत प्रसव व स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट की वजह से स्थिति में काफी सुधार हुआ है।
 
वहीं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 (वर्ष 2019-20) के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में नवजात मृत्युदर (एनएनएमआर) 34.5, शिशु मृत्युदर (आईएमआर) 46.8 तथा बाल (अंडर फाइव एमआर) मृत्युदर 56.4 प्रतिशत है। एक रिपोर्ट के अनुसार एक हजार में करीब 25 बच्चों की जान 28 दिनों की भीतर ही चली जाती है।
 
ये 28 दिन बच्चों के विकास के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी कड़ी में 15 नवंबर से राष्ट्रीय नवजात शिशु सप्ताह मनाया जा रहा है, ताकि नवजातों को आयुष्मान बनाया जा सके। इस दौरान शिशु स्वास्थ्य के साथ लोगों को उनकी बेहतर देखभाल के बारे में जागरूक किया जाएगा। साथ ही आशा दीदियों को भी संस्थागत प्रसव के पहले दिन के बाद से ही प्रसूता के घर का भ्रमण कर नवजात के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसके साथ ही स्पेशल न्यूबोर्न केयर यूनिट के संचालन तथा न्यूबोर्न केयर कॉर्नर को बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों की टीम जिले के अस्पतालों का दौरा करेगी।
 
आशा दीदियों की महत्वपूर्ण भूमिका
केंद्र या राज्य स्तर पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित कार्यक्रमों का लाभ गर्भवतियों व नवजातों तथा शिशुओं तक पहुंचाने में आशा (एक्रीडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) दीदियों की बड़ी भूमिका है। राज्य की करीब 92 हजार से अधिक आशा कार्यकर्ता तथा आशा फैसिलिटेटर को गृह आधारित नवजात देखभाल (एचबीएनसी) को और सशक्त बनाया गया है।
 
बीते अगस्त माह में इन्हें डिजिटल वॉच, डिजिटल थर्मामीटर, फीडिंग स्पून, वेइंग स्केल, टार्च व बेबी ब्लैंकेट रखी एक किट दी गई ताकि घर पर नवजात की जांच के पश्चात किसी तरह का लक्षण दिखने पर उसे तत्काल स्वास्थ्य केंद्रों पर भेजा जा सके। विदित हो कि शहरी बच्चों की तुलना में ग्रामीण इलाके में नवजात (28 दिन से कम आयु के), शिशु (365 दिन की आयु वर्ग के) तथा बाल (एक से पांच साल तक की उम्र के) मृत्युदर अधिक पाई गई है।
 
एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में संस्थागत प्रसव की संख्या चार वर्षों में 64 से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गई है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की मुफ्त व्यवस्था की गई है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चा जनने वाली महिलाओं को 1400 रुपये बतौर प्रोत्साहन राशि दी जाती है तथा संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्हें स्वास्थ्य केंद्र लाने वाली आशा दीदी को भी 600 रुपये दिए जाते हैं।
 
नहीं घट रहा कुपोषण
दुनियाभर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का मुख्य कारण कुपोषण को माना गया है। शोध अध्ययनों से परिलक्षित होता है कि समुचित पोषण का अभाव बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है, जिससे ऐसे बच्चे विभिन्न संक्रामक रोगों की चपेट में जल्द आ जाते हैं।
 
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) -5 (वर्ष 2019-20) के आंकड़ों के मुताबिक बीते पांच वर्षों में देश के अधिकांश राज्यों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण के मामले बढ़े हैं। जानकार बताते हैं कि जन्म के बाद छह माह तक केवल मां का दूध और छह माह के बाद मां के दूध के अलावा ऊपरी आहार बच्चों के लिए जरूरी है। कम ही बच्चों को सही व पर्याप्त मात्रा में ऊपरी आहार मिल पाता है और वे अंतत: कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।
 
बड़ी संख्या में महिलाएं हैं एनीमिक
जाहिर है, बच्चों के स्तनपान के लिए मां का स्वस्थ व पूर्ण पोषित होना जरूरी है। किंतु, एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के अनुसार बच्चों के साथ ही गर्भवती महिलाओं में खून की कमी जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ रहीं हैं। राज्य के 23 फीसद बच्चों का वजन उनकी आयु तथा लंबाई के अनुसार नहीं बढ़ पाता है।
 
विशेषज्ञों के अनुसार पतलेपन वाला कुपोषण सबसे अधिक खतरनाक है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में कुपोषण के मामले में सबसे अव्वल जिला शिवहर है जहां कुपोषित बच्चों की संख्या मे 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 17 प्रतिशत वृद्धि के साथ जहानाबाद दूसरे तथा 12 फीसद बढ़ोतरी के साथ रोहतास तीसरे स्थान पर है। इसी तरह शरीर में रक्त की कमी के मामले में नालंदा सबसे ऊपर है जहां एनीमिक मरीजों की संख्या में पिछली रिपोर्ट की तुलना में बीते चार सालों में छह प्रतिशत वृद्धि हुई है। दूसरे नंबर पर जमुई है।
 
जाहिर है इस स्थिति में गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि स्वस्थ बच्चे जन्म ले सकें। एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में छह माह से चार साल नौ महीने तक के 69 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है, जबकि 15 से 49 साल की 63।5 फीसद महिलाएं एनीमिक हैं। वहीं इसी आयुवर्ग की गर्भवती महिलाओं में यह आंकड़ा बढक़र 63 प्रतिशत हो गया है। 15 से 19 साल की 66 फीसद लड़कियां एनीमिक हैं।
 
हालांकि जांच कराने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या बढ़ी है और गर्भावस्था के दौरान आयरन की गोली खाने वाली महिलाओं की संख्या में भी आठ फीसद की वृद्धि हुई है। वैसे पूरे देश में एनीमिया के आधे मामलों की वजह आयरन तथा विटामिन बी-9 व बी-12 की गोलियों का सेवन नहीं करना या अपर्याप्त सेवन है।
 
प्रयासरत है सरकार
कुपोषण के मामले में बिहार में पांच साल के करीब आठ प्रतिशत से अधिक बच्चों की स्थिति गंभीर है। ऐसे बच्चों के लिए सरकार ने पोषण पुर्नवास केंद्रों (एनआरसी) की स्थापना की है। इन केंद्रों पर कुपोषित बच्चों की समुचित देखभाल के लिए सीबीसीई (कम्युनिटी बेस्ड केयर स्टैंडर्ड) तथा फीडिंग डिमोंस्ट्रेटर नियुक्त किए गए हैं, जिनका काम कुपोषित बच्चों को पोषण केंद्रों तक पहुंचाना तथा इसके लिए अभिभावकों को जागरूक करना है। हालांकि इन केंद्रों के ठीक से काम नहीं करने की शिकायतें भी लगातार मिलती रहीं हैं।
 
सरकार ने कुपोषित बच्चों की देखरेख, पोषक आहार की व्यवस्था तथा उनके इलाज के लिए अलग से बजट का प्रावधान भी किया है। इसके अलावा पोषण पखवारा, पोषण माह जैसे कार्यक्रम भी समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं। प्रत्येक महीने में एक दिन ग्रामीण स्वास्थ्य व पोषण दिवस मनाया जाता है। इस दिन आशा तथा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गांव की महिलाओं व बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों पर बुलाती है तथा उन्हें पोषण तथा स्वास्थ्य से संबंधित यथा, निजी स्वच्छता, खानपान से जुड़ी अच्छी आदतों, जच्चा-बच्चा की देखभाल, परिवार नियोजन व टीकाकरण से जुड़ी जानकारी दी जाती है।
 
वाकई, सरकारी प्रयासों के बावजूद आंकड़ों की भयावहता के पीछे कोरोना महामारी भी एक महत्वपूर्ण कारक है जिसने लगभग सभी सामाजिक व आर्थिक इंडिकेटर पर निगेटिव प्रभाव डाला है। व्यापक रूप से फैली गरीबी, खराब संस्थागत स्वास्थ्य ढांचा, लैंगिक असमानता, बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा बराबर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण बिहार में बच्चों को काफी अभावों का सामना करना पड़ता है।
 
रिपोर्ट :  मनीष कुमार

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