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क्या भारत को मिलेगा सेमीकंडक्टर की वैश्विक कमी का फायदा

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, शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021 (07:52 IST)
सेमीकंडक्टर संकट का सबसे बुरा असर वाहन निर्माता कंपनियों पर हुआ है। टाटा, फोर्ड और हुंडई जैसी कंपनियों के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आई है। साथ ही सेमीकंडक्टर निर्माता भी चिप आपूर्ति में इन्हें वरीयता नहीं दे रहे हैं।
 
नियाभर में सेमीकंडक्टर चिप की कमी देखी जा रही है। इस कमी के चलते कार निर्माता कंपनियों में मैन्युफैक्चरिंग का काम घट गया हैं, इलेक्ट्रिक उपकरण नहीं मिल रहे हैं, क्रिप्टोकरंसी माइनिंग पर बुरा असर हो रहा है, रिसर्च एंड डेवलपमेंट का काम प्रभावित हुआ है और इतना ही नहीं गेमर्स तक को अपडेटेड डिवाइस नहीं मिल रहे हैं।
 
भारत में त्योहारी सीजन में गाड़ियों की बिक्री पर भी इस कमी का असर पड़ा। इस कमी को लेकर भारतीय कंपनियों के साथ ही सरकार भी चिंता में है। इससे निपटने के लिए हाल ही में भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर चिप और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग के काम के लिए 76 हजार करोड़ रुपये के इंसेंटिव की घोषणा की है।
 
सेमीकंडक्टर से जुड़े बड़े दावे
इस स्कीम की घोषणा करते हुए केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इसके जरिए 1।67 लाख करोड़ रुपये का निवेश आने और 9।5 लाख करोड़ रुपये का प्रोडक्शन होने की बात भी कही। स्कीम की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा, "यह रचनात्मकता को बढ़ावा देगी और भारत की डिजिटल संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए घरेलू क्षमताओं को भी बढ़ाएगी।"
 
यह भी बताया गया कि इससे सेमीकंडक्टर डिजाइनर्स को स्टार्ट-अप शुरु करने के मौके मिलेंगे। डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम के तहत सरकार इन स्टार्ट-अप्स का 50 फीसदी खर्च भी उठाएगी। पूरे कार्यक्रम में 35 हजार अच्छे दर्जे के सीधे और 1 लाख इनडायरेक्ट रोजगार दिए जाने की बात भी कही गई। जानकार मानते हैं कि ये लक्ष्य पाए जा सकते हैं लेकिन फिर भी सरकार को इन दावों के साथ 'नियम और शर्तें लागू' जैसी चेतावनी देनी चाहिए थी क्योंकि इस स्कीम के बहुत से लक्ष्य 'ऐसा हुआ तो वैसा होगा' के सिद्धांत पर काम करेंगे।
 
सेमीकंडक्टर निर्माता भी परेशान
दरअसल सेमीकंडक्टर की कमी से सिर्फ टेक-ऑटो कंपनियां ही परेशान नहीं हैं, खुद सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियां भी परेशान हैं। एक बड़ी अमेरिकन सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनी में काम करने वाले मधुकर कृष्णा इस कमी के लिए 'दुष्चक्र' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक अन्य कंपनियों की तरह ही खुद सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों को भी निर्माण में काम आने वाले जरूरी टेक्निकल उपकरण नहीं मिल रहे हैं।
 
दरअसल सेमीकंडक्टर निर्माताओं को सेमीकंडक्टर के शोध-विकास और निर्माण के लिए कैमरों और सेंसर्स की जरूरत होती है। इसके अलावा निर्माण के दौरान नाप-जोख और सर्वर में काम आने वाली मशीनों के लिए भी ऐसे कई उपकरण चाहिए होते हैं, जिनमें सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल होता है। इस समय कमी के चलते इन सब कामों में इस्तेमाल होने वाली मशीनें ही नहीं मिल रही हैं। इसके चलते सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियां भी निर्माण क्षमता बढ़ाने की हालत में नहीं हैं।
 
परेशानी लेकिन खुशी भी
परेशान होने के बावजूद भी निर्माता नहीं चाहते कि सेमीकंडक्टर संकट जल्द खत्म हो। मधुकर कृष्णा के मुताबिक फिलहाल कमी के चलते सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों को उत्पाद के लिए मुंहमांगा दाम मिल रहा है और उनका मुनाफा अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर चल रहा है। ऐसे में कंपनियों को यह भी लग रहा है कि इस तरह का फायदा तभी तक मिलता रह सकता है, जब यह संकट बना रहे। ऐसे में वे इस संकट को खत्म करने की जल्दीबाजी भी नहीं दिखा रहीं।
 
सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़े अन्य जानकार बताते हैं कि एक और रुकावट शोध और विकास से भी जुड़ी है। दरअसल जितना चिप को छोटा करेंगे, उससे उतनी ही पॉवर सेविंग होगी। लेकिन अब वे चिप इतने छोटे हो चुके हैं कि इस प्रक्रिया में एक सैचुरेशन आ गया है। यह भी चिप निर्माण के काम में तेजी लाने में रुकावट बन रहा है। फिर वर्क फ्रॉम होम, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिटकॉइन माइनिंग और गेमिंग जैसी चीजों में पिछले दो सालों में तेज इजाफे से सेमीकंडक्टर्स की मांग बढ़ती ही जा रही है लेकिन सप्लाई इस स्तर पर नहीं पहुंच सकी है।
 
क्यों ऑटो निर्माताओं को नहीं मिल रहे चिप
सेमीकंडक्टर की कमी का ऑटो सेक्टर पर प्रभाव सबसे स्पष्ट दिखा है। मधुकर कृष्णा के मुताबिक इसकी वजह ऑटो सेक्टर के निर्माताओं का सिर्फ सेमीकंडक्टर उपभोक्ता भर होना है। वे यह भी बताते हैं कि कार निर्माता सेमीकंडक्टर के लिए सबसे कम दाम भी चुकाते हैं। वहीं इलेक्ट्रिक निर्माता दाम अपेक्षाकृत ज्यादा देते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रिक उपकरणों के निर्माता, सेमीकंडक्टर निर्माण के ईकोसिस्टम का हिस्सा भी होते हैं क्योंकि उनके बनाए उपकरण सेमीकंडक्टर उत्पादन में भी मदद करते हैं। इसके चलते निर्माता कंपनियां उन्हें प्राथमिकता देती हैं।
 
ऑटो सेक्टर के लिए यह चिप की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि टाटा जैसी कंपनियां निर्माण में जबरदस्त गिरावट के बाद अब खुद ही सेमीकंडक्टर निर्माण में उतर रही हैं। हालांकि जानकारों ने बताया कि टाटा भी नए सिरे से सेमीकंडक्टर निर्माण का काम नहीं करेगी बल्कि विदेशों से सेमीकंडक्टर के अलग-अलग हिस्सों को मंगाकर उन्हें असेंबल करने का काम करेगी। इसे आउटसोर्सड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट या ओएसएटी कहते हैं। यानी सेमीकंडक्टर को तैयार करने की प्रक्रिया में फाउंड्री वाला काम पहले ही हो चुका होगा, जिसके बाद टाटा ओएसएटी की प्रक्रिया के जरिए इसे अंतिम रूप देकर सिर्फ इसकी पैकेजिंग करेगी।
 
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का भी रोल
मधुकर कृष्णा के मुताबिक सेमीकंडक्टर निर्माण में भारत की भूमिका पर विचार करते हुए दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की खींचतान को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक चीन के खिलाफ गोलबंद हो रहे देशों के लिए भारत एक उपयोगी विकल्प हो सकता है, वहीं ताइवान की भू-राजनैतिक स्थिति भी चीन के चलते वहां इस उद्योग को खतरे में खड़ा करती है। ऐसी स्थिति में भी भारत एक विकल्प के तौर पर दिखता है। जहां पर इस उद्योग के बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निवेश की मंशा बना सकते हैं।
 
जानकार मानते हैं कि ऐसी स्थिति में भारत का यह कदम बड़े बदलाव का पहला पड़ाव बन सकता है। सेमीकंडक्टर डिजाइन के प्रोत्साहन की बात सरकार की ओर से घोषित योजना में की गई है। सेमीकंडक्टर डिजाइनिंग का काम उतना महंगा नहीं है और इस क्षेत्र में नए स्टार्टअप भी अच्छा कर सकते हैं। सेमीकंडक्टर डिजाइन का मतलब किस तरह कुशलता से ट्रांजिस्टर्स को सजाया जाए कि उनका आकार भी छोटा हो सके और उन्हें सबसे अच्छी तरह से प्रयोग में भी लाया जा सके। स्टार्टअप इस क्षेत्र में अच्छा कर सकते हैं।
 
भारत ने आग लगने पर खोदा कुआं
हालांकि जानकार यह भी मानते हैं कि अगले पांच सालों में भारत दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर निर्माताओं में शामिल नहीं हो पाएगा। इस लक्ष्य को चरणबद्ध तरीके से ही हासिल किया जा सकता है। तब तक के लिए भारत की रणनीति यही हो सकती है कि वह सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए सिलिकॉन कटिंग से लेकर इसे अंतिम रूप देने तक के किसी एक चरण में खुद को मजबूत बनाए। ऐसे में डिजाइन पर फोकस करने वाला यह कदम भी कारगर साबित हो सकता है।
 
कुछ जानकार इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है कि फिलहाल जारी की गई प्रोत्साहन स्कीम आग लगने पर कुआं खोदने जैसी है। भारत अब शुरुआत करके कोई फायदा उठा सकेगा इस पर संशय है। वे मानते हैं कि भारत ने पहले से ही खुद को इस क्षेत्र में एक खिलाड़ी बनाने की कोशिश की होती तो वैश्विक कमी के दौरान वह टेक्नोलॉजी और कौशल के इस्तेमाल से सेमीकंडक्टर क्षेत्र की बड़ी ताकत बनने की कोशिश कर सकता था।
 
सप्लाई चेन में बनानी होगी जगह
जानकार सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़े एक और रोड़े का जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि कई बार एक-एक चिप के निर्माण में करोड़ों का खर्च आता है। सेमीकंडक्टर की एक फाउंड्री लगाने का खर्च ही भारत सरकार की ओर से जारी इंसेंटिव की कुल रकम से कई गुना ज्यादा होता है। ऐसे में बड़े जोखिम का डर भी रहता है। इसलिए बड़ी कंपनियां भी इसमें हाथ नहीं डालना चाहतीं। वे भी सोचती हैं कि जांचे-परखे तरीके को देखने के बाद ही वे कोई शुरुआत करें।
 
फिर भी ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार ने अपनी नीति बनाते हुए डिजाइन, वेफर मैन्युफैक्चरिंग, एसेंबली और टेस्टिंग जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखा है। ऐसे में नीति का प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है लेकिन भारतीय उत्पादकों को सप्लाई चेन में अपनी जगह बनाने, दुनिया भर के उत्पादकों से साझेदारी विकसित करने और सेमीकंडक्टर का घरेलू ईकोसिस्टम बनाने पर ध्यान देना होगा।
रिपोर्ट : अविनाश द्विवेदी
 

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