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अमेरिका और चीन की बैठक का संकेतः पहले नहीं झुकेंगे

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बुधवार, 28 जुलाई 2021 (11:14 IST)
सोमवार को चीन और अमेरिका के नेताओं की शिखर वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। हालांकि दोनों पक्षों ने संबंध सुधारने की बात कही, पर संकेत कुछ और कह रह हैं।
 
अमेरिका और चीन के नेताओं की बातचीत के बाद ना तो कोई नतीजे घोषित किए गए, ना भविष्य में मिलने की कोई रूपरेखा बताई गई। दोनों पक्षों ने कहा कि संबंध सुधारने के लिए सामने वाले को कुछ राहतें देनी होंगी। इस बैठक से बस यही संकेत मिला कि दोनों महाशक्तियों के संबंध इस वक्त बेहद सर्द हो चुके हैं।
 
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उप विदेश मंत्री वेंडी शरमन की उत्तरी चीन के तटीय शहर तियानजिन का दौरा और वहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात दोनों ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता को कुछ नरमी देने का एक मौका था, ताकि यह प्रतिद्वंद्विता किसी विवाद में तब्दील ना हो जाए।
 
लेकिन बैठकों के बाद जिस तरह के सख्त बयान दोनों तरफ से आए हैं, वे अलास्का में मार्च में हुई बैठक के बाद जैसे ही हैं, जबकि राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता संभालने के बाद हुई दोनों देशों के नेताओं की पहली मुलाकात के बाद एक दूसरे की आलोचनाएं ही सुनाई दी थीं।
 
पहले तुम, पहले तुम
 
वैसे, अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि बंद दरवाजों में हुई बैठकें तुलनात्मक रूप से ज्यादा सौहार्दपूर्ण रहीं। और तियानजिन के बाद वैसा रूखापन भी नहीं दिखा, जैसा कि अलास्का में दिखा था, लेकिन दोनों ही पक्ष एक साथ आगे बढ़ने के लिए कोई राह नहीं चुन पाए हैं।
 
शरमन ने चीन पर कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के उलट चलने के आरोप लगाए। इनमें चीन का हांग कांग में दमन, शिनजियांग में उइगुर और अन्य अल्पसंख्य समुदायों को यातना, तिब्बत में मानवाधिकारों का हनन और मीडिया की आजादी पर हमले जैसे मुद्दे शामिल हैं।
 
अमेरिका सरकार के एक अधिकारी ने पत्रकारों से कहा, 'मेरे ख्याल से यह कहना गलत होगा कि अमेरिका किसी भी तरह से चीन का सहयोग पाने के जुगाड़ में है। यह चीन को फैसला करना है कि वे अगला कदम बढ़ाने के लिए कितने तैयार हैं।'
 
उधर चीनी पक्ष ने गेंद अमेरिका के पाले में होने की बात कही। अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों का हवाला देते हुए वहां के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, 'जहां तक अंतरराष्ट्रीय नियमों के सम्मान की बात है तो दोबारा अमेरिका को सोचना है।'
 
समझ का फर्क है
 
अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड में एशिया विशेषज्ञ बोनी ग्लासर कहती हैं कि दोनों पक्षों के लिए किसी तरह का संवाद बनाए रखना बहुत जरूरी है लेकिन तिनजियान के बाद न तो कोई सहमति बनी है ना ही भविष्य को लेकर कुछ तय हुआ।
 
ग्लासर कहती हैं, 'इससे अमेरिका और उसके सहयोगी तो असहज ही होंगे। वे अमेरिका और चीन के संबंधों में ज्यादा स्थिरता की उम्मीद कर रहे हैं।' ग्लोसर कहती हैं कि अगर दोनों ही पक्ष इस उम्मीद में बैठे रहेंगे कि सामने वाला पहले झुके तो फिर दोनों निराश ही होंगे।
 
ऐसी संभावना जताई जा रही है कि अक्टूबर में होने वाली जी20 की बैठक के दौरान जो बाइडन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिल सकते हैं। वैसे, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी कहती हैं कि तिनजियान में इस बारे में कोई बात नहीं हुई लेकिन आने वाले समय में कभी न कभी संवाद का मौका जरूर आएगा।
 
अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट में फेलो एरिक सेयर्स कहते हैं कि दोनों ही पक्ष फिलहाल कूटनीति संवाद को लेकर एकमत नहीं दिखते। सेयर्स कहते हैं, 'तिनजियान में जो नजर आया वो ये था कि कूटनीतिक संवाद की अहमियत और भूमिका को लेकर दोनों पक्षों की समझ अभी एक दूसरे से बहुत अलग है।'
 
वीके/एए (रॉयटर्स)

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