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क्या पश्चिम बंगाल में बिहार की कामयाबी दोहरा सकेंगे ओवैसी?

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बुधवार, 25 नवंबर 2020 (09:21 IST)
रिपोर्ट : प्रभाकर मणि तिवारी
 
तृणमूल कांग्रेस ने ओवैसी की पार्टी के कई असरदार नेताओं को तोड़ कर अपने खेमे में शामिल कर लिया है। क्या तृणमूल को भी ओवैसी से खतरा महसूस होने लगा है?
 
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) क्या अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले अहम विधानसभा चुनावों में खासकर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक समीकरणों को गड़बड़ा सकती है? क्या वह बिहार की तरह यहां भी अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगा सकती है? बिहार के चुनावी नतीजों के बाद बंगाल के चुनाव मैदान में उतरने के ओवैसी के ऐलान के बाद यहां राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल उठने लगे हैं।
 
ऐसे सवाल लाजिमी भी हैं। इसकी वजह यह है कि राज्य में करीब 30 फीसदी मुस्लिम वोटर विधानसभा की 100 से 110 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं और यह तृणमूल कांग्रेस का ठोस वोट बैंक रहा है। ओवैसी ने बीजेपी को हराने के लिए ममता को चुनाव पूर्व गठजोड़ का भी प्रस्ताव दिया है। लेकिन इसे खारिज करते हुए तृणमूल कांग्रेस ने उल्टे ओवैसी की पार्टी के कई असरदार नेताओं को तोड़ कर अपने खेमे में शामिल कर लिया है। इससे साफ है कि तृणमूल को भी ओवैसी से खतरा महसूस होने लगा है।
 
पश्चिम बंगाल में 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही अलपसंख्यक वोट बैंक पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा रहा है। देशभर में कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल में ही सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में ओवैसी की पार्टी के आने से मुस्लिम वोटों में कुछ विभाजन हो सकता है। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि ओवैसी का असर सिर्फ हिन्दी और उर्दू भाषी मुस्लिमों पर है, बंगाल के मुस्लिमों पर नहीं। दूसरी ओर, बीजेपी ने कहा है कि उसे बंगाल की सत्ता में आने के लिए ओवैसी या दूसरे किसी राजनीतिक दल की बैसाखी की जरूरत नहीं है। वह अपने बूते दो सौ से ज्यादा सीटें जीतने में सक्षम है। उधर, कांग्रेस और सीपीएम ने भी ओवैसी के विधानसभा चुनावो में उतरने की स्थिति में धार्मिक आधार पर धुव्रीकरण तेज होने का अंदेशा जताया है।
 
बिहार के चुनावी नतीजों के बाद ओवैसी ने बीजेपी को हराने के लिए ममता को चुनाव पूर्व गठजोड़ का भी प्रस्ताव दिया था। लेकिन ममता और उनकी तृणमूल कांग्रेस ने इसे खारिज कर दिया है। इससे पहले ममता बनर्जी ओवैसी पर बीजेपी से पैसे लेकर बंगाल में पांव जमाने के आरोप भी लगा चुकी हैं। दरअसल, हाल के वर्षों में बीजेपी के मजबूत होने के साथ बंगाल में जिस तेजी से धार्मिंक आधार पर धुव्रीकरण तेज हुआ है उसमें ओवैसी की मौजूदगी खास कर सत्तारुढ़ पार्टी के समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है।
 
ओवैसी की पार्टी इन चुनावों में कितना असर डाल पाएगी, इस सवाल का जवाब तो बाद में मिलेगा। लेकिन राज्य के जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उसका मैदान में उतरना काफी अहम है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में 27.01 प्रतिशत मुस्लिम थे। अब यह आंकड़ा 30 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। राज्य के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जिलों में मुसलमान मतदाताओं की संख्या 40 प्रतिशत से ज्यादा है। कुछ इलाकों में तो यह और भी ज्यादा है। मिसाल के तौर पर मुर्शिदाबाद में 67 प्रतिशत, उत्तर दिनाजपुर में 51 प्रतिशत, मालदा में 52 प्रतिशत और दक्षिण दिनाजपुर में 49।92 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं।
 
मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में विधानसभा की 34 सीटें हैं। ये तीनों जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं। विधानसभा की 294 सीटों में से 100 से 110 सीटों पर इसी तबके के वोट निर्णायक हैं। बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 40 प्रतिशत वोट मिले थे और तृणमूल को 43 प्रतिशत यानी दोनों के बीच महज 3 प्रतिशत का ही अंतर था। लेकिन साथ ही यह ध्यान भी जरूरी है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दों में फर्क होता है। ऐसे में लोकसभा के नतीजों के हिसाब से कोई अनुमान लगाना उचित नहीं है।
 
2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का कब्जा था। लेकिन उसके बाद यह लोग धीरे-धीरे ममता की तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए और 2011 और 2016 में इसी वोट बैंक की बदौलत ममता सत्ता में बनी रहीं। लेकिन बीजेपी की ओर से मिलती मजबूत चुनौती के बीच अब ओवैसी के यहां चुनावी राजनीति में उतरने की वजह से ममता बनर्जी सरकार के लिए नया सिरदर्द पैदा होने का अंदेशा है। हालांकि ममता अल्पसंख्यकों की सहायता के लिए दर्जनों योजनाएं शुरू कर चुकी हैं। इनमें अल्पसंख्यकों के मदरसों को सरकारी सहायता, इस तबके के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और मौलवियों को आर्थिक मदद भी शामिल है। इसी वजह से बीजेपी समेत तमाम राजनीतिक दल उनके खिलाफ तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप लगाते रहे हैं।
 
ओवैसी की ओर से मिलने वाली चुनौती के बीच तृणमूल कांग्रेस ने एआईएमआईएम के 20 नेताओं को अपने पाले में कर लिया है। पार्टी के प्रमुख नेता अनवर पाशा कहते हैं कि ममता बनर्जी भारत में सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष नेता हैं। वह देश की अकेली नेता हैं जो एनआरसी का विरोध करने के लिए सड़क पर उतरी थीं। पाशा का दावा है कि एआईएमआईएम वोटों का ध्रुवीकरण कर बीजेपी को मदद पहुंचा रही है। उसने बिहार में वोटों के ध्रुवीकरण में अहम भूमिका निभाते हुए वहां बीजेपी को सरकार बनाने में मदद पहुंचाई। लेकिन उनके अनुसार बिहार की कामयाबी बंगाल में दोहराना ओवैसी के लिए संभव नहीं है।
 
दूसरी ओर, एआईएमआईएम का दावा है कि इससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। 'मिशन पश्चिम बंगाल' के लिए पार्टी प्रवक्ता असीम वकार कहते हैं कि पार्टी ने राज्य में 23 जिलों में से 22 में अपनी यूनिट बनाई हैं। फिलहाल एक सर्वेक्षण किया जा रहा है। उसके बाद ही सीटों पर फैसला किया जाएगा।
 
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता सौगत राय कहते हैं कि ओवैसी का असर हिन्दी और उर्दूभाषी मुसलमानों पर है, बांग्लाभाषियों पर नहीं। ऐसे में उनको यहां बिहार जैसी कामयाबी नहीं मिलेगी। हमें ओवैसी से कोई खतरा नहीं है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं कि ओवैसी की पार्टी बंगाल की राजनीति में कोई छाप नहीं छोड़ सकेगी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं कि ओवैसी की पार्टी का एकमात्र लक्ष्य मुस्लिम वोटों का विभाजन कर धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों को नुकसान पहुंचाना है। इसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा।
 
क्या ओवैसी के चुनाव मैदान में उतरने से बीजेपी को सच में कोई फायदा होगा? इस सवाल पर बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल राय कहते हैं कि हमें बंगाल में जीतने के लिए किसी दूसरे दल की जरूरत नहीं है। पार्टी अपने बूते यहां 200 से ज्यादा सीटें जीतेगी। बीते लोकसभा चुनाव के नतीजों से साफ है कि बंगाल में अब अल्पसंख्यक तबका भी बीजेपी को वोट दे रहा है।
 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ओवैसी की पार्टी बंगाल में कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, यह अभी तय नहीं है। लेकिन बिहार में उनकी कामयाबी और बंगाल में चुनाव मैदान में उतरने के ऐलान से राज्य के सियासी हलके में खलबली तो मच ही गई है। एक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि ओवैसी की ओर से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ही तृणमूल कांग्रेस यहां उनकी पार्टी के नेताओं को तोड़ने में जुट गई है। ओवैसी ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। लेकिन उनके आने से राजनीतिक समीकरणों में थोड़ा-बहुत बदलाव तो तय है।

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