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लोकतंत्री कॉकरोच

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cockroach janta party
व्यंग्य आलेख: भारतीय लोकतंत्र सचमुच एक विराट रसोईघर है, जहां समस्याएं पकती कम हैं और उनके रूपक अधिक तले जाते हैं। यहां बेरोजगारी वर्षों तक सरकारी फाइलों में धूल खाती रहती है, प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं की जवानी चबा जाती हैं, नियुक्तियां अदालतों और विभागों के बीच पिंगपोंग खेलती रहती हैं, लेकिन जैसे ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति के कथित बयान में बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से कर दी जाती है, पूरा देश अचानक जाग उठता है।

बाद में उस बयान पर स्पष्टीकरण भी आया कि टिप्पणी बेरोजगारों पर नहीं, फर्जी डिग्री धारियों पर की गई थी। परंतु हमारे समय का सबसे बड़ा सत्य यही है कि इस देश में स्पष्टीकरण उतनी तेजी से नहीं फैलते जितनी तेजी से अपमान फैलता है। शब्द एक बार जनता की नसों में उतर जाएं तो फिर तथ्य पीछे छूट जाते हैं और व्यंग्य आगे निकल जाता है।
 
तीन दिन के भीतर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से एक फेसबुक पेज बन गया और देखते ही देखते उस पर बारह मिलियन लाइक आ गए। यह संख्या केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता नहीं थी; यह उन लाखों युवाओं की सामूहिक खुन्नस थी जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, अस्थायी नौकरियों और स्थगित परिणामों के बीच अपने भविष्य की हड्डियां चबाते आ रहे हैं। 
 
मुझे इस विषय पर लिखने के लिए इतने फोन आए कि लगा मानो देश में बेरोजगारी से अधिक रोजगार इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने में पैदा हो गया हो। कुछ लोग अत्यंत उत्साहित थे। एक कॉकरोच क्षमा करिए एक बेरोजगार ने फोन करके कहा, 'भाईसाहब, इस पार्टी पर जरूर लिखिए। पहली बार लगा कि युवाओं ने अपने अपमान को भी आंदोलन बना दिया।' दूसरी ओर कुछ सज्जन अत्यंत क्रोधित थे। उन्होंने लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा, 'आप इसका पर्दाफाश कीजिए। यह देशविरोधी मानसिकता है। कॉकरोच भी कोई नाम हुआ?' मुझे लगा मानो वे नाम से अधिक इस बात से आहत थे कि व्यंग्य ने व्यवस्था की बनावटी गंभीरता पर सीधे चप्पल मार दी है।
 
घर पहुंचा तो श्रीमती जी ने समाचार पढ़ते ही सबसे पहले अपना पल्लू समेटा और बोलीं, 'हे भगवान! कोई दूसरा नाम नहीं मिला इन्हें? मुझे तो कॉकरोच का नाम सुनकर ही डर लगता है।' मैंने कहा, 'डरिए मत, ये वही कॉकरोच हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधेरी रसोई में वर्षों से जीवित हैं।'

वे बोलीं, 'तुम मज़ाक मत करो। ये प्राणी बड़े खतरनाक होते हैं, जहां थोड़ी सी गंदगी दिखी नहीं कि पूरी टोली लेकर पहुंच जाते हैं।' मैं कुछ क्षण चुप रहा, फिर मुझे लगा कि शायद यही इस समय का सबसे बड़ा राजनीतिक विश्लेषण है। व्यवस्था की गंदगी जहां बढ़ती है, वहां असंतोष के कॉकरोच स्वतः पैदा हो जाते हैं।
 
दरअसल 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम अपने भीतर इतना तीखा व्यंग्य समेटे हुए है कि उसने बेरोजगारी की पूरी त्रासदी को एक प्रतीक में बदल दिया। पार्टी का चुनाव चिन्ह बताया गया 'जूते से बचकर भागता हुआ कॉकरोच।' मुझे यह प्रतीक भारतीय बेरोजगार की जीवटता का राष्ट्रीय चिह्न लगा।

वह हर परीक्षा, हर पेपर लीक, हर रद्द भर्ती, हर आश्वासन और हर भाषण के बाद भी जीवित रहता है। उसकी उम्र निकल जाती है, लेकिन विज्ञापन नहीं निकलते। वह कोचिंग संस्थानों, लाइब्रेरियों, किराए के कमरों और साइबर कैफों में ऐसे बचा रहता है जैसे परमाणु युद्ध के बाद भी कॉकरोच बच जाने की वैज्ञानिक भविष्यवाणी सच हो गई हो।
 
पार्टी के एक स्वयंभू संस्थापक अध्यक्ष का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह कह रहा था, 'हम कॉकरोच हैं, क्योंकि हमें हर जगह देखकर लोग घृणा तो करते हैं, पर हटाते नहीं।' यह सुनकर मुझे लगा कि देश का युवा अब क्रांति नहीं कर रहा, वह अपनी पीड़ा का स्टैंडअप कॉमेडी संस्करण तैयार कर रहा है। वह रोते-रोते इतना थक चुका है कि अब अपनी ही दुर्दशा पर हँसने लगा है।

शायद यही कारण है कि इस पार्टी का घोषणापत्र भी अत्यंत व्यावहारिक बताया गया। उसमें वादा किया गया कि हर बेरोजगार को प्रतिदिन कम से कम पाँच नए आवेदन भरने का अवसर दिया जाएगा, ताकि उसे यह अनुभूति बनी रहे कि राष्ट्र उसके भविष्य के प्रति गंभीर है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया को सात वर्ष से पहले पूरा न किया जाए, क्योंकि इतनी जल्दी नौकरी मिलने से भारतीय युवाओं का धैर्य और आध्यात्मिक विकास बाधित हो सकता है।
 
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां अवसरों से अधिक प्रेरणादायक भाषण उपलब्ध हैं। एक टीवी बहस में एक विशेषज्ञ कह रहे थे, आज के युवाओं में धैर्य की कमी है। उसी समय स्क्रीन के नीचे पट्टी चल रही थी 'भर्ती परीक्षा परिणाम पांचवीं बार स्थगित।'

मैंने सोचा, यदि धैर्य को ओलंपिक खेलों में शामिल कर लिया जाए तो भारतीय बेरोजगार स्वर्ण पदक लेकर लौटेंगे। वे वर्षों तक फॉर्म भर सकते हैं, फीस जमा कर सकते हैं, परीक्षा रद्द होने पर पुनः आवेदन कर सकते हैं और फिर भी उनसे कहा जाता है 'सकारात्मक सोचो।'
 
सबसे मनोरंजक दृश्य तब दिखाई देता है जब कोई सफल व्यक्ति मंच पर खड़े होकर कहता है 'मेहनत करो, सफलता अवश्य मिलेगी।' यह वही वाक्य है जो प्रायः वह व्यक्ति बोलता है जिसकी सफलता में मेहनत के साथ-साथ संपर्क, संसाधन, समय और सौभाग्य भी बराबर साझेदार रहे होते हैं। पर इस देश में असफलता हमेशा व्यक्ति की मानी जाती है और सफलता हमेशा व्यवस्था की उपलब्धि घोषित कर दी जाती है। बेरोजगार युवक यदि प्रश्न पूछे तो उसे अधीर कहा जाता है, और यदि चुप रहे तो उसे डेटा में बदल दिया जाता है।
 
इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पक्ष वह स्पष्टीकरण था जिसमें कहा गया कि टिप्पणी बेरोजगारों पर नहीं, फर्जी डिग्री धारियों पर की गई थी। मुझे यह सुनकर बड़ा संतोष हुआ। आखिर देश में कुछ तो लोग हैं जिन्हें कॉकरोच मानने योग्य समझा गया। लेकिन समस्या यह है कि इस देश में असली और फर्जी के बीच की रेखा इतनी धुँधली हो चुकी है कि कभी-कभी डिग्री असली होती है और व्यवस्था फर्जी निकल आती है।
 
दरअसल 'कॉकरोच जनता पार्टी' कोई राजनीतिक दल नहीं है। यह इस समय के घायल युवा मन का व्यंग्यात्मक घोषणापत्र है। यह उन लाखों डिग्रियों की सामूहिक हंसी है जो अलमारियों में रखी-रखी पीली पड़ रही हैं। यह उस पीढ़ी का आत्मव्यंग्य है जिसे धीरे-धीरे यह समझा दिया गया है कि उसकी प्रतिभा से अधिक मूल्यवान उसका डेटा है, उसकी योग्यता से अधिक उपयोगी उसकी चुप्पी है। यही कारण है कि आज बेरोजगारी केवल आर्थिक संकट नहीं रह गई है; यह सम्मान के क्षरण का संकट भी बन चुकी है।
 
और शायद इस पूरे प्रसंग का सबसे तीखा व्यंग्य यही है कि देश का युवा अब व्यवस्था से नौकरी नहीं मांगता। वह केवल इतना चाहता है कि उसे कीट-पतंगों की श्रेणी में रखने से पहले कम-से-कम उसकी मार्कशीट एक बार देख ली जाए।
 
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