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2019 लोकसभा : भाजपा के लिए उत्तरप्रदेश में कांटों से भरी राह...

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अवनीश कुमार

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 में जहां सभी पार्टियों के लिए उत्तरप्रदेश 80 सीटें अहम भूमिका रखते हैं तो वहीं भाजपा के लिए अपने जनाधार को उत्तरप्रदेश में बचाना बेहद ही कांटोंभरा साबित हो सकता है, क्योंकि जहां एक तरफ 2014 में भाजपा ने 73 सीटों पर अपना परचम लहराया था तो वहीं दूसरी तरफ उपचुनाव में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। वह भी उन सीटों पर जिन पर जीत का परचम 2014 में भाजपा लहरा चुकी थी। इसमें खुद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री की भी सीटें भाजपा बचाने में कामयाब नहीं हो पाई थी। इसके पीछे की वजह गठबंधन की ताकत कही जा रही थी। लेकिन एक नया समीकरण कांग्रेस ने तैयार कर दिया है, वह भी 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकता है।
 
जहां उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशियों को गठबंधन का प्रत्याशी टक्कर दे रहा था तो वहीं कांग्रेस का भी प्रत्याशी भाजपा को टक्कर देने में जुटा था। इसका नतीजा बेहद चौंकाने वाला रहा था। भले ही कांग्रेस के हाथ उपचुनाव में जीत न लगी हो लेकिन वोटबैंक में कांग्रेस ने सेंध लगा ही दी थी जिसका खामियाजा भाजपा को हार के रूप में उठाना पड़ा था और अब कुछ ऐसी ही स्थिति 2019 लोकसभा चुनाव के फाइनल में देखने को मिल रही है। 
 
एक तरफ जहां भाजपा उत्तरप्रदेश के प्रत्याशियों को लेकर रात-दिन बैठक कर रही है, तो वहीं कांग्रेस ने अलग एक सूची जारी कर यह संदेश दे दिया है। उत्तरप्रदेश में वह अकेली दम 80 सीटों पर प्रत्याशी उतार चुनाव लड़ेगी तो वहीं गठबंधन भी सीटों का बंटवारा उत्तरप्रदेश में कर चुका है और कुछ प्रत्याशियों की सूची गठबंधन ने बैठक कर जारी भी कर दी है। अगर उपचुनाव जैसी स्थिति बनी तो भाजपा के लिए फाइनल में उपचुनाव का तरीका कांग्रेस व गठबंधन का सिरदर्द बन सकता है और अगर उपचुनाव जैसा हालात बने तो भाजपा को अपनी 73 सीटें भी बनाए रखना बेहद दिक्कतभरा साबित हो सकता है, क्योंकि वोटों का बंटवारा 2014 में देखने को मिला था जिसका नतीजा बेहद चौंकाने वाला था।
 
उत्तरप्रदेश की 80 में 73 सीटें भाजपा जीतकर ले गई थीं और अब जब सपा व बसपा का गठबंधन हो चुका है और अगर ऐसे में सपा और बसपा का वोटबैंक गठबंधन में आ गया तो यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि उत्तरप्रदेश की 80 सीटों में नतीजे बेहद चौंकाने वाले होंगे। वहीं कांग्रेस द्वारा 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा भी कहीं-न-कहीं भाजपा के लिए सिरदर्द साबित होगी, क्योंकि जानकारों की मानें तो कांग्रेस का वोटबैंक इतना कमजोर अभी उत्तरप्रदेश के अंदर नहीं हुआ है कि जिसके दम पर कांग्रेस उत्तरप्रदेश में दखल न दे सके। अगर ऐसा हुआ तो वोटबैंक के बंटवारे एक हिस्सा कांग्रेस को भी चला जाएगा और अगर कांग्रेस का वोटिंग परसेंटेज बढ़ता है तो वह परसेंटेज कहीं-न-कहीं भाजपा के लिए सिरदर्द साबित होगा।
 
अब ऐसे में 73 सीटें ही बचाए रखना भाजपा के लिए एक चिंता का विषय उत्तरप्रदेश में बना हुआ है जिसको लेकर साफतौर पर देखा जा सकता है। अपने ही बयान से भाजपा पीछे हट गई है। सूत्रों की मानें तो जहां कुछ दिन पूर्व भाजपा के आलाकमान ने निर्देश जारी किया था कि 75 वर्ष की आयु पूरा कर चुके लोगों को प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में नहीं उतारा जाएगा, लेकिन अब अपने ही बयान को भाजपा ने बदल दिया है और कहा है कि उम्र की कोई सीमा नहीं है, बस प्रत्याशी जिताऊ होना चाहिए।
 
ऐसे में स्पष्ट है कि कई ऐसे चेहरे हैं, जो उम्र के पड़ाव को पार कर चुके हैं लेकिन जनता के बीच उनका ठीक-ठाक दबदबा है और इसे ही देखते हुए भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में अब नैया पार लगाने को तैयार भी है। इसके पीछे की मुख्य वजह उत्तरप्रदेश ही माना जा रहा है। भाजपा उत्तरप्रदेश में 2014 की तरह कमाल कर पाती है कि नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन एक बात स्पष्ट है कि 2014 की तरह 73 सीटों को बचा पाना ही भाजपा के लिए टेढ़ी खीर साबित होता नजर आ रहा है और इसकी मुख्य वजह गठबंधन के साथ-साथ कांग्रेस को भी माना जा रहा है, क्योंकि त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष का नतीजा भाजपा, कांग्रेस व गठबंधन देख चुकी हैं।
 
क्या कहते हैं जानकार? : वरिष्ठ पत्रकार नीरज तिवारी ने बताया कि यह बिलकुल निश्चित है कि भाजपा के लिए उत्तरप्रदेश की राह कांटोंभरी है। इसकी मुख्य वजह यह भी है कि जो भी सत्ता के शीर्ष पर होता है, उसको लेकर आम जनमानस में थोड़ा-सा गुस्सा व विरोधाभास आ ही जाता है और कहीं-न-कहीं वह विरोधाभास वोट के रूप में जब परिवर्तित होता है तो निश्चित तौर पर व सत्ता में बैठी पार्टी के लिए दिक्कत खड़ी करता है। अब अगर 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो उत्तरप्रदेश में बड़ी जीत हासिल करना सभी पार्टियों के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि उत्तरप्रदेश से ही दिल्ली का रास्ता होकर गुजरता है।
 
सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें उत्तरप्रदेश के अंदर ही हैं और अगर 2014 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा ने सभी पार्टियों को धराशायी करते हुए 73 सीटों पर कब्जा जमा लिया था लेकिन उपचुनाव में करारी हार कहीं-न-कहीं भाजपा के लिए खतरे की घंटी के तौर पर था, क्योंकि यह हार इतनी बड़ी थी कि जिसका अंदाजा खुद भाजपा को नहीं था।
 
अगर उपचुनाव के द्वारा बने समीकरण पर नजर डालें तो कुछ वैसा ही समीकरण 2019 के चुनाव में बन रहा है, क्योंकि उपचुनाव में सीधे तौर पर त्रिकोणीय संघर्ष देखा जा रहा था। जहां एक तरफ भाजपा का प्रत्याशी था तो दूसरी तरफ कांग्रेस का प्रत्याशी। और तो और, उपचुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन प्रयोग के तौर पर भी देखा गया था और यह प्रयोग कहीं-न-कहीं सफल साबित हुआ था। अब 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जहां भाजपा 80 की 80 सीटों पर लड़ने का दम भर रही है तो वहीं कांग्रेस भी पीछे नहीं है और 80 की 80 सीटों लड़ने का दम भर चुकी है।
 
उपचुनाव के समीकरण को देखते हुए सपा-बसपा का गठबंधन भी अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारने को तैयार है। अगर 2014 के वोटिंग परसेंटेज की बात की जाए और उनके आंकड़ों को जोड़ा जाए तो निश्चित तौर पर उत्तरप्रदेश में गठबंधन भाजपा व कांग्रेस को मार देते नजर आ रहा है। लेकिन एक फैक्टर है नए जुड़े 16 लाख मतदाताओं का। ये मतदाता किस ओर जाते हैं, ये भी पार्टियों का भविष्य तय करेंगे। अगर ये नए मतदाता जिस तरफ झुके, उस तरफ जीत का परचम का आंकड़ा बेहद बड़ा होता चला जाएगा। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि उत्तरप्रदेश में जीत का परचम कौन लहरा पाता है? लेकिन सीधे तौर पर भाजपा के लिए अपनी 73 सीटें ही बचा पाना सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
 
वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र कुमार का कहना है कि अगर मोदी फैक्टर की बात करें तो कहीं-न-कहीं मोदी मैजिक में अभी कोई ज्यादा कमी उत्तरप्रदेश के अंदर नहीं आई है, लेकिन मोदी मैजिक 2019 में कारगर सिद्ध होगा कि नहीं, यह तो आने वाला समय तय करेगा। यह तो तय है की 2014 की तरह 2019 में मोदी के नाम पर सांसद बने नेताओं के लिए राह बहुत कठिन है, क्योंकि 2014 में 'मोदी लहर' में बहुत सारे ऐसे नेता सांसद बन गए जिनका जनता से दूरदराज तक कोई नाता ही नहीं था और 5 साल तक उन्होंने जनता से ठीक-ठाक दूरियां भी बनाए रखीं। इसकी मुख्य वजह यह रही कि इन सांसदों को यह लगने लगा कि यह जीत उनकी है और फिर से वे इस जीत को दोहरा पाएंगे।
 
लेकिन इस बार मोदी का मैजिक तो रहेगा लेकिन जनता से दूरी बना बैठे सांसदों को इस बार अपनी सांसदी बचाना बेहद कठिन पड़ेगा। अगर आम जनमानस की बात करें तो वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते हुए नरेन्द्र मोदी को ही देखना चाहते हैं लेकिन अपनी लोकसभा के सांसद को दोबारा सांसद बनते नहीं देखना चाहते। ऐसी उत्तरप्रदेश की बहुत सारी सीटें हैं, जहां पर भाजपा के सांसद को लेकर जनता में खासी नाराजगी देखी जा सकती है। इसलिए यह भी फैक्टर है, जो कहीं-न-कहीं उत्तरप्रदेश की राह में भाजपा के लिए कठिन साबित हो सकता है। रही गठबंधन की बात तो यह तो तय है कि गठबंधन यानी कि सपा-बसपा 2014 से 2019 में ठीक-ठाक लोकसभा सीटों पर परफॉर्म करेगी लेकिन टक्कर जाकर सीटों पर भाजपा व कांग्रेस की देखने को मिलेगी, क्योंकि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में बेहद अंतर होता है और जनता की विचारधारा भी दोनों चुनावों में अलग-अलग होती है।

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