Webdunia - Bharat's app for daily news and videos

Install App

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

गीता की 11 मोटिवेशनल बातें आपका जीवन बदल देगी

हमें फॉलो करें webdunia
बुधवार, 27 जुलाई 2022 (13:26 IST)
वेदों का सार उपनिषद और उपनिषदों का सार गीता है। गीता हिन्दुओं का सर्वमान्य धर्मग्रंथ है। गीता को पढ़ने और समझने से सभी तरह के दु:खों का अंत हो जाता है। यह हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। आओ जानते हैं गीता के 11 मोटिवेशनल क्वेट्स जो आपका जीवन बनल देंगे।
 
1. क्रोध का त्याग कर दें : क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।
 
2. मृत्यु से भी बढ़कर है मृत्यु का भय: 'न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएंगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो।' कोई भी अमरजड़ी खाकर पैदा नहीं हुआ है। कोई जल्दी मरेगा तो कोई देर से। मृत्यु का भय मत पालो। मरना तो सभी को एक न एक दिन है। जो बना है वह फना है। 
 
3. आत्मा अजर अमर है : आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। जो लोग यह मानते हैं कि मरता सिर्फ शरीर है आत्मा नहीं। मेरे अपने जो मर गए असल में वे मरे नहीं हैं उन्होंने तो देह छोड़ी है। वे कहीं और जन्म लेंगे। ऐसे लोग ही सच्चा मार्ग ढूंढ लेते हैं।
 
4. कोई हमारा अपना नहीं है : गीता में श्रीकृष्‍ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन तेरे और मेरे कितने ही जन्म हो चुके हैं। आज जिसे तू अपना समझ रहा है वे पूर्व जन्म मैं तेरे नहीं थे। मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। मैं उन सभी जन्मों के बारे जानता हूं, लेकिन तू नहीं जानता।
 
5. कर्मवान बनों आस्थावान नहीं : कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं...इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। कर्मो में कुशलता को ही योग कहते हैं।
webdunia
6. नरक का द्वार : काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार (सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहां काम, क्रोध और लोभ को 'नरक का द्वार' कहते हैं) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥
 
7. व्यर्थ की चिंता छोड़ वर्तमान में जियो : क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होती है, न मरती है। जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिंता न करो। वर्तमान चल रहा है।
 
8. लगाव की दु:ख का कारण है : तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
 
9. परिवर्तन को समझो और उसके साथ रहो : परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो। न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा, परंतु आत्मा स्थिर है- फिर तुम क्या हो?
 
10. धर्म की शरण में रहो : यदि तुम खुद कुछ नहीं कर सकते हो तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिंता व शोक से सर्वदा मुक्त है। जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवनमुक्त का आनंद अनुभव करेगा। सारे धर्मों का त्याग कर मेरी शरण में हो जाओ- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
 
11. विश्‍वास : मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है, जैसा वह विश्वास करता है, वैसा वह बन जाता है। सदैव संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता न इस लोक में है और न ही परलोक में। जो कोई भी व्यक्ति जिस किसी भी देवता की पूजा विश्वास के साथ करने की इच्छा रखता है, में उस व्यक्ति का विश्वास उसी देवता में दृढ़ कर देता हूं।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का संक्षिप्त जीवन परिचय