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मेरा यार बना है 'बेचारा' दूल्हा....

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डॉ. छाया मंगल मिश्र

पिछले दिनों की एक घटना सीतामढ़ी में सोनबरसा थाना क्षेत्र के इंदरवा गांव की है। तेज आवाज में चलते डीजे की आवाज और लोगों की लापरवाही ने दूल्हे की जान ले ली। डॉक्टरों ने दूल्हे की मौत वजह हार्टअटैक बताई। कोरोना के बाद कमजोर हो चुके दिल के थमने की ऐसी कई कहानियां सामने आ चुकी हैं, लेकिन शादियों में बैंडबाजों की कर्कश आवाजें और डीजे की तेज बीट की वजह थमती हार्ट बीट के बाद भी शादी समारोह के नजारे बहुत डरावना ट्रेंड बनते जा रहे हैं।
 
कैसे हैं बारात के दृश्य इन दिनों? 
बारात निकल रही है। घर की खिडकियों के कांच, जमीन, सब थर-थर थर्रा रहे हैं। कुत्ते कानफोडू शोर से दु:खी हो भौंक रहे। छोटे बच्चे, मरीज व बूढ़े परेशान हो रहे। भांम्म-भांम्म धमक ऐसी कि छाती फाड़कर दिल बाहर गिर जाए। ये न केवल बारात बल्कि आए दिन निकलने वाले जुलूस, चल समारोहों आदि का भी हाल है। 
 
समझ ही नहीं आता इनका क्या किया जाए? पहले बैंड वाले चल रहे, उस पर कुछ लोग-लुगाई नाच रहे।
 
ढोलक वाले, उस पर भी फिर नगाड़िये अलग से जिन्हें आमने-सामने से लड़के ताड़ियों से कूटे जा रहे बेरहमी से, नाच-कूद रहे बेहूदगी से। यदि ये नहीं हैं तो बड़े-बड़े स्पीकर से लदी गाड़ियां हैं जिस पर फुल वॉल्यूम में बजने वाले गानों ने सबकी नींद हराम कर रखी है। बची-खुची कसर बम-पटाखे पूरी कर रहे हैं।
 
सबसे आखिर में नजर आता है बेचारा दूल्हा जिसके कारण ये सब लोग आज अपनी गर्मी निकाल रहे। इतने से पेट नहीं भरा तो घोड़े को भी नचा रहे शान बघारने, उसके चारों पैरों में घुंघरू जो बांध रखे हैं, हंटर फटकार रहे वो बेचारा मार के डर से, शोर से हैरान-परेशान खौफजदा प्राणी उछाले मार रहा है।
 
कुछ लोग प्रायोजित अल्प स्वल्पाहार का आनंद उठा रहे हैं जिससे दूसरों को होने वाली दुश्वारियों से कोई लेना-देना नहीं होता। जहां खड़े हैं वहीं फैलाया और कचरे को फेंके जा रहे हैं। जिसके घर के आगे ये सब हो रहा है उसकी आत्मा ही जानती है कि वो क्या भुगत रहा है? 
 
कितना बदल गया बारात का, समारोहों का स्वरूप?
 
जानते हैं आप कई जगह तो खिडकियों के कांच तक टूट जाते हैं और आप किसी को दोष नहीं दे सकते। सोचिए कितना खतरनाक कंपन उत्पन्न होता है इनसे? 
 
कितना घातक है ये शोर! कोई समझने ही तैयार ही नहीं। उससे भी घातक है बेसुरे और बेताले नाचने-गाने वालों का शोर-शराबा। कोई एक चीज तो समझ आए जिस पर ये नाच-गा रहे हैं। सब अपनी ही धुन में झटके मारे जा रहे बदन को। इनमें लड़कियों, औरतों की बराबरी की भागीदारी होती है।
 
रोते-गाते घिसटाते बच्चे ये सब फटी-फटी आंखों से देखते बेचारे-से लगते। दुनिया कहां जा रही है और हम हैं कि अभी भी तरस रहे कि कहीं तो सुन लें- 'घोड़ी पे होकर सवार, चला है दूल्हा यार, कमरिया में बांधे तलवार...' या 'आज मेरे यार की शादी है...' जैसा कुछ। पर कैसे? आजकल बारातियों से ज्यादा तो बाजेन्तरे बुला लिए जाते हैं। घेरे बना-बनाके पूरी बारात के टुकड़े हो जाते हैं।
 
न्योछावर के पैसों के लूटमार झगड़े हो जाते हैं। ये है आजकल की बारातों की छोटी-सी बानगी। इसमें घट-बढ़ आप अपने हिसाब से भुगती हुईं बातों का कर सकते हैं। अब बात ये है कि क्या हम इन्हें कंट्रोल नहीं कर सकते? क्या इतना जरूरी है ये सब दिखावा करना? जब थोड़े में ज्यादा मधुर व सुंदर काम हो सकता है तो ये कर्कश आवाजें क्या बिगाड़ा नहीं करतीं? क्या बारात बेमजा करना ख़ुशी देता होगा? मैं तो दाद देती हूं उन नाचने-बजाने वालों की, जो इतने के बाद भी सुन-समझ लेते हैं कि वे किसकी, किस आवाज और धुन पर नाच-गा रहे हैं। वाकई कमाल का टैलेंट होता है ये। 
 
तरस तो दूल्हे पर आता है, क्योंकि जब कान में ठेठ अंदर तक मुंह घुसेड़ के बोलने के बाद भी क्या कहा समझ न पड़ती हो। वहां वो मुंह में बड़े पान दबाए, साफे में कैद कानों में कही गई बात पर जब बेचारा अपनी मुंडी जोर-जोर से हिला-हिलाकर 'हां-हां' करता है तो कोई जादूगर लगता है जिसे सबके मन की बात पता हो। खैर, क्या करें?
 
सबका अपना-अपना अंदाज है... अपनी ढपली अपना राग है... शायद सोचते होंगे आशिक की है बारात, जरा झूम के, धूम से निकले। तो जनाब, ये धूम दूसरों को कितनी तकलीफ देती है उसका भी तो थोडा ख्याल रखें!

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