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कश्‍मीर चुनाव परिणामों की ध्वनियां सुने देश

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अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद या डीडीसी के चुनाव परिणामों के संदेश अत्यंत सरल और स्पष्ट हैं। वहां एकच्छत्र और बेरोकटोक शासन चलाने के अभ्यस्त राजनीतिक दल इसकी चाहे जैसी व्याख्या करें इससे प्रदेश में परिवर्तन की ध्वनि स्पष्ट रुप से सुनाई पड़ रही है।

फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि यह गुपकार गठबंधन के पक्ष में आया परिणाम है। उमर अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया कि डीडीसी चुनावों में लोगों ने भाजपा को करारा जवाब दिया है। वे इसे धारा 370 हटाए जाने के खिलाफ जनादेश भी बता रहे हैं। हम चुनाव आयोग द्वारा दिया आंकड़ा देखें या इनकी विशेषज्ञ टिप्पणी को स्वीकार करें।

गुपकार गठबंधन को ये लोग ऐसा शक्तिशाली और प्रतिरक्षित मोर्चा मान रहे थे जिसकी किलेबंदी कोई भेद नहीं सकता। कल्पना यह थी कि हम साथ मिल गए तो प्रदेश में कोई टिकेगा नहीं और सारे चुनाव जीतकर हम पहले की तरह जो चाहेंगे करेंगे।

फारुख इतने बौरा गए कि धारा 370 को फिर से लागू करने के लिए चीन से मदद लेने का बयान दे दिया। मेहबूबा कहने लगीं कि यहां तीरंगे को हाथ लगाने वाला नहीं मिलेगा। गाल बजाना कोई इनसे सीखे। निस्संदेह, स्थानीय राजनीतिक समीकरण में जब तक कश्मीर की राजनीति में हो रहा परिवर्तन निश्चित रुपाकार ग्रहण नहीं करता, इनकी सम्मिलित ताकत को कोई नकार नहीं सकता। किंतु इस चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया है कि इनका प्रभाव अब चूक रहा है। ऐसा न होता तो एक दूसरे के साथ सांप और नेवला का युद्ध लड़ने वाले अब्दुल्ला और मेहबूबा को मिलकर चुनाव नहीं लड़ना पड़ता। बावजूद इसके क्या इस जनादेश को इनकी उम्मीदों के अनुरुप कहा जा सकता है?

इसका सीधा उत्तर है नहीं। गुपकार 112 सीटें जीतकर सबसे बड़ा गठबंधन अवश्य बना है, पर भाजपा को 75 स्थान पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनने से ये नहीं रोक सके। भाजपा मतों में 38.74 प्रतिशत के साथ आगे है। गुपकार को 32.96 प्रतिशत मत मिले हैं जो भाजपा से 5.78 प्रतिशत कम है। भाजपा को कुल 4 लाख 87 हजार 364 मत मिले जबकि गुपकार के साथ कांग्रेस का भी मत मिला दें तो यह 4 लाख 77 हजार के आसपास है।

कल्पना करिए अगर सात दलों ने मिलकर चुनाव नहीं लड़ा होता तो परिणाम कैसा होता? निर्दलीयों की 50 स्थानों पर विजय भी इन दलों से मोहभंग का ही संकेत है। सबसे बड़ी बात घाटी में भाजपा के तीन प्रत्याशियों द्वारा गुपकार को हराकर प्राप्त किया गया विजय है। कई स्थानों पर उसके उम्मीदवारों ने ठीक-ठाक मत हासिल किए हैं। वास्तव में परिणामों के आंकड़ें बता रहे हैं कि अगर भाजपा ने प्रदेश में अपनी गोटी ठीक से सजाई और कुछ दलों को ताकत दिया तो फिर अब्दुल्ला और मुफ्ती की राजनीति हाशिए पर कदमताल करती दिखेगी। इन लोगों का चुनाव में एक ही एजेंडा था- अगर धारा 370 और 35 ए को वापस लाना है, प्रदेश को सम्पूर्ण भारत से अलग विशेष राज्य की तस्तरी में सजाने की ताकत पानी है तो गुपकार को गले लगाओ एवं भाजपा को भगाओ। अगर पूरे प्रदेश में इनकी बातों का असर होता हो इन्हें एकतरफा विजय मिलती। ऐसा नहीं हुआ तो इसका अर्थ है।

इनके उम्मीदवार इतनी संख्या में जीते भी तो इस कारण कि दूसरे दल या उम्मीदवार कम ताकतवर थे या उनका भी मोटा-मोटी एजेंडा यही था। आखिर कांग्रेस भी धारा 370 हटाए जाने का विरोध कर रही है। वहां के नेता गुपकार के साथ होने की बात करते हैं। भाजपा का अभी तक पूरे प्रदेश में विस्तार नहीं हुआ है। इस चुनाव से एक जोरदार ध्वनि यह निकल रही है कि धारा 370 हटाने के नरेन्द्र मोदी सरकार के फैसले को जनता ने नकारा नहीं है। अगर यही चुनाव एकाध साल बात होते तो शायद परिणामों ने गुपकार के नेताओं की नींद छीन ली होती।


नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह को परिणामों की ध्वनि ठीक से सुननी चाहिए। जिस तरह उन्होंने धारा 370 हटाने के पहले प्रदेश में सख्ती की और उसे आगे बनाए रखा उससे उनके प्रति विश्वास बढ़ा था। बाद में भावुकता में आकर एवं तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया आरंभ करने की जल्दबाजी के कारण निर्मित और घनीभूत होते माहौल तथा इससे राजनीति में बनते नए समीकरण की संभावना को धक्का लग गया। पहले फारुख अब्दुल्ला, फिर उमर को रिहा करना किसे रास आया इसका पता एकबार करवा लेना चाहिए। जो मेहबूबा लगातार भारत विरोधी बयान देतीं रहीं उनको रिहा करना धारा 370 हटाने की भावना को कमजोर करने वाला था। इनके भ्रष्टाचार और कुशासन को जनता ने भुगता है। धारा 370 हटाना इतिहास की भयानक आत्मघाती भूल का अंत करना था।

इससे प्राप्त विशेषाधिकार की मलाई मुख्यतः वहां नेताओं, अधिकारियों व बलशाली-प्रभावशाली तबके ही चट कर जाते थे। इनके भ्रष्टाचार के कारनामे जिस तरह सामने आए हैं उनके बाद अलग से कोई प्रमाण देने की आवश्यकता है क्या? ये खुले मैदान की राजनीति में नहीं, जेल में समय बिताने के हकदार हैं। जनता ने भी भारी संख्या में निर्दलीयों को चुनकर तथा भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर यही कहा है। अब्दुल्ला पिता-पुत्र एवं मुफ्ती को भी अब यह आवाज सुनाई पड़ रही होगी, पर मोदी-शाह को इसे सुनने की ज्यादा जरुरत है।

मान लीजिए परिणामों में भाजपा पिछड जाती तो क्या इससे गुपकार की बातों पर मुहर माना जाता? पहली बार उन तबकों को मतदान करने का मौका मिला जिन्हें इन पार्टियों ने प्रदेश का नागरिक ही नहीं माना था। जिला विकास परिषद के साथ पंचों एवं सरपंचों के चुनाव में पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगों को मतदान का अधिकार दिया गया। यही उन वाल्मिकी परिवारों के साथ भी हुआ जिन्हें वर्षों पहले सफाई के लिए लाकर बसाया गया पर वे प्रदेश के नागरिक नहीं बने। क्या इन सबको मतदान का हक नहीं मिलना चाहिए था? गुपकार घोषणा की ध्वनि यही है। इन लोगों को मतदान करते वक्त कैसा महसूस हुआ होगा इसकी हम आप केवल कल्पना कर सकते हैं।

वहां बसपा को भी दो सीटें इसी कारण प्राप्त हुई क्योंकि वाल्मिकी परिवारों को मतदान का अवसर मिला। यही नहीं जम्मू कश्मीर की जनता को भी पहली बार जिला विकास परिषद के चुनावों में मत डालने का अवसर मिला। आज तक इनने जिला विकास परिषद का चुनाव ही नहीं कराया। इनके शासनकाल में तीन स्तरीय पंचायती राज साकार नहीं हो सका। 70 वर्षों में पहली बार यह चुनाव आयोजित हुआ तथा अब जाकर वहां के लोगों को तीन स्तरीय पंचायती राज प्राप्त हुआ है।

जम्मू करूमीर के निवासियों ने साक्षात अनुभव किया है कि धारा 370 हटने के बाद पंचायतों को ताकत मिली है, उनके हक की राशि सीधे खाते में गई, वे खुद स्थानीय स्तर पर विकास के अनेक  काम कराने लगे, अधिकारी उन तक पहुंचने लगे। इन सबका सपना भी ये नहीं देख सकते थे। इससे वहां का मनोविज्ञान किस तरह निर्मित हो रहा होगा इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। ध्यान रखिए, पंचायत के दो स्तरीय चुनावों का कश्मीर के दलों ने बहिष्कार किया था। जनता ने इनकी एक न सुनी। उनके पास अस्तित्व बचाने की मजबूरी आ गई थी। अगर वे इस चुनाव में भाग नहीं लेते तथा आपसी नफरत और दुश्मनी भुलाकर एक साथ नहीं आते तो उनके पास दिन में तारे गिनने का ही काम बचता। यह स्थिति धारा 370 हटाने के कारण ही पैदा हुई।

अलगाववादी तक चुनाव बहिष्कार की घोषणा करने का साहस नहीं दिखा पाए। आखिर जम्मू कश्मीर में 51 प्रतिशत मतदान सामान्य बात नहीं है। अनेक स्थानों पर लोगों ने पहले की उदासीनता को दरकिनार कर मतादन किया। उदाहरण के लिए श्रीनगर शहर में लोकसभा चुनाव में 7.9 प्रतिशत और पंचायत चुनाव में 14.5 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि वर्तमान चुनाव में 35.3 प्रतिशत। एक साथ ठंढ, कोरोना, आतंकवाद आदि की चुनौतियों को दरकिनार कर लोगों ने मतदान किया तो साफ है कि वो नई व्यवस्था को अपने हक में मान इसको ह्रदयंगम करने की ओर बढ़ रहे हैं। इस प्रक्रिया को और बल देने की आवश्यकता है।

जिला विकास परिषद के चुनाव परिणामों से निकलती ध्वनियों को जो नहीं सुन रहे उनको सुनाना जरुरी है। केन्द्र में भी सरकार और विपक्ष सभी इसे सुने तथा इसके अनुरुप अपनी नीतियां निर्धारित करें।

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