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हजारों करोड़ के हथियार खरीदी का सौदा भी नाकाफी

स्वदेशी तकनीक अपनाएं तो कुछ बात बने

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संजय कुमार रोकड़े

आज तक देश अपने सशस्त्र बलों के लिए एक ढंग की राइफल भी विकसित नहीं कर सका है। आज भी देश अपनी रक्षा जरूरतों का 60 प्रतिशत आयात करता है। यह टिप्पणी देश के तत्कालीन उपराष्ट्रपति हमीद अंसारी ने थलसेना की ओर से किए गए फायरिंग परीक्षण में देश में ही विकसित एक राइफल के बुरी तरह नाकाम होने के अवसर पर की थी। बताते चलूं कि ईशापुर की सरकारी राइफल फैक्टरी में निर्मित असॉल्ट राइफल को जून में सेना ने अस्वीकार कर दिया था। ये हथियार परीक्षण में नाकाम साबित रहे थे। 
 
बहरहाल हमीद अंसारी के इस बयान का हाल ही में रक्षा मंत्रालय द्वारा थलसेना के लिए खरीदे जाने वाले 40 हजार करोड़ के हथियारों का सौदा भी मौन समर्थन सा देता है। हमारा देश भारत आज दुनिया के बड़े हथियार आयातक देशों में से एक है। एक तरफ पाकिस्तान से कश्मीर की उलझन है तो दूसरी ओर हमारे बड़े भूभाग पर चीन की नजर। इन वजहों से हमें अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे राष्ट्रों से अत्याधुनिक हथियार खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। मगर हमेशा से ऐसा नहीं था। एक समय था, जब हमारा देश हथियारों को हिंसा का कारण समझता था। बता दें कि इस समय जो हथियारों की खरीदी को जो अंतिम रूप दिया गया है वह भारतीय थलसेना ने इंफेंट्री के आधुनिकीकरण के लिए किया है। इसके तहत बड़ी संख्या में हल्की मशीनगन, कार्बाइन और असॉल्ट राइफलें खरीदी जाएंगी। 
 
अब पुराने और चलन से बाहर हो चुके हथियारों की जगह नए हथियार लेंगे। मतलब साफ है कि थलसेना में बड़े दिनों से चली आ रही हथियारों की कमी को अब कुछ हद तक पूरा करने की कोशिश की जा रही है। इस हथियार खरीदी के तहत करीब सात लाख राइफल, 44 हजार लाइट मशीनगन (एलएमजी) और करीब 44,600 कार्बाइन खरीदे जाने की संभावनाएं हैं। खरीदी की विस्तृत प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया है और यह इंफेंट्री के आधुनिकीकरण के लिए सबसे बड़ी खरीद योजनाओं में से एक है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थलसेना मानी जाने वाली इस सेना पर लंबे समय से खरीद प्रस्तावों को मंजूरी देने का दबाव था। चीन और पाकिस्तान सीमा पर बढ़ते खतरे को देखते हुए यह चिंता और भी बढ़ गई थी। असॉल्ट राइफलों की खरीदारी में अनेक कारणों से देरी हुई है। इसकी विशेषताओं को अंतिम रूप देने में सेना की नाकामी भी शामिल है। 
 
जून माह में सेना ने करीब 44,600 कार्बाइन की खरीदारी की शुरुआती प्रक्रिया प्रारंभ की थी जो अब कहीं जाकर अंतिम रूप तक पहुंच पाई है। असल में हथियारों की खरीद को अंतिम रूप देना बहुत ही जरूरी था, क्योंकि हमारी सेना के पास हथियारों की बहुत ही कमी थी। नियंत्रक और लेखा महापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि सेना के पास सिर्फ 20 दिन लड़ने का गोला-बारूद है जबकि किसी भी हालत में यह तैयारी 40 दिन के लिए होना आवश्यक है। सीएजी की उस रिपोर्ट पर पूर्व रक्षामंत्री अरुण जेटली ने भी कहा था कि वह किसी एक समय के आंकलन पर आधारित है और अब स्थितियां बदल चुकी हैं। निश्चित तौर पर वह रिपोर्ट 2015 की स्थिति पर है और संभव है कि तब से सेना की स्थिति में सुधार हुआ हो। इसके बावजूद उस रिपोर्ट में जितनी तैयारियों की जरूरत बताई गई थी वह इतनी जल्दी पूरी हो गई होगी ऐसा लगता नहीं है। बहुत हद तक तो उस रिपोर्ट को गलत बताने या झुठलाने का ही काम किया गया था। 
 
बहरहाल देश की दूसरी महिला रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने बाड़मेर के उत्तरलाई हवाई अड्डे पर यह दावा करके देश को आश्वस्त करने की कोशिश की थी कि सेना के पास पर्याप्त हथियार और गोला बारूद हैं, इसके बावजूद देश की रक्षा तैयारियों में किसी प्रकार की ढील दिए जाने की गुंजाइश नहीं है। शायद इसी ढिलाई को खत्म करने के लिए इस हथियार खरीद को अंतिम रूप दिया गया है। अब इसके साथ ही अगले कुछ ही दिनों में एलएमजी की खरीद के लिए 'जानकारी का अनुरोध' (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉरमेशन) जारी की जाएगी। सनद रहे कि कुछ महीने पूर्व ही रक्षा मंत्रालय ने 7.62 कैलिबर बाकी पेज 8 पर गन्स के लिए फील्ड ट्रायल के बाद मैदान में एक ही कंपनी के बचे रहने के कारण प्रस्ताव रद्द कर दिया था। खरीद प्रक्रिया में शामिल एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो 'नई असॉल्ट राइफल के लिए जनरल सर्विस क्वालिटी रिक्वायरमेंटस को अंतिम रूप दे दिया गया है। खरीदारी योजना को मंजूरी के लिए जल्द ही डीएसी के पास भेजा जाएगा।
 


हालांकि हथियारों की ये खरीदी भी हमारी सेना के लिए नाकाफी है। सेना ने हाल ही में 40 हजार लाइट मशीनगन का सौदा रद्द किया था जो सेना की अहम जरूरत थी और वह कमी अभी पूरी नहीं हुई है। इसी तरह सेना को चार हजार हॉवित्जर तोपों की जरूरत है। सेना को नए हेलीकॉप्टर चाहिए, क्योंकि चीता और चेतक का मॉडल पुराना हो चुका है और उन्हें बदलने की जरूरत है। इसी तरह वायुसेना में मिग विमानों की पीढ़ी काफी पुरानी हो चुकी है और उनके हादसों की बढ़ती संख्या के कारण उन्हें चलता-फिरता ताबूत तक कहा जाता है। अभी वायुसेना को 126 लड़ाकू विमानों की जरूरत है और इस दिशा में फ्रांस से 36 रैफल विमान का सौदा हुआ है। सेना को 2027 तक 200 जहाज चाहिए और अभी उसके पास 145 हैं जिनमें बदलाव करना पड़ेगा। 
 
सवाल यह है कि यह सारी रक्षा तैयारी होगी कैसे? सरकार इसके लिए 'मेक इन इंडिया' योजना के माध्यम से अपना लक्ष्य पाना चाहती है। इस क्षेत्र में रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनी ने फ्रांस की डसाल्ट एविएशन के साथ सौदा किया है, लेकिन रिलायंस जैसी कंपनी इस क्षेत्र में एकदम नई है और उसे रक्षा उपकरणों के निर्माण का कोई अनुभव नहीं है। इसलिए चुनौती यह है कि किस तरह से तेजी से हथियार और गोला बारूद की आवश्यकता पूरी की जाए और साथ ही उनकी उच्च गुणवत्ता कायम की जाए।
 

हालांकि यहां सवाल ये भी मौजूं है कि आखिर क्यों हम राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर देश के आम लोगों की खून पसीने की कमाई को विदेशी हथियारों की खरीद के नाम पर यूं ही जाया कर देते हैं। क्यों हम स्वदेशी हथियारों के निर्माण के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं करते हैं। अब तो रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान की कमी भी हमारी सरकारों की नीयत पर उंगली उठाती है। इस राष्ट्रवादी सरकार ने भी इस क्षेत्र में दूसरों की नाकामियों को ही सामने लाने का काम किया है। बजाय इसके कुछ नई पहल की होती तो ठीक होता। अब इनकी भी नीयत पर सवाल खड़ा होता है। आखिर मोदी सरकार तो राष्ट्रवादी सरकार है, वह भी क्यों दूसरे देशों से हथियार खरीदने को मजबूर है। 
 
अभी भी अनुसंधान एवं विकास में मोदी सरकार की कोशिशें नाकाफी ही क्यों हैं। देश में विशुद्ध विज्ञान विषयों में पीएचडी करने वालों की संख्या बेहद कम है और भारत तेजी से बदलती इस दुनिया में काफी पीछे है। आखिर क्यों एक के बाद एक आई सरकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हथियारों की विदेशी खरीद के बजाय अपना तंत्र खड़ा करने में रुचि क्यों नहीं ली। यह भी बड़ा ही हास्यास्पद है कि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.9 फीसदी वैज्ञानिक अनुसंधान पर खर्च करता है, जबकि चीन इस मद में 2, जर्मनी 2.8 और इसराइल 4.6 फीसदी व्यय करता है। तमाम दावों के बावजूद जरूरी है देश की स्वदेशी रक्षा तैयारियां। इस ओर बातों से अधिक काम करने की जरूरत है। हालांकि हम स्वदेशी हथियारों की सफलता को लेकर हमेशा सशंकित रहते हैं। 
 
शायद इसलिए कि हमारी सरकारें आला दर्जे के वैज्ञानिक नहीं बना पाई या फिर चीन के हमले ने इतना तोड़ दिया कि उसके सदमें से अभी तक उभर नहीं पाए हैं। आज जो हम देश की सुरक्षा के लिए व्यापक स्तर पर विदेशों से हथियारों की खरीद करते उसके पीछे कहीं न कहीं चीन का डर भी है। भारत-चीन युद्ध के समय हमारे नेतृत्व विश्वास में धोखा खा गए। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन को अपना अच्छा मित्र मानते थे, जबकि चीन अंदरुनी तौर पर भारतीय क्षेत्र पर हमले की तैयारी करते चल रहा था। उसने सीमा के पास न केवल तेजी से सड़कें बनाईं बल्कि अपनी चौकियां भी स्थापित कीं। यह एक तरह से लड़ाई की पूर्व तैयारी थी। इधर, स्पष्ट निर्देश के अभाव में भारतीय सेना न तो सीमा पर पर्याप्त चौकियां बना सकी और न ही सरकार की ओर से उन चौकियों तक रसद, हथियार आदि पहुंचाने के लिए सड़कें बनाई गईं। ऐसे में अचानक चीन की सेना ने हमारी चौकियों पर हमला किया और वे हमारी सीमा के अंदर तक घुस आए। उत्तर में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा चीन ने कब्जा लिया तो पूर्व में अरुणाचल प्रदेश की ओर तवांग के आगे तक चीनी सेना ने कब्जा कर लिया। 
 
ऐसा नहीं था कि चीनी गतिविधियों की सूचना भारतीय सेना को नहीं थी। सेना ने तो बाकायदा नई दिल्ली में बैठे नेतृत्वकर्ताओं को कई बार गोपनीय सूचनाएं तक भेजीं, लेकिन दिल्ली तब ऊंचा ही सुनती थी। सेना की चेतावनी को भरपूर नजरअंदाज किया गया, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को लगता था कि चीन भारत का अभिन्न मित्र है और वह कभी भी भारत पर हमला नहीं करेगा। नेहरू का यही अटूट विश्वास चीन के अचानक हमले से खंड-खंड होकर टूट चुका था। युद्ध हुआ तो अत्याधुनिक हथियारों के अभाव में हमारे सैनिक बुरी तरह हारे। कई चौकियों पर तो सैनिकों के पास पांच-पांच दिन तक भोजन और पानी तक नहीं पहुंचा, फिर भी वे पेट पर कपड़ा बांधकर लड़ते रहे और अंतत: शहीद हो गए। 
 
युद्ध में भारत की हार हुई। इस हार ने नेहरू की तंद्रा तोड़ी और वे चीन के प्रति सजग हुए। उस समय हमारा नेतृत्व इस मुगालते में था कि हमारे पड़ोसी भाई हैं। हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा भी उसी दौर की उपज था। मगर एक हार ने भारतीय नेतृत्व की सोच बदलकर रख दी। बस उस एक लड़ाई के बाद से ही भारत ने तेजी से हथियार खरीदना शुरू किया। इस युद्ध के बाद से ही भारतीय सेना का आधुनिकीकरण शुरू हुआ। भारत ने तब से ही अमेरिका, रूस और फ्रांस व अन्य देशों से हथियार खरीदना शुरू किया। वह सिलसिला आज तक जारी है। तब से अब तक हम अरबों-अरब रुपए हथियारों पर फूंक चुके हैं। चालीस हजार करोड़ के हथियारों का यह सौदा भी उसी का एक हिस्सा है।

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