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हिन्दी कल, आज और कल: भाषा विकास चुनौतियां और हमारे कर्तव्य

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

हिन्दी साहित्य के शलाका पुरुष भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के दोहे:

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

उस सारतत्व को प्रस्तुत करते हैं, जो वास्तव में हमारी उन्नति का मूल है। अपनी भाषा-अपनी माटी की महक एवं आत्मीयता का अपना एक अलग ही वैशिष्टय होता है, जो जुड़ाव, आकर्षण, स्नेह हम अपनी भाषा, अपनी माटी से पाते हैं, वह अन्य किसी से भी महसूस नहीं कर पाते हैं।

हिन्दी वह भाषा है जो संस्कृत, प्राकृत, पाली के सहज एवं सरलतम रुप में आम जन-जीवन में घुली-मिली हुई है। हिन्दी में भारतीय संविधान में वर्णित अन्य 21 भाषाओं- असमिया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़ कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत तमिल, तेलुगु, उर्दू, सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली, बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली सहित सम्पूर्ण भारत की स्थानीय बोलियों, अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय भाषाओं के शब्दों का समावेशन है, जो कि इस बात का परिचायक है कि हिन्दी का संसार कितना विराट है।

हिन्दी की यही विशिष्टता ही हिन्दी साहित्य को अपने आप में अद्वितीय बनाती है। किन्तु इसके अलावा भाषाविदों एवं शुध्द हिन्दी का प्रयोग करने वाले विद्वानों, चिन्तकों द्वारा इस बात की भी चिंता व्यक्त की जाती है कि हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों को समावेशित करने का यह गुण, हिन्दी के मूलस्वरूप को ही खण्डित न कर दे, हालांकि यह चिन्ता भी आवश्यक है, क्योंकि किसी भी भाषा का मूलस्वरूप ही उसकी धरोहर होती है। लेकिन यदि हम हिन्दी के विकास क्रम की ओर दृष्टिपात करें तो हमें एक चीज यह स्पष्ट समझ आती है कि हिन्दी का विकास भी भारतीय संस्कृति के अनुसार एवं स्वभावतः हुआ है, जो गुण हमारी भारतीय संस्कृति याकि जिसे ‘हिन्दुत्व’ कहें यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि हिन्दुत्व का अर्थ राष्ट्रीयता से है तथा इसकी परिभाषा विष्णुपुराण के भरतखण्ड के इस श्लोक के माध्यम से सुस्पष्ट तरीके से समझी जा सकती है―उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।

अर्थात्:-जो भूमि समुद्र से उत्तर की ओर तथा हिमालय से दक्षिण की ओर फैली हुई है, वही भारतवर्ष है और उसकी सन्तानों को भारतीय कहते हैं।

हमारी हिन्दुत्व की संस्कृति ने भी विभिन्न समाजों को समावेशित किया तथा अपने मूल स्वभाव के अनुसार आज भी वही भारतीय समाज विकास कर रहा है, हालांकि इसके कारण विभिन्न विकृतियां भी आईं। ठीक यही बात हिन्दी के लिए भी लागू होती है, हिन्दी ने भी अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर अपने में समावेशित करती हुई चली आ रही। हालांकि कुछ विकृतियां भी उसी तारतम्य में आईं जिनसे लगभग हिन्दी भी जूझ रही है।

इन्हीं बातों को लेकर हिन्दी के भाषाविदों, विद्वानों, चिन्तकों द्वारा इसी कारण हिन्दी में अन्य भाषाओं यथा- अंग्रेजी एवं उर्दू के बढ़ते प्रयोग के कारण विभिन्न आशंकाएं व्यक्त की जाती रहती हैं कि कहीं हिन्दी अपने मूलस्वरूप एवं मूल शब्द भण्डारों को ही न खो दे। लेकिन दूसरी ओर जब हम इस ओर देखते हैं कि हिन्दी के मूलस्वरूप को लेकर चिंतित विद्वानों ने धरातल पर इन विकृतियों को दूर करने के लिए क्या कोई ठोस कदम उठाए हैं? तब हम पाते हैं कि यह सब महज चिन्ताओं को व्यक्त करने तथा गोष्ठियों,परिचर्चाओं, समितियों के गठन एवं आर्थिक हित साधने, आर्थिक गबन तक ही यह सब सीमित रह गया।

बड़ा आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े विद्वानों एवं कर्त्ता-धर्ताओं की इस ओर दृष्टि क्यों नहीं जा पाई कि जब तक कोई भी विषय लोक से घुल मिल नहीं जाता, तब तक कोई भी अभियान सफल नहीं हो पाता है। हिन्दी के उत्थान की जिम्मेदारी लगभग उन्हीं लोगों के हाथों थमाई गई, जो करते तो हिन्दी की वकालत है लेकिन वे ही सबसे बड़े अंग्रेजीदा एवं उर्दू की उठापटक में ख्यातिलब्ध्द हैं।

आखिर! यह कैसे संभव हो सकता है कि जिस व्यक्ति के हाथों हिन्दी के विकास, उत्थान की जिम्मेदारी है, वह अधिकांशतः अंग्रेजी, उर्दू का प्रयोग करे, अपने घर-परिवार का वातावरण पाश्चात्य प्रभाव के अन्धानुकरण में अंग्रेजी को प्रतिष्ठा एवं गर्व का विषय माने। अपने संस्थानों चाहे वह शैक्षणिक संस्थान हों या अन्य -वहां वह अंग्रेजी माध्यम को सर्वोपरि रखता हो, तब ऐसे में हिन्दी का उत्थान कैसे संभव हो पाएगा? दूसरी बात गोष्ठियां, परिचर्चाएं, समितियां केवल चन्द गिने-चुने लोगों तक ही सीमित रह गईं, जबकि आवश्यक यह था की इन गोष्ठियों, परिचर्चाओं, समितियों का क्षेत्र व्यापक होना चाहिए था। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थानों, शासकीय-अशासकीय संस्थानों तथा आम सभाओं के स्वरूप में इनको आकार ग्रहण करना चाहिए था, जिससे लोक आसानी से जुड़ पाता तथा उसकी भागीदारी होती।

इससे हमें यह लाभ प्राप्त होता कि छात्र, शासकीय-अशासकीय,कर्मचारी सहित आम जनमानस के समक्ष हिन्दी के उत्थान तथा अंग्रेज़ी एवं उर्दू के बढ़ते प्रभाव को लेकर विचारों का प्रचार प्रसार होता तथा यह आमजन अभियान बन जाती।इस पर तो बड़ी भारी चूक हमारे नीति-नियंताओं द्वारा हुई है, जो लगातार अनवरत जारी है।

दूसरी ओर ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम अंग्रेजो से भले ही स्वतंत्र हो गए थे लेकिन अंग्रेजी की परतन्त्रता आज तक बनी हुई है, तथा यह एक प्रकार के सभ्य एवं ज्ञानी होने के ठप्पे का सूचक बनती चली गई। हमारी शिक्षा व्यवस्था में अंग्रेजी के रौब का इतना घातक प्रभाव हुआ कि हिन्दी बोलने तथा हिन्दी माध्यम में शिक्षा एक प्रकार से लज्जा एवं अंग्रेजी की अपेक्षा कम स्तर की मानी जाने लगी। हालांकि इसके पीछे भी कारण यह हैं कि विभिन्न शासकीय संस्थाओं में अधिकारियों/कर्मचारियों के चयन में "अंग्रेजीदां" मठाधीशों ने अंग्रेजी माध्यम को वरीयता दी, यह भी समाज में अंग्रेजी के श्रेष्ठ होने की भ्रान्ति को स्थापित करने में अहम कारण रहा है।

हमारी व्यवस्था ने समाज के अन्दर यह बात स्थापित कर दी कि "अंग्रेजी" ही ज्ञानी एवं उच्च स्तर के पढ़े-लिखे होने का प्रमाण है। जबकि सच्चाई यह है कि अंग्रेजी केवल सामान्य भाषा है तथा इसको सीखना हिन्दी से भी सरल है, लेकिन समाज के अन्दर अंग्रेजी के श्रेष्ठताबोध की धारणा आज भी बनी हुई है।

इसका परिणाम यह हुआ कि समाज ने अपने बच्चों के प्रवेश की दिशा हिन्दी माध्यमों के विद्यालयों की ओर से मोड़कर अंग्रेज़ी माध्यमों की ओर कर दी, जिसके चलते धीरे-धीरे हिन्दी माध्यम के विद्यालयों की संख्या घटती चली गई, तथा अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की संख्या में अप्रत्याशित वृध्दि होती चली गई, जो कि अब भी उसी तरह जारी है। सरकार के द्वारा संचालित केन्द्रीय विद्यालय एवं इसके समांतर अन्य विद्यालय, उच्च शिक्षा संस्थाओं, तकनीकी एवं चिकित्सा संस्थानों की सम्पूर्ण पढ़ाई अंग्रेजी में कराया जाना, शासकीय कार्यालयों, संसदीय, विधानसभाओं में अंग्रेजी के प्रयोग तथा बहसें यह दर्शाती हैं कि सरकार ने अंग्रेजी के बीजारोपण का संकल्प ही लिया है, जो कि समाज के अन्दर इस मानसिकता को कूट-कूट कर भरने में सफल रही कि अंग्रेजी ही सबकुछ है।

जबकि इन सभी के अन्य विकल्प थे कि शिक्षण विषय वस्तु के उच्चस्तरीय अनुवाद, हमारी शिक्षा व्यवस्था का माध्यम हिन्दी तथा जो हिन्दी में नहीं पढ़ सकते थे, उनके लिए अंग्रेजी या उनकी जिस विषय में पकड़ हो, उसके लिए अवसर उपलब्ध करवाए जाने की आवश्यकता थी तथा यह आज भी है।क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनी भाषा में जितनी शीघ्रता तथा सरलता के साथ आत्मीयता के साथ सीख एवं पढ़ सकता है ,वह अन्य किसी भाषा में सहजता का अनुभव नहीं करेगा। यहां यह कहना बिल्कुल नहीं है कि हमें अंग्रेजी नहीं सीखना चाहिए, बल्कि हमें अंग्रेजी सहित ज्यादा से ज्यादा भाषाओं को सीखने के प्रयास करना चाहिए, इससे मस्तिष्क अत्यधिक क्रियाशील एवं हम ‘विश्व ज्ञान’ को सीखने में महारथ हासिल कर लेंगे।

बात के मुख्य केन्द्र पर आएं -वर्तमान समय में हिन्दी भाषा के प्रयोग को लेकर लोगों के मध्य आकर्षण बढ़ा है, तथा इंटरनेट में विश्व की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली भाषाओं में अपना स्थान बनाने के रुप में हिन्दी स्थापित हुई है। वर्तमान समय में हिन्दी "विश्व भाषा"के तौर पर उभरकर सामने आई है, भारत ही नहीं अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, फिजी, मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद टोबैगो एवं संयुक्त अरब सहित अनेक देशों में हिन्दी विद्यालय, विश्वविद्यालय, शोध केन्द्र संचालित हो रहे हैं। सूचना एवं तकनीकी के इस आधुनिक युग में विभिन्न विश्वस्तरीय कंपनियों के द्वारा हिन्दी भाषा में विषय वस्तु, सेवाएं उपलब्ध करवाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, जो कि इस बात का द्योतक हैं कि हिन्दी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना लगातार प्रसार कर रही है। यहां पुनः मैं अपनी उसी बात से जोड़ना चाहूंगा कि "हिन्दुत्व" के प्रसार एवं आकर्षण के समांतर ही हिन्दी एवं संस्कृत की धुरी चलती है। समूचा विश्व जिस गति से हमारे "हिन्दुत्व" की ओर खिंचा चला आएगा, उसी गति से वह हिन्दी एवं संस्कृत के अक्षय कोष की ओर आकर्षित होगा। हालांकि यह क्रम कालांतर से जारी रहा है, उसी की परिणति है कि विश्व साहित्य में हमारी धरोहरों, ज्ञान, भाषाओं की गरिमा में वृध्दि होती चली जा रही है।

हिन्दी भाषाविद्, चिंतक, साहित्यकारों की चिन्ता हिन्दी में अंग्रेजी एवं उर्दू के जिस बढ़ते हुए प्रयोग, भाषाई स्तरीयता में कमी की ओर है, उस पर भाषाविदों, साहित्यकारों, चिन्तकों को अपने स्तर से हिन्दी के मूल शब्दकोश, स्तरीयता, व्याकरण, एवं शोधों पर कार्य करते रहना चाहिए, साथ ही गोष्ठियों, परिचर्चाओं, समितियों का क्षेत्र आमजन तक विस्तरित करना होगा। हिन्दी भाषा के प्रयोग को लेकर लोगों का झुकाव एवं आकर्षण इस बात का सुखद संकेत है कि लोग अपने मूल की ओर धीरे-धीरे ही सही लौट तो रहे हैं।

शासन एवं प्रशासन तंत्र को हिन्दी के विकास के लिए अपने स्तर से हिन्दी के प्रयोग, शिक्षा एवं संचार में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देकर किया जाना चाहिए। जहां तक अंग्रेजी एवं उर्दू के बढ़ते प्रयोग की बात है तो, मेरा मानना है कि इस पर जैसे-जैसे लोग हिन्दी के प्रयोग की दिशा में कदम बढ़ाते जाएंगे वैसे-वैसे ही शुध्द हिन्दी सीखने एवं प्रयोग करने की ओर भी अग्रसर होंगे। हमें समाज के तौर पर अपने घरों में अंग्रेजी के श्रेष्ठताबोध के आडंबर को दूर करते हुए अपने-घर-परिवार से ही इस बात की शुरुआत करनी होगी कि हम हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करें।

कुल मिलाकर हिन्दी के वैभव को विराट आकार देने में हम सभी को अपनी आज तक की त्रुटियों को सुधारते हुए अपने-अपने स्तर से यह प्रयास करना होगा कि हम हिन्दी का प्रयोग अधिकतर करें तथा अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को ही बनाएं, क्योंकि विश्व का इतिहास उलट-पलट कर देख लीजिए प्रगति एवं उन्नति की पताका उसने ही फहराई है, जिसने अपनी भाषा को महत्ता प्रदान करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान अपनी भाषा में अर्जित किया है।

नोट: इस लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक की न‍िजी अभिव्‍यक्‍त‍ि है। वेबदुन‍िया का इससे कोई संबंध नहीं है।

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