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Jagjeet singh: ‘दुख का पर्याय’ और ‘टप्‍पे की मस्‍ती’ भी थी जगजीत सिंह की आवाज

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नवीन रांगियाल

जगजीत सिंह (जन्‍म 08 फरवरी, 1941- निधन 10 अक्‍टूबर, 2011)

10 अक्‍टूबर को गजल सम्राट जगजीत सिंह के निधन को 9 साल हो गए। इतने साल से गजल का उनका वो मकाम अब तक खाली है, हालांकि वो इतना सारा गा गए हैं कि आने वाले कई सालों तक उनकी तरह की गजलों के खालीपन की भरपाई होती रहेगी। जगजीत सिंह की स्‍मृति‍ में उनके दुख और उनके टप्‍पे की खनक के बीच कुछ कहता-सुनता एक आलेख।

...

अकेलेपन की कोई जगह नहीं होती। वह एक एब्स्ट्रैक्ट अवस्था है, एक उदास अंधेरे का विस्तार। कभी न खत्म होने वाली अंधेर गली। इन अंधेर गलियों को हर आदमी कभी न कभी अपने जीते जी भोगता है। जो भोगता है उसके अलावा शेष सभी के लिए ऐसी गलियां सिर्फ एक गल्प होती हैं, एक फिक्शनभर। मेरा अकेलापन, तुम्हारा गल्प।

हमारे लिए जो गल्प है, उसी रिसते हुए दुख को जगजीतसिंह ने अपनी आवाज में उतारा। 90 के दशक के बाद जगजीतसिंह ता-उम्र अपने बेटे का एलेजी (शोक गीत) ही गाते रहे। उनकी पत्नी चित्रासिंह ने तो इसके बाद गाना ही छोड़ दिया। मृत्यु के बाद बहुत सी चीजें शुरू होती हैं, वहीं कुछ चीज़ें खत्म हो जाती हैं।

दरअसल, साल 1990 में किसी सड़क हादसे में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह के इकलौते बेटे विवेक की मौत हो गई थी। इसके बाद दोनों का साथ में सिर्फ एक ही एल्बम रिलीज हुआ। नाम था, समवन समव्हेअर।

ऐसा कहते हैं कि जगजीतसिंह कई बार घर में ही इस गीत को गुनगुनाया करते थे, - और फिर अचानक से चुप हो जाया करते थे। कई बार तुम अपना दुख दूर नहीं करना चाहोगे। शायद जगजीत सिंह यही चाहते हो कि गाकर उनका दुख दूर न हो जाए। इसलिए वे गाते-गाते चुप हो जाते होंगे।

बेटे की मौत के बाद जगजीत-चित्रा जिंदगीभर अपने सूने मकान में, अपने खालीपन में अकेले रहे। वे मिट्टी का पुतला बनाकर दिल बहलाते रहे। हम सब की तरह। हम सब भी अपने दुखों के पीछे एक मिट्टी का पुतला बनाकर रखते हैं। दिल बहलाने की कोशिश करते रहते हैं। एक ऐसा पुतला जो न बोलता है और न ही चलता। न ही हुंकारा देता है।

फिर किसी दिन पूरी दुनिया तुम्हारे लिए एक पुतलेभर में बदलकर रह जाती है। तुम अपने सूनेपन में और ज्यादा एकाकी हो जाते हो और जिंदगीभर अपने आसपास मिट्टी के पुतले बनाते रहते हो- कि तुम्हारा दिल लगा रहे।

शायद चित्रा सिंह अपने बेटे वि‍वेक की याद में ऐसे ही पुतले बनाकर उनकी मौत को भूलने की कोशि‍श करती हैं और जगजीत सिंह इस दुख की आवाज बनकर सभागारों में गूंजते रहते हैं।

2003 में मुंबई में जगजीतसिंह के एक लाइव कंसर्ट में उन्हें पहली बार सुना था। उन्होंने गाया था मिट्टी दा बावा नय्यो बोलदा... वे नय्यो चालदा... वे नय्यो देंदा है हुंकारा

यह गीत चित्रासिंह ने किसी पंजाबी फिल्म में गाया था। इसके बाद शायद यह गीत दोनों के लिए एक एलेजी बनकर रह गया। अपने बेटे का शोकगीत।

एक हरियाणवी लोकगीत की पंक्ति याद आ रही है। जो मुझे बहुत पसंद है। किस तरयां दिल लागे तेरा, सतरा चौ परकास नहीं

कहीं भी रौशनी नहीं है, चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा पसरा है। मैं तेरे लिए ऐसा क्या करुं कि इस दुनिया में तेरा दिल लगा रहे।

जिस गीत को चित्रा सिंह ने पंजाबी फिल्म में गाया, उसे बाद में जगजीतसिंह ने अपने कई कंसर्ट में गाया। जैसे रुंधे गले से वे अरज लगा रहे हो कि मिट्टी का बावा बोलने लगे, चलने फिरने लगे।

हम सब का एक शोकगीत होता है। जिसका नहीं है, वे इस गीत को सुनकर रो सकते हैं। दहाड़ मार सकते हैं। यह सुनकर हम ऐतबार कर सकते हैं कि दुख सिर्फ आंखों से ही नहीं रिसता। तुम्हारी त्वचा की रोमछि‍द्र से भी बहुत... दरअसल, बहुत सारा दुख छलक सकता है।

10 अक्‍टूबर 2011 को गजल सम्राट जगजीत सिंह का निधन हो गया। जहां उनके दौर में मेहदी हसन और गुलाम अली जैसे गायक गजल का वास्‍तविक स्‍वरूप गा रहे थे, ठीक उसी वक्‍त में जगजीत सिंह ने गजल के बोल और उसके संगीत का सरल और सहज बनाकर आम लोगों की जबान तक पहुंचाया।

यहां तक कि उन्‍होंने मिर्जा गालिब के शेर और शायरी को भी गजल में इस तरह ढाला कि वो आज भी आम सुनकारों को याद र‍हता है।

गालिब की पंक्‍ति‍ आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक हो या गुलजार की लिखी तमाम गजलें। जगजीत सिंह ने उनमें अपनी कोई शास्‍त्रीयता नहीं दर्शाई। उन्‍होंने गजलों को इतना सुगम बनाया कि वो इसके जानकारों को भी पसंद आई और नए युवा लोगों को भी गजल की तरफ आकर्षि‍त किया।

दर्द को तो जगजीत ने इस कदर शब्‍दों में उतारा कि उनकी आवाज दर्द का एक पर्याय बन गई। ‘मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा, वे नय्यों चालदां एक ऐसी ही पंजाबी गजल है, जि‍समें इस कदर दुख झलकता है कि कई बार लगता है वो अपने गुजर चुके बेटे को याद कर रहे हैं।

लेकिन जगजीत सिंह सिर्फ इतनाभर ही नहीं थे। उन्‍होंने पंजाबी टप्‍पों को भी इस तरह सिख मूड में आकर गाया कि सभागार हंसी ठहाकों से गूंज उठता था।

दुख का पर्याय और टप्‍पे की मस्‍ती भी थी जगजीत सिंह की आवाज,

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