कल्कि के नाम पर धर्म का नया धंधा, धर्म हो रहा बदनाम

अनिरुद्ध जोशी

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019 (14:26 IST)
पुराणों में कल्कि अवतार के कलियुग के अंतिम चरण में आने की भविष्यवाणी की गई है। अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है लेकिन अभी से ही कल्कि अवतार के नाम पर पूजा-पाठ और कर्मकांड शुरू हो चुके हैं। कुछ संगठनों का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है और कुछ का दावा है कि कल्कि अवतार हो चुका है। दोनों ही तरह के लोग भ्रमित इसलिए हैं क्योंकि वे सभी अवैदिक हैं।
 
 
हाल ही में इंश्योरेंस क्लर्क से कथित 'कल्कि भगवान' बने विजय कुमार नायडू के यहां जब इनकम टैक्स का शिकंजा कसा गया तो वह रफूचक्कर हो गया। सोचिए भगवान भी डरकर रफूचक्कर हो सकते हैं? देशभर में इस समय कई 'कल्कि भगवान' सक्रिय हैं जिनके कई आश्रम लोगों को लूटने का केंद्र बने हुए हैं।
 
 
इसके अलावा देशभर में कल्कि के नाम पर कई मंदिर बन गए हैं। ऐसा ही एक मंदिर उत्तरप्रदेश में संभल ग्राम में बना है, जो धार्मिक धंधे का नया केंद्र है। ये लोग कल्कि के नाम पर दिल्ली आदि क्षेत्रों में ऑडियो, वीडियो, सीडी, पुस्तक आदि साहित्य सामग्री का विकास कर प्रचार-प्रसार करते हैं। इन्होंने कल्कि के नाम पर आरती, चालीसा, पुराण आदि सब बना लिए हैं।
 
 
इसी मंदिर के उत्तर प्रदेश में सक्रिय कल्कि वाटिका नामक संगठन का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है। इन लोगों का मानना है कि देवी जगत में कल्कि अवतार हो गया है। स्वप्न, जागृत और वाणी अनुभवों द्वारा वे भक्तों को संदेश दे रहे हैं। उनकी महाशक्तियां भक्तों की रक्षा के लिए इस जगत में चारों ओर फैल चुकी हैं, अब बस उनका केवल प्राकट्य शेष है। इसका तार्किक आधार यह है कि अवतार किसी समयसीमा में बंधा नहीं होता। उसके प्राकट्य के अपने मापदंड होते हैं।...कहते हैं कि देश में उल्लू जब तक जिंदा है तब तक दूसरे पक्षी उसकी पीठ पर बैठकर आराम से जिंदगी की उड़ान भरा करेंगे।
 
 
भगवान कल्कि की पूजा का प्रचलन लगभग पौने तीन सौ साल से जारी है। पुराणों में वर्णित कथा के आधार पर कल्कि भगवान के एक मंदिर का निर्माण राजा सवाई जय सिंह ने जयपुर में 1739 ईस्वी में करवाया था। यह मंदिर उन्होंने अपने महल के पास ही बनवाया था, जो दक्षिणायन शिखर शैली में बना था।
 
 
इस तरह धीरे-धीरे संपूर्ण देश में अब कल्कि के नाम पर लूट प्रारंभ हो चुकी है। इस लूट का एकमात्र कारण यह है कि अधिकतर हिन्दू जनता अपने धर्म को नहीं जानती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह गुरु, बाबा और कथित भगवानों के चरण पखारती रहती है। इस जनता ने अपनी जिंदगी में कभी गीता का अध्ययन नहीं किया और वेदों को तो देखा तक नहीं है। बस कथावाचकों से पुराणों की कहानियां ही सुनते रहे हैं।
 
 
हिन्दू संत बनना बहुत कठिन है, क्योंकि संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव, शाक्त या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। इस कठिनाई, अकर्मण्यता और व्यापारवाद के चलते ही कई लोग स्वयंभू साधु और संत कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो चले हैं। इन्हीं नकली साधु्ओं के कारण हिन्दू समाज लगातार बदनाम और भ्रमित भी होता रहा है। लोग ऐसे तथाकथित संतों से दीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु मानते हैं। ये ऐसे गुरु घंटाल हैं कि लोगों को देते कुछ नहीं बल्कि लोगों के पास जो है उसे भी छीन लेते हैं।
 
हेरा-फेरी के दौर में कोई कैसे किसी भी संत पर विश्वास करके उसका परम भक्त बन जाता है, यह आश्चर्य का ही विषय है। ऐसा नहीं है कि अनपढ़ या गरीब लोग ही इन तथाकथित संतों के भक्त बनकर इनके चरणों में साष्‍टांग पड़े रहते हैं, बल्कि बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भी इनके आगे गिड़गिड़ाते नजर आते हैं।
 
 
इसमें लोगों का दोष नहीं, दरअसल व्यक्ति अपने कर्मों से इतना दुखी हो चला है कि उसे समझ में नहीं आता कि किधर जाएं, जहां उसका दुख-दर्द मिट जाए। व्यक्ति धर्म के मार्ग से भटक गया है तभी तो ठग लोग बाजार में उतर आए हैं और लोगों के दुख-दर्द का शोषण कर रहे हैं। यह सिर्फ हिन्दू धर्म की विडंबना नहीं है, सभी धर्मों में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिन्होंने धर्म को धंधा बनाकर रख दिया है। वे भोली-भाली जनता को परमेश्वर, प्रलय, ग्रह-नक्षत्र और शैतान से डराकर लुटते हैं।
 
 
इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के पहवाने और व्यवहार को देखकर दुख होता है कि इन्होंने धर्म का सत्यानाश कर दिया है। कोई इन्हें रोकने वाला नहीं है, क्योंकि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। इनकी अजीब तरह की हरकतों को देखकर लगता है कि कौन विश्वास करेगा धर्म पर? ये फूहड़ तरीके से नाचते हैं, अजीब तरीके के वस्त्र पहनते हैं और अब तो वे फिल्में भी बनाने लगे हैं।
 
 
हिन्दू जनता भी भ्रमित है। इसे भोली-भाली जनता कहना उचित नहीं होगा। यह जनता जानते-बूझते हुए भी किसी न किसी बाबा के चक्कर काटती रहती है, क्योंकि इस जनता को धर्म का ज्ञान नहीं है। जीवन में कभी गीता नहीं पढ़ी, वेद नहीं पढ़े। कभी राम-कृष्ण पर भरोसा नहीं किया, तो निश्चित ही जीवन एक भटकाव ही रहेगा। मरने के बाद भी भटकाव।
 
 
यह तथाकथित भोली-भाली, लेकिन समझदार जनता हर किसी को अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा लेकर उसका बड़ा-सा फोटो घर में लगाकर उसकी पूजा करती है। भगवान के सारे फोटो तो किसी कोने-कुचाले में वार-त्योहर पर ही साफ होते होंगे। यह जनता अपने तथाकथित गुरु के नाम या फोटोजड़ित लॉकेट गले में पहनती है। यह धर्म का अपमान और पतन ही माना जाएगा।
 
 
संभवत: ओशो रजनीश के चेलों ने सबसे पहले गले में लॉकेट पहनना शुरू किया था। अब इसकी लंबी लिस्ट है। श्रीश्री रविशंकर के चेले, आसाराम बापू के चेले, सत्य सांई बाबा के चेले, बाबा राम रहीम के चले के अलावा हजारों गुरु घंटाल हैं और उनके चेले तो उनसे भी महान हैं। ये चेले कथित रूप से महान गुरु से जुड़कर खुद में भी महानता का बोध पाले बैठे हैं। किस संत का शिष्य बनना या किस संत से दीक्षा लेना चाहिए यह इन तथा‍कथित चेलों को नहीं मालूम। यह सब हिन्दू धर्म के नियमों के विरुद्ध और हिन्दू धर्म के संहारक ही माने जाएंगे।
 
 
पिछले कई वर्षों में हिन्दुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिन्दू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया, जो आज भी जारी है। हिन्दू धर्म की मनमानी व्याख्या और मनमाने नीति-नियमों के चलते खुद को व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा पाता है। समझ में नहीं आता कि इधर जाऊं या उधर। 
 
 
भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परंपरा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, त्योहार, चालीसाएं, प्रार्थनाएं विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा-पंडितों को पूजने का प्रचलन बढ़ता है।
 
 
चार किताब पढ़कर आजकल कोई भी संत, ज्योतिष, प्रीस्ट बनकर लोगों को ठगने लगा है। लोग भी इनकी बातों को बिलकुल 'वेद वाक्य' या 'ब्रह्म वाक्य' मानकर पूजने लगते हैं। इन संतों से वे ही लोग प्रभावित होते हैं, जिन्होंने कभी खुद के धर्म को खुद आगे रहकर नहीं पढ़ा या जिनका मानसिक स्तर ही इतना है कि हर किसी से वे बहुत जल्द ही प्रभावित हो जाते हैं अर्थात जिनमें तार्किक ‍बुद्धि नहीं है। ऐसे में अंत में कहना होगा कि बाबाओं से ज्यादा दोषी तो उनके चक्कर में फंसने वाले लोग हैं।

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