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Thursday, 3 April 2025
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स्मृति शेष : मेरी यादों में पुरुषोत्तम नारायण सिंह

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तृप्ति मिश्रा

'तस्सवुरात की झील में
जब
रोशन ख्यालातों के ख्वाब थरथराते हैं, 
सच कहता हूं दोस्त
ज़िंदगी के आईने में
इंसानियत के अक्स
सरक जाते है'
 
ये पंक्तियां स्व. पुरुषोत्तम नारायण सिंह (समीक्षक, साहित्यकार, संगीतकार, गीतकार, संचालक, संयोजक, पूर्व निदेशक दूरदर्शन पटना 24x7) की हैं, जिनका गत 15 मई को निधन हो गया।
 
मेरे ख्यालात थरथरा उठे जब सुबह उठते ही उनके देहावसान की खबर सुनी।  पीएन सर.... हां, हम सब जूनियर साहित्यकार इसी नाम से पुकारते थे आपको। मेरे पर्यावरण संरक्षण सम्मान के समय अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के मुम्बई महोत्सव में 2 फरवरी 2019 को आपसे मुलाकात हुई, दो दिन मैं भी आप व अन्य लोगों के साथ उसी होटल में रुकी जहां करीब इस महोत्सव से जुड़े 15 अन्य लोग और रुके थे। ये सभी लोग देश के वरिष्ठ साहित्कार, मीडियाकर्मी, संपादक में से थे। साहित्य जगत से औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों ही तरह का परिचय मेरा इस आयोजन के माध्यम से हुआ। फ़िल्म जगत के कई वरिष्ठ गीतकारों से परिचय हुआ। फिलहाल बात सिर्फ पीएन सर की।

दो दिनों के कार्यक्रम में पहले दिन, समिति की ओर से आयोजन का संचालन पीएन सर ने किया। अपनी अद्भुत, कसी हुई शब्दावली और सेंस ऑफ ह्यूमर के साथ वो एक-एक साहित्यकार, गीतकार को आमंत्रित करते जाते थे। शुद्ध हिंदी और परिष्कृत अंग्रेज़ी दोनों पर ही उनकी पकड़ को देखकर मैं प्रभावित थी। चूंकि मैं खुद संचालन करती हूं, तो अन्य वरिष्ठ एंकर्स को ध्यान से सुनती हूं और टिप्स लेती हूं। यह कार्यक्रम करीब 4 घंटे चला।

संचालन के साथ पीएन सर ने अपनी एक रचना 'सूरत तेरी रेशम रेशम' और 'तसव्वुरात की झील में' सुनाई। 
 फिर देर रात हम सब होटल आ गए। खाना वगैरह के बाद सब अपने-अपने ग्रुप्स में रम लिए। मैं और कल्पना पांडेय जी शायद उम्र में सबसे छोटे थे तो सबके लिए बच्चों की तरह थे।

अगले दिन हम लोगों को मुम्बई वालों ने किसी स्टूडियो में बुलाया था। जहां एक काव्य गोष्ठी रखी थी। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था क्योंकि, अब तक मंचीय काव्य गोष्ठी का मुझे कोई भी अनुभव नहीं था। खैर, वो अनुभव भी फिर कभी सुनाऊंगी, अभी पीएन सर की यादें....

एक खास बात, जो उन्होंने हमें बताई। उनकी एक कविता ऑल इंडिया लेवल की पोएट्री कॉम्पिटिशन में प्रथम आई थी और उस प्रतियोगिता की निर्णायक महादेवी वर्मा जी थीं। पीएन सर की रचनाओं और समीक्षाओं में छायावाद का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।

अब वापस चलते हैं मुम्बई महोत्सव के यादों के झरोखे में......कार्यक्रम के बाद हम सबका चौपाटी जाना निश्चित हुआ। तब तक मैं कुछ लोगों को पहचानने लगी थी। मैं, सविता चड्ढा दीदी और मधु चतुर्वेदी दीदी को एक ऑटो में बैठाकर रवाना किया गया। ऐसे ही सब जन, कोई कार, कोई ऑटो से चौपाटी पहुंचे। रात के साढ़े आठ बजे थे। हंसी-मज़ाक करते हुए यह तय हुआ कि, सी-बीच पर काव्य गोष्ठी की जाए। अब कई वरिष्ठ कवि/साहित्यकार जब एक साथ हों तो यह तो लाज़मी है। वरिष्ठ कवयित्री मधु चतुर्वेदी जी बन गईं संचालिका और पीएन सर बने माइक पकड़ने वाले (माइक तो असल में था ही नहीं, सिर्फ हाथ की मुठ्ठी से, जो भी कुछ कह रहा था उसके आगे वे जैसे माइक लगाते हैं, वैसे वो मुट्ठी बना हाथ आगे कर देते।) अब कवि सम्मेलन शुरू कौन करे? पीएन सर ने ज़ोर से हंसकर मेरी तरफ इशारा किया, सबसे कनिष्ठ से।

मैं तो डर ही गई, इतने सब वरिष्ठ कवि! मैं सबसे पहले कैसे? खैर, मधु चतुर्वेदी दीदी का आदेश हो गया कि, सबसे छोटे से शुरू करेंगे। तो पहले मैं, फिर कल्पना पाण्डे जी ने, फिर उसके बाद अपनी-अपनी सीनियरिटी के हिसाब से सब कविताएं सुनाने लगे। लोग रुक-रुक कर सुनने लगे।

अभी 10 बजने को थे इतने में गुरु जी पंडित सुरेश नीरव जी की तबीयत बिगड़ने लगी, उनसे बैठा नहीं जा रहा था। तो गुरु जी, गुरु मां और कुछ अन्य लोग होटल लौट गए। अब हम कुल शायद 6 लोग बचे, बाकी दो-तीन का मुझे याद नहीं, पर माइक पकड़ने वाले पीएन सर और हमारी गोष्ठी की संचालिका मधु चतुर्वेदी जी को, इतनी देर में मैं बड़े अच्छे से पहचानने लगी थी। अब पीएन सर और मधु चतुर्वेदी दीदी ने लगातार कविताएं सुनाना शुरू किया। 10 बजे चौपाटी की दुकानें बंद होने लगी थीं, तो हम सीढ़ियों पर आकर बैठ गए। मधु दीदी की बुलंद आवाज़ से लोग ठिठकते और कविता सुनने लग जाते, एक छोटा-सा मजमा जैसा लग गया था उस दिन चौपाटी पर। हम लोग साढ़े ग्यारह तक वहां बैठे रहे।

मेरे लिए साहित्य के इस रूप से परिचय होना एक अनुपम अनुभव था। इतनी सुंदर कविताएं मैंने पहली बार सुनी थीं। दूसरा, मैं इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ थी कि, जिनके साथ मैं हूं, यह सब लोग अपने-अपने कार्यक्षेत्र में मील के पत्थर की तरह हैं। हम लोग हंसी-मज़ाक करते वापस लौटे और उसके बाद भी डेढ़ बजे तक लॉबी में गप्पें मारते रहे। अगले दिन मेरी शाम 7.30 की फ्लाइट थी और मुझे अपनी सहेली से मिलते हुए निकलना था तो, मैंने सुबह 11 बजे सभी साहित्यकारों से विदा ले ली।

बस.... उसके बाद जीवन चलने लगा। फिर मार्च में पहला लॉकडाउन लगा और अप्रैल के अंत में समिति के लाइव शुरू हुए। मेरी समीक्षा 'चर्चा-चकल्लस' शुरू हुई। कुछ दिनों बाद पीएन सिंह सर की भी सामीक्षाएं शुरू हुईं। उनके छायावादी लेखन का प्रभाव उन समीक्षाओं में अनवरत देखने को मिलता है। अद्भुत शब्दावली के साथ वो उस लाइव कार्यक्रम की समीक्षा कर देते थे। मेरी उनसे अंतिम बात 21 अप्रैल 2021 को हुई, उसके बाद उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया। पटना से गायिका नूपुर रंजन जी के माध्यम से उनके हाल-चाल मिलते रहे।
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और अब अंत में... : कभी-कभी कुछ बातें आपको किसी व्यक्ति से ज़्यादा जोड़ देती हैं। कमोबेश, मेरी हालिया आई किताब 'यादों के पत्ते' की समीक्षा उनके द्वारा की गई अंतिम समीक्षा थी। इस किताब में मैंने अपने दिवंगत पति कैप्टन आशीष की यादों के पत्तों को संजोया है। जिसके लिए उन्होंने मुझे मुबारकबाद दी और पुस्तक कैसे मिलेगी इसकी जानकारी ली। पर अभी लॉकडाउन में अमेज़ॉन ने कई वस्तुओं की डिलीवरी रोक दी है। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि किताब उन्हें कैसे मिलेगी तब मैंने उन्हें पीडीएफ भेजी।

उन्होंने कहा, वह इसकी समीक्षा अवश्य लिखेंगे। इसके बाद पटल पर उनकी पोस्ट आई कि कुछ दिन वह लाइव की समीक्षा नहीं लिखेंगे। पता चला, उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं। मैंने 21 अप्रैल 2021 को, हाल-चाल जानने के लिए फ़ोन किया। उन्होंने बताया घर में सबको कोरोना हुआ है पर सब ठीक हो रहे हैं। चिंता की कोई बात नहीं। फिर इधर-उधर की बात में मैंने उन्हें बताया कि उस दिन यानी 21 अप्रैल को मेरे दिवंगत पति का जन्मदिन भी था। इस पर बोले, देखो तबियत ठीक लगी तो आज ही लिखूंगा तुम्हारे यादों के पत्तों की समीक्षा। तुम्हारे आशीष का बर्थ डे गिफ्ट।

शाम पांच बजे उनका मैसेज आया कि, मेरे दूसरे नम्बर पर अपना, आशीष जी का और बुक का कवर भेजो। मैं तो बड़ी खुश हो गई। उन्होंने तीनों फ़ोटो से सुंदर कोलाज बनाकर, मेरी कविताओं की अद्भुत समीक्षा कर पटल पर डाली। देश के वरिष्ठ समीक्षक से इस तरह, एक विशेष दिन पुस्तक समीक्षा पाना मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर बन गया। अपनी समीक्षाओं और रचनाओं के शब्दों के सागर में आप हमेशा साथ रहेंगे पीएन सर।
 
उनकी यह आदत थी अक्सर वो, उनके द्वारा रचित और कंपोज़ किए गीत से अलविदा कहते थे। अलविदा आदरणीय पीएन सर 'जय इंडियाsssss जय भारतम'।
 

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