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सबरीमाला से पहले पेनकिन्नीकव्वु भद्रकाली मंदिर में तोड़ी थी परंपरा 12 वर्षीय ज्योत्सना ने

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स्मृति आदित्य

सबरीमाला के द्वार अब महिलाओं के लिए भी खुले हैं। एक ठंडी बयार ने दस्तक दी तो याद आया कि यह शीतल फुहार पहले भी एक मंदिर में पड़ चुकी है। आइए जानें उस बच्ची के विषय में... 
 
केरल के त्रिशुर में सदियों पुरानी परिपाटी को ज्योत्सना नामक मात्र 12 वर्षीय कन्या ने गरिमामयी ढंग से तोड़ दिया। ज्योत्सना ने त्रिशुर के बरसों पुराने पेनकिन्नीकव्वु भद्रकाली मंदिर में देवी प्रतिमा की पूरे विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा की। यूं तो किसी बच्ची का इस तरह मूर्ति स्थापना का कार्य कोई चमत्कार नहीं था लेकिन ज्योत्सना के मामले में यह किसी चमत्कार से कम भी नहीं।
 
दरअसल, त्रिशुर के इस पुराने पेनकिन्नीकव्वु भद्रकाली मंदिर में प्राचीन नियमानुसार कुछ नंबुदिरी(एक विशेष जाति) समाज के पुरुष ही देव-प्रतिमा की प्रतिस्थापना कर सकते थे। यहां तक कि इसी परंपरा के चलते मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा तो दूर महिलाओं के प्रवेश तक की अनुमति नहीं थी। इस कट्टर परंपरा के पीछे महिलाओं से संबंधित कई प्रकार की नकारात्मक अवधारणाएं थी। लेकिन तमाम प्रश्नों और रिवाजों के बीच जब नन्ही-सी ज्योत्सना ने धाराप्रवाह मंत्रोच्चार के साथ देवी पूजन, दीप आराधना और 'प्रतिष्ठा कर्मम' संपन्न किया तब समूचे समाज ने उसका करतल ध्वनि से अभिनंदन किया। 
 
मुद्दा यह नहीं है कि एक नन्ही बालिका पुरुष-प्रधान समाज में पुरुषों की मानी जानी वाली विरासत को कैसे चुनौती देती है, सवाल यह भी नहीं है कि बच्ची परिवार और समाज के सहयोग से इस कार्य को कैसे बखूबी निभा लेती है, सवाल यह है कि आने वाली नारियां बहुत कम उम्र में इस तरह की सोच को अंजाम दे पा रही हैं। खेलने और खाने की अल्हड़ अवस्था में वह स्वयं के निर्णय ले पा रही हैं। निर्भरता की आयु में आत्मनिर्भरता की गाथाएं रच रही है। 
 
इस नन्ही-सी कन्या ने कीर्तिमान को रचने से पहले लगातार दो वर्ष तक सारे पारंपरिक अनुष्ठान और संस्कारों को विधिपूर्वक अपने पिता से सीखा। त्रिशुर के नंबू‍दिरी ब्राह्मण थैक्किन्यदात पद्मनाभन और अर्चना अंतरजनम की इस लाड़ली का बचपन से ही पूजा-पाठ की ओर गहरा रूझान दिखाई देने लगा था। 
 
जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, मंत्र, श्लोक आरती,स्तोत्र, ऋचाएँ उसे कंठस्थ होती गई। ज्योत्सना, केरल के मान्यता प्राप्त पांडित्य परंपरा थारानाल्लुर से ताल्लुक रखती है। केरल में थारानाल्लुर और थाजामोन दो ऐसी ब्राह्मण धाराएं हैं जो पूजन, विधि-विधान, अनुष्ठान और संस्कारों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। यहाँ तक कि इन दो समाज के अतिरिक्त किसी और समाज का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो सकता। माना जाता है कि भगवान परशुराम जी द्वारा ये दोनों कुल केरल लाए गए हैं।
 
कट्टर जातिवाद के इस माहौल में भी जब परंपरा की बात आती है तो सिर्फ दो जातियां शेष रह जाती है। वह दो जातियां जो समूची सृष्टि में व्याप्त है। एक महिला और दूसरी पुरुष। यही कारण है सदियों के चले आ रहे इसी भेदभाव की प्रतिछाया बना केरल का मंदिर, जहां  देवी के मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश निषेध है। देवी जो स्वयं स्त्री शक्ति का प्रतीक है और एक स्त्री जो स्वयं देवीस्वरूपा है, एक दूजे के लिए अस्पृश्य कैसे हो सकती है? प्रकृति ने जिसे जन्म देने जैसे पवित्र कर्म और विलक्षण गुण से नवाजा है, उसी की निरंतर प्रक्रिया उसके लिए अछूत होने का सबब कैसे बन जाती है? 
 
बहरहाल, भद्रकाली पेनकिन्नीकव्वु की ज्योत्सना द्वारा स्थापित प्रतिमा मंदिर की दूसरी दैवीय प्रतिमा है। मंदिर के प्रमुख देवता भगवान विष्णु हैं। 
 
जब 2010 में ज्योत्सना ने एक भी शब्द, मात्रा और ध्वनि की त्रुटि किए बिना निर्विघ्न पूजन संपन्न किया था तो भक्तजनों के साथ उसके उन नन्हे सहपाठियों के चेहरे भी चमक उठे थे जो उस वक्त मंदिर में अपनी सखी का उत्साह बढ़ाने के लिए मौजूद थे। 
 
ज्योत्सना ने किसी पारंपरिक पंडित-पुजारी की तरह ही मंदिर के गर्भगृह का द्वार बंद किया और दीप आराधना में प्रशस्ति वाचन किया,शक्ति का आह्वान किया तो श्रद्धालुओं के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा।

ज्योत्सना पूरे आत्मविश्वास के साथ आनुष्ठानिक रीतियों को एक के बाद एक संपन्न करती रही। उसने मुस्कुराते हुए 'प्रसादम' का वितरण भी ऐसे किया जैसे वह सालों से यही कार्य करती आ रही हो। 
 
इस विधान के पश्चात यकीनन मां दुर्गा भी अपनी आराधना पर सच्चे दिल से मुस्कुरा उठीं होंगी। अपना ही दिव्य प्रतिबिंब ज्योत्सना में निहार धन्य हो उठीं होंगी। धूप और गुगल के सुगंधित वातावरण में यह पवित्र भाव भी महक उठा होगा कि देवी की पूजा 'देवी' को अधिकार देने से सफल होगी, देवी को वंचित करने से नहीं।
 
ज्योत्सना के पिता टी. पद्मनाभन ने सहज भाव से बताया कि जब ज्योत्सना ने इस तरह मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का निर्णय लिया तो किसी भी प्रकार का विरोध का सवाल ही खड़ा नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि मात्र पुरुष ही प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा कर सकते हैं महिलाएं नहीं।' 
 
पवित्र कुल की यह विदुषी कारंचिरा के सेंट जेवियर स्कूल की छात्रा है। ज्योत्सना के शिक्षक कहते हैं, वह पढ़ाई में भी अव्वल है। खुद ज्योत्सना कहती है, यह सच है कि मेरा अपनी प्राचीन धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का सपना है लेकिन इसके लिए मैंने पढ़ाई से समझौता नहीं किया है ना ही करूंगी। पढ़ाई के साथ-साथ शास्त्रों को पढ़ने, मंत्रों और विधानों को सीखने में मेरी व्यक्तिगत रूचि है। 
 
इस अनूठे क्रांतिकारी कदम से केरल के कट्टरपंथियों में यह बहस शुरू हो गई थी कि कहीं घटनाक्रम के साथ ही सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा ना सिर उठा लें। आज इतने सालों बाद सबरीमाला मंदिर पर यह फैसला आया तो नन्ही ज्योत्सना की याद आना स्वाभाविक था। 
 
ज्योत्सना जैसे उदाहरण पारंपरिक लेकिन अजीब सोच के समक्ष छोटा किन्तु ठोस जवाब बनकर उभरते हैं। इन उदाहरणों से परिवर्तन का बादल तो नहीं उमड़ेगा लेकिन सार्थकता की कहीं ना कहीं, कोई ना कोई छोटी-सी बूंद तो अवश्य ही पड़ जाएगी। 
 
सबरीमाला फैसले के बाद उस नाजुक सी थांथरी (पुजारिन) के साहस को सलाम..जिसने 2010 में यह कदम उठाया था।   

सन 2010 में वेबदुनिया द्वारा ज्योत्सना पर मलयालम और हिन्दी में विशेष फीचर प्रकाशित किया गया था।  


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