क्या पाकिस्तान से युद्ध करना चाहिए?

सचमुच ही युद्ध किसी समस्या का हल नहीं, लेकिन यदि बातचीत ही समस्या का हल होती तो राम-रावण का युद्ध नहीं होता और महाभारत का युद्ध भी नहीं होता। मैं यहां युद्ध का पक्ष नहीं ले रहा बल्कि यह बता रहा हूं कि इतिहास क्या कहता है। युद्ध ने ही इतिहास को बदला है। भारत हमेशा ही युद्ध से बचता रहा है और जब उस पर युद्ध थोपा गया तो वह नैतिक युद्ध के पक्ष में रहा है।
 
 
भारत ने कभी भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। आक्रमणकारी आए और नैतिकता को ताक में रखकर वो हमारे लोगों को बेरहमी से कुचलते गए। उन्होंने औरतों, बच्चों और संतों को भी नहीं छोड़ा। इतिहास को पढ़िये। हम युद्ध करने के लिए कभी बाहर नहीं गए, इसीलिए हमारी ही धरती को रक्त से लाल किया जाता रहा।
 
 
पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को कितनी बार छोड़ा, यह शायद सभी जानते होंगे। इंदिरा गांधी ने भी पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को छोड़कर हमारे सैनिकों का बलिदान व्यर्थ कर दिया था। इससे पहले 1965 में हमारी सेना लहौर तक चली गई थी। क्यों नहीं लाहौर पर कब्जा बरकरार रखा? लेकिन हम नैतिक लोग हैं। पाकिस्तानी सेना ने 1947 में कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर के एक बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया था जो अभी तक बरकरार है। खैर.. हम बहुत नैतिक, सहिष्णु और उदार लोग हैं। हमारे खून में अहिंसा है। इस अहिंसा को आप भले ही कहते रहे कि इसे हमारी कमजोरी न समझें लेकिन आपकी इसी अहिंसा का शत्रुदेश हमेशा फायदा उठाता रहा है और रहेगा।
 
 
अब मूल सवाल पर आते हैं...क्या पाकिस्तान से युद्ध करना चाहिए?
 
इस सवाल का जवाब आप 100 लोगों से पूछिए। उनमें से 60 से 70 लोग कहेंगे की अबकी बार आरपार। अब जो बच गए लोग हैं वे क्या कहेंगे? संभवत: उनमें से कुछ कहें पाकिस्तान का आर्थिक रूप से बहिष्कार करो, सिंधु जल संधि तोड़ो या कहेंगे कि युद्ध से ज्यादा जरूरी है विकास। इसमें से कुछ ऐसे भी हैं जो कहेंगे कि पाकिस्तान से युद्ध लड़ने से ज्यादा जरूरी है कि देश के गद्दारों का खात्मा करो।
 
 
आप कह सकते हैं कि जनता भावावेश में सोचती है। जनता की भावनाओं को समझा जा सकता है, लेकिन प्रैक्टिकल तौर पर सोचे तो युद्ध करना बहुत ही खतरनाक होगा, क्योंकि पाकिस्तान 1965 या 1971 का पाकिस्तान नहीं रहा। उसने युद्ध हारने के बाद ही पूरे पाकिस्तान को आतंकवादी मुल्क बना दिया है। उसकी सेना भी पहले जैसी सेना नहीं रही। अब उसके पास अमेरिका, रशिया और चीन के हथियार है।...निश्चित ही ऐसा सोचकर आप खुद को, सेना को और समूचे देश के मनोबल को कमजोर करते हो, युद्ध के परिणाम से डरते हो। परिणाम की चिंता जो करता है उसके निर्णय भी कमजोर हो जाते हैं और जिसके निर्णय कमजोर हो जाते हैं वह क्या खाक देश की रक्षा करेगा और क्या खाक देश को दिशा दिखलाएगा।
 
 
आप डिप्लोमेटिक बनकर डिप्लोमेसी करते रहे इससे पाकिस्तान को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आप पिछले सत्तर साल से पीठ पर खंजर खाते रहे हैं और आगे भी खाते रहेंगे।पाकिस्तान ने धीरे-धीरे जिस कश्मीर का भुगोल और जनसंख्‍या का समीकरण बदला है वह आपको दिखाई नहीं देता। आपको यह भी दिखाई नहीं देता कि वह अन्य राज्यों में क्या कर रहा है। आप युद्ध मत करिए बस कूटनीति करिए।
 
 
आखिर युद्ध से क्या होगा? हमारे सैनिक जीत भी गए तो क्या होगा? लहौर वापस कर देंगे? उनके सैनिक छोड़ देंगे। फिर से कोई लाइन ऑफ कंट्रोल होगी। फिर से ताशकन्द समझौते या शिमला जैसा कोई समझौता किया जाएगा? नहीं, फिर से एक बांग्लादेश बना दिया जाएगा। बस यही ख्‍वाहिश है कि बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों को न्याय मिले।... 
 
 
आप फिर कहेंगे की आपने तो युद्ध का पक्ष ले ही लिया। नहीं, जरा आप सोचीए...हमारे सैनिकों के पास हथियार है, लड़ने का साहस है, मातृभूमि पर मर-मिटने का जज्बा है और जीतने का हौसला है, लेकिन दुख तो तब होता है जब हथियार रखे के रखे रह गए, सीमा पर लड़ने और दुश्मन को मजा चखाने की ख्वाहिश मन में ही रह गई और कह गए अलविदा....जय हिन्द।...जरा सोचीए कि इस छद्म युद्ध से हमें क्या मिला?
 

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