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श्रद्धा- आफताब पर कुछ चुभते सामाजिक सवाल

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गरिमा संजय दुबे

पिछले कुछ दिनों की घटना ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं। आधुनिकता की भ्रमित परिभाषाओं का शिकार हो युवा पीढ़ी पतन के गर्त में जा रही है। और युवा ही क्यों आधुनिकता की इस परिभाषा का शिकार अधेड़ भी हो रहे हैं, नतीजा अनैतिक संबंध, बिखरते परिवार, नशे और यौनिक अपराधों में लिप्त एक परिदृश्य। हर दिन कुछ झकझोरने वाली खबरें, इन्दौर में लड़कियों द्वारा किया गया उत्पात हो, या श्रद्धा वाकर की हत्या, बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म, सब भयावह हैं।

नीला जहर जो सर्वसुलभ है, OTT पर विभत्स हिंसा और यौन विकृतियों को आधुनिकता के नाम पर हर दिन परोसा जा रहा है, फ़ोन और सब्सक्रिप्शन सबके पास है, किसी के पास ठहरकर देखने की फुर्सत नहीं कि उसका बच्चा या परिवार का सदस्य किस तरह का मानसिक भोजन ग्रहण कर रहा है।

परिवार अब बचे कहां जो चिंता करें
उस पर हर संस्कार, मर्यादा, परिवार समाज के हर नियम को हर ढांचे को शोषण का आधार बताती बौद्धिकी, स्वतंत्रता के नाम पर केवल स्वच्छंदता सिखाता साहित्य और सिनेमा, किसी भी माध्यम से अपनी इच्छाओं को पूरा कर लेने को उकसाता एक पूरा तंत्र खड़ा किया गया है जिसमें सौम्यता, सरलता, सहजता, संस्कार को पिछड़ा बताने के पूरे सामान मौजूद हैं, ध्यान दीजिए ऐसा लिखने वाले और दिखाने वाले अपने परिवार में खुश हैं, अपने बच्चों का विवाह करते हैं उनके लिए लिव इन या उन्मुक्त विकृत यौन संबंधों का विकल्प नहीं देते, किंतु अपनी लेखनी और सिनेमा में ऐसी आधुनिकता की पैरवी करते हैं, प्रश्न अवश्य पूछिए उनसे कि जो आधुनिकता दिखाई या पढ़ाई जा रही है क्या वे उसी आधुनिकता को अपनाएंगे, यदि नहीं तो वे समाज में एक खतरनाक ज़हर फैलाने के अपराधी हैं। हर नकारात्मकता का आधुनिकता के नाम पर महिमामंडन किया जा रहा है।

इस ज़हर से बचने के रास्ते हमें ही ढूंढने होंगें
भारतीय विवाह संस्था पर प्रश्न उठाना बहुत सामान्य चलन है इन दिनों, निश्चित ही पीड़ित दाम्पत्य से अच्छा है विलग हो जाना, किंतु कुछ के बुरे अनुभव पूरे समाज का सच नहीं है। भारतीय मूल्यों में विवाह कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, वह बंधन है, बंधन है कर्तव्यों की पूर्ति का, सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन का, उसे बंधन कहा ही इसलिए गया है कि वहां नर और मादा के रुप में आप केवल अपनी दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं जुड़ते हैं, अपितु संसार की दो महत्वपूर्ण इकाइयों स्त्री पुरुष के रुप में परिवार समाज के दायित्व की पूर्ति की अपेक्षा भी आपसे होती है। इसलिए बच्चों को फिल्मी प्रेम और विवाह की परिभाषा से इतर प्रारंभ से यह सिखाया जाना चाहिए कि विवाह मौजमस्ती और मनमानी करने का खिलौना नहीं है, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है, जिसको दोनों को मिलकर निभाना है, जो बच्चे इस जिम्मेदारी को निभा सकें वे ही इसमें प्रवेश करें अन्यथा अकेले रहने का विकल्प भी चुना जा सकता है, विवाह में जबरन ढकेले जाने और संबंध विच्छेद की पीड़ा से बेहतर है बच्चे अकेले रहे, इसकी सामाजिक स्वीकार्यता होनी चाहिए।

स्त्री पुरुष का गठ बंधन दोनों के कर्म क्षेत्र को ध्यान रख कर किया गया है, दाम्पत्य एक बहुत सुंदर व्यवस्था है जहां जीवन का हर रस है, कभी जिम्मेदारियों का बोझ है तो उनकी पूर्ति का संतोष भी। हां दहेज, हिंसा, अपमान जैसी विकृति होने पर कानून का सहारा लेना या उससे अलग होना कतई गलत नहीं है किंतु केवल जिम्मेदारियों से भागकर, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के नाम पर, अहंकार और जिद में परिवारों को तोड़ा जाना दुखद है।

विकृतियों किस व्यवस्था में नहीं होती हमारी वैवाहिक सामाजिक पारिवारिक ताने बाने में भी थीं, हैं भी, किंतु उन्हें दूर करने की कोशिशें भी हुई हैं, और बहुत कुछ बदला भी है। और क्या हर व्यक्ति विवाह और परिवार में शोषित पीड़ित ही है। कोई सुखी नहीं है, सफल स्त्रियों के पीछे पुरुषों के सहयोग का दृश्य क्या आपको नज़र नहीं आता, क्या स्त्री की सफलता में परिवार का योगदान, सहयोग आपको दिखाई नहीं देता, अगर नहीं दिखाई देता तो यह दृष्टि दोष है या आपने अपने पूर्वाग्रहों का चश्मा चढ़ा रखा है जिसमें कुछ पीड़ित अनुभाव ही दिखाई देते हैं। उन पीड़ित अनुभवों को भी यदि आप समग्रता से देखेंगे तो पाएंगें वह केवल एक अध्याय है, कभी पीड़ा भी हुई कभी सुख भी मिला, कभी उल्लास भी था कभी उदासी भी, कभी उपलब्धियां भी थीं, प्रेम भी था वात्सलय भी था, झगड़ा भी था, नोक झोंक भी, किंतु आपने किसी के जीवन की किताब से केवल दुःख वाला पन्ना पढ़कर यह सोच लिया कि पूरा जीवन ही दुखद था और उसी अनुभव की कसौटी पर समाज परिवार के हर रिश्ते नाते कसे तो यह बहुत नकारात्मक दृष्टी होगी, किसी के भी जीवन को समग्रता से देखने पर हर भाव का मिश्रण दिखाई देता है, इसलिए विवाह परिवार जैसी संस्था को नकारना हानिकारक है।

सर्वे करके देखिए तमाम बुराइयों के बावजूद जिनका पारिवारिक जीवन सुखी है वे अधिक संतोषी, सुखी व सफल हैं, उन्होने अन्याय को सहा नहीं प्रतिकार किया किंतु परिवार तोड़ा नहीं, वहीं हल ढूंढे जहां समस्या थी। भारतीय समाज न तो लिव इन के लिए तैयार है, न उन्मुक्त यौन आचरण के लिए क्योंकि थोड़ी ही सही लेकिन परवरिश में दैहिक शुचिता का मन से संबध जुड़ा है, पश्चिम की तरह दैहिक संबध केवल देह पर घटकर समाप्त नहीं होते, हम उसमें प्रेम ढूंढने लगते हैं, प्रेम के साथ बंधन, अपेक्षाएं स्वतः आ जाती हैं, फिर वह अपने आप विवाह तक चला जाता है, और यदि वह विवाह तक न पहुंचे तो भी अवसाद विषाद पैदा करेगा, विवाह तक पहुंचे तो भी जिम्मेदारियों के बोझ में झटपटाएगा, और बिना किसी आधार का संबंध आपके मन में अपराध बोध बनकर आपको विक्षिप्त कर देगा।

एक सहज सर्वे कीजिए उन्मुक्त आचरण करने वाले क्या सुखी हैं, क्या उन्होने वह पा लिया जो वे चाहते थे, मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है ऐसे लोगों में एक अजीब सी असामान्यता, अजीब सा विचलन, अजीब सी मानसिक उलझन, अजीब सा व्यवहार मैंने देखा है, वे अस्थिर हैं, उन्हें नहीं पता होता वे कहां उलझे हैं, बात करने वाले को समझ आ जाता है, स्वाभाविक सी बात है जब आप कुछ भी अस्वाभाविक असामान्य करते हैं, जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है, (सामाजिक मान्यता किसे मिले किसे नहीं यह एक अलग विषय है) तो भीतर से आत्मा कचोटती है, धिक्कारती है, क्योंकि हैं तो आप भारतीय ही ना, तमाम कोशिशों के बावजूद वह जीवन मूल्य आपके डीनए का हिस्सा हैं जिन्हें आप लगातार नकारते हैं और एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है if you resist, it will persist, जितना नकारेंगे उतनी तीव्रता से आपको वे परेशान करते हैं। आप भ्रमित हैं, जानते ही नहीं चाहते क्या हैं, क्या दैहिक स्वतन्त्रता से सुख मिल गया, क्या सभी नियमों से परे हो वो पा लिया जिसकी इच्छा थी।

फिर कहती हूं आधुनिकता के नाम पर स्त्रियां अधिक छली जा रहीं हैं, जिसे वे स्वतन्त्रता समझ रही हैं प्रकारांतर से वे उनके और भी भयानक शोषण का षडयंत्र है। नियम, बंधन, संतुलन को कुछ दोस्त बुरा कहते हैं, ध्येय ही यह कि हर घोषित नियम से विपरीत आचरण करना है, वे यह नहीं जानते या मानना नहीं चाहते कि प्रकृति में सबके लिए नियम, बंधन, संतुलन, अनुशासन है, प्रकृति का हर अवयव अपनी सीमा में प्रकृति के संतुलन को बनाए रखता है, यह मनुष्य ही है जो किसी नियम को मानना नहीं चाहता। निश्चित रूप से गलत परंपराओं, कुरीतियों, हिंसा का, मनुष्य को उसकी गरिमा से विलग करने वाले किसी भी नियम का विरोध हो, किंतु एक ज़िद के तहत हर नियम, हर व्यवस्था का विरोध तो मूर्खता ही कही जाएगी।

नोट :  आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया का आलेख में व्‍यक्‍त विचारों से सरोकार नहीं है।

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