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न्यायाधीश स्वामीनाथन पर महाभियोग की कोशिश भयभीत करने वाली

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High Court
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध विपक्ष द्वारा पिछले संसद सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल अभूतपूर्व और अचंभित करने वाली थी। किसी न्यायाधीश को उसके न्यायिक निर्णय या आदेश के विरुद्ध महाभियोग लाने के लिए हमारे माननीय सांसद इस तरह एकजुट हो जाएंगे इसकी कल्पना नहीं थी। हालांकि इसके विरुद्ध 56 पूर्व न्यायाधीश सामने आ गए जिन्होंने खुला पत्र में इसे न्यायालय पर राजनीतिक वैचारिक दबाव बनाने और डराने की कोशिश कहा। 
 
वास्तव में तमिलनाडु में आईएनडीआईए सरकार का नेतृत्व करने वाली द्रमुक के आह्वान पर एक साथ 107 सांसदों का लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंचकर महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की घटना हर दृष्टि से असाधारण थी। अभी तक न्यायाधीशों को उनके आचरण, कदाचार आदि के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा या उसकी कोशिशें हुईं। 
 
पूर्व न्यायाधीशों ने कहा है कि सांसदों के आरोप मान लिए जाएं, तब भी किसी न्यायाधीश को उसके विचारों या फैसलों के आधार पर महाभियोग की धमकी देना न्यायपालिका की आजादी पर हमला है। अगर इस तरह किसी सरकार राजनीतिक दल या दलों के समूह को न्यायाधीश का फैसला स्वीकार नहीं हो और वह महाभियोग प्रस्ताव लाने लगे तो फिर हर न्यायाधीश डरने लगेगा। 
 
वास्तव में इस प्रकरण के तीन प्रमुख पहलू है। पहला, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन द्वारा दिया गया फैसला और उसकी पृष्ठभूमि। दूसरा, संबंधित विवाद की सच्चाई। और तीसरा महाभियोग प्रस्ताव के पीछे की सोच या विचारधारा। 
 
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने तिरुप्परनकुंद्रम मंदिर पर परंपरागत उत्सव के दीप जलाने का एक आदेश 1 दिसंबर को दिया तथा प्रशासन द्वारा उसका पालन न करने पर तीखे शब्दों में दूसरा आदेश 4 दिसंबर को दिया। न्यायालय ने 4 दिसंबर के आदेश में इसे न्यायपालिका की अवमानना करार देते हुए हर हाल में लागू करने की बात की। 
 
द्रमुक सरकार ने इसे सांप्रदायिक निर्णय माना और उनके विरुद्ध राजनीतिक अभियान चल निकला है। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। दरअसल,तिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर से संबंधित पत्थर स्तंभ- दीपथून पर दीपक जलाकर कार्तिगई दीपम त्योहार मनाने की परंपरा है। 
 
तमिल महीने कार्तिगई (नवंबर-दिसंबर) में मनाए जाने वाले ‘कार्तिगई दीपम’ उत्सव के तहत, हमेशा की तरह उच्ची पिल्लैयार मंदिर के मंडपम में दीप जलाने के लिए जब लोग जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया था। तिथि के अनुसार 3 दिसंबर को दीप जलाया जाना चाहिए था किंतु ऐसा नहीं हो सका।

इसके बाद यह बड़ा मुद्दा बन गया और न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका डाली गई जिसके तहत यह आदेश आया। मंदिर और पहाड़ी की सुरक्षा में लगे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों के साथ जब श्रद्धालु दीपक जलाने जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें फिर रोक दिया। 
 
तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर से 10 किमी दूर है जिस पर यह मंदिर अवस्थित है। सनातन और हिंदू मान्यताओं में यह भगवान मुरूगन या कार्तिकेय के छ: निवास स्थानों में से एक है। मुरूगन भक्तों के लिए इसके महत्व को आसानी से समझा जा सकता है। विवाद का मुख्य कारण पहाड़ी के ऊपरी भाग पर स्थित सिकंदर वधुसाह का दरगाह है। 
 
जैसा हम जानते हैं तमिलनाडु वैष्णव और शैव दोनों पंथों का आधार और मुख्य विस्तार भूमि रहा है। वैष्णव परंपरा के कवि और संत 12 अलवरों तथा 63 नयनारों यानी शैश परंपरा के कवियों और संतों में से अधिकांश तमिल क्षेत्र से आए थे। मंदिर समर्थकों की मान्यता है कि यह पूरी पहाड़ी शिवलिंग है जिसके बीच में भगवान मुरूगन का मंदिर है। 
 
यह सच है कि जब दिल्ली सल्तनत का साम्राज्य यहां तक फैला उसके बाद से समस्या शुरू हुई। सिकंदर वधुशाह का दरगाह 17वीं शताब्दी में बना था जबकि मंदिर का उल्लेख छठी शताब्दी तक मिलता है। विजयनगर साम्राज्य ने दिल्ली सल्तनत को पराजित कर मंदिर और वहां की परंपरा को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ पुनर्स्थापित किया। बाद में समस्या फिर बढ़ी और अंग्रेजों के काल में इसे लेकर लगातार विवाद होते रहे। न्यायालय के कुछ फैसले भी हैं जिनमें 1920 के एक आदेश का न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने उदाहरण भी दिया है।
 
द्रमुक के संस्थापक ईवी रामास्वामी नायकर यानी पेरियार की पूरी सोच सनातन या हिंदू धर्म के विरुद्ध थी। अपने पिछले कुछ सालों में  द्रमुक नेताओं द्वारा सनातन को वारस से लेकर डेंगू मलेरिया अधिक कहकर निंदा करने और इसके हर हाल में विरोध के जो स्वर सुने जा रहे हैं वो इसी विचारधारा से निकली है।

द्रमुक की राजनीति इस हिंदू धर्म के विरोध पर टिकी है जिसे कुछ लोग नास्तिकतावाद भी कहते हैं। हालांकि विडंबना देखिए कि उसे नास्तिकतावाद में इस्लाम या ईसाइयत का विरोध नहीं है। जब पूरे भारत में स्वतंत्रता के बाद लंबे कालखंड से पड़े ऐसे अनेक विवाद अनसुलझे रह गए तो फिर तमिलनाडु में इसके सुलझाने की संभावना ही नहीं थी। द्रमुक सरकार हिंदू संगठनों के विरुद्ध कितना आक्रामक रहती है एवं उनके कार्यक्रमों तक को रोकने के कदम उठाए जाते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं।
 
किंतु धीरे-धीरे तमिलनाडु में इसके विरुद्ध संगठन और समूह खड़े हुए जो मुखर होकर सामने आने लगे हैं। तिरुप्परकुंदरम विवाद पिछले दिनों तब ज्यादा गहराया जब कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे सिकंदर मलाई पहाड़ी नाम देने की मांग कर आंदोलन शुरू किया।

कुर्बानी की कोशिश हुई जिसका विरोध हुआ। इन कारणों से वहां तनाव की स्थिति बनी या जानबूझकर बनाई गई और मंदिर के सामान्य पूजा पाठ को छोड़ अन्य गतिविधियों को प्रशासन ने लगभग रोक दिया। ऐसा नहीं होता तो कार्तिकेय दीपम के लिए न्यायालय जाने की आवश्यकता ही नहीं होती। दक्षिण में भगवान मुरूगन सर्वाधिक पूजे जाने वाले देवताओं में है और इनको मानने वाले में समाज के पिछड़े वर्ग की संख्या ज्यादा है।
 
पूरे विवाद को निष्पक्षता से देखने के बाद आप अपना निष्कर्ष निकालिए। किंतु मान लीजिए कोई सरकार या पार्टी न्यायाधीश के फैसले से असहमत है तो उसका रास्ता महाभियोग होगा? उच्च न्यायालय की एकल पीठ के विरुद्ध बड़ी पीठ में जाया जा सकता था। आपके लिए उच्चतम न्यायालय का रास्ता खुला है। ऐसा लगता है कि चूंकि तमिलनाडु सरकार को सच मालूम है इसलिए न्यायालय में पुनर्विचार याचिका डालने की जगह ऐसा दबाव बनाओ ताकि आगे इस तरह के फैसले देने से डरे। 
 
56 न्यायाधीशों ने अपने पत्र में लिखा है कि आपातकाल में भी न्यायाधीश राजनीतिक आसहमति के कारण निशाने पर आए थे और तब भी न्यायपालिका ने स्वतंत्रता की रक्षा बनाए रखने के लिए लड़ाई लड़ी थी। वस्तुत: महाभियोग न्यायपालिका की ईमानदारी की रक्षा करने के लिए है, न कि जजों पर दबाव डालने या बदला लेने के लिए इस्तेमाल करने।

हाल के वर्षों में कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, एसए बोबडे और डीवाई चंद्रचूड़ साथ ही वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भी निशाना बनना पड़ा क्योंकि कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं को उनके फैसले पसंद नहीं आए। 
 
महाभियोग और सार्वजनिक आलोचना को दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। सेकुलरिज्म के नाम पर सरकार और प्रशासन के लंबे समय से जारी ऐसे रवैयों के विरुद्ध पूरे देश और देश के बाहर हिंदुओं के अंदर गुस्सा और प्रतिक्रिया का भाव चरम तक पहुंचा है जिसकी कई परिणति हम पिछले लंबे समय से देख रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग मानने लगे हैं कि सेक्युलरवाद के नाम पर हिंदू और सनातन विरोध तथा मुस्लिमपरस्ती राजनीतिक दलों और सरकारों का चरित्र है। 
 
भाजपा के अलावा कोई राजनीतिक दल समर्थन में नहीं आता इसलिए इस गुस्से का लाभ सीधे तौर पर उसे मिलता है। द्रमुक का संकीर्ण एकपक्षीय तमिलवाद व हिंदू धर्म विरोधवाद की अपनी राजनीति है लेकिन कांग्रेस, सपा, तृणमूल आदि का भाजपा विरोध के नाम पर उनके साथ आना आने वाले समय में राजनीतिक रूप से इनके लिए और प्रतिकूल साबित हो सकता है।
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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