गोधरा और गुजरात दंगों की कहानी, जानिए कब क्या हुआ विस्तार से

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019 (14:23 IST)
बुधवार को गुजरात विधानसभा में गोधरा कांड के बाद भड़के गुजरात दंगों की जांच कर रहे नानावती आयोग की अंतिम रिपोर्ट रखी गई। गुजरात के गृहमंत्री प्रदीप सिंह जाडेजा ने सदन में रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि आयोग की रिपोर्ट में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रियों पर लगे आरोप खारिज किए गए। रिपोर्ट को तत्कालीन राज्य सरकार को सौंपे जाने के 5 साल बाद सदन के पटल पर रखा गया। जानिए क्या है गोधरा कांड और उसके बाद गुजरात में भड़के दंगों की कहानी... 
 
27 फरवरी 2002 : अयोध्या से करीब 2000 कारसेवक अहमदाबाद जाने के लिए 26 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में सवार हुए  थे। जब 27 फरवरी को ट्रेन गोधरा पहुंची तो साबरमती एक्सप्रेस की S-6 बोगी में पथराव कर आग लगा दी गई। आगजनी में 59 लोगों की मौत हो गई थी। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
 
28 फरवरी 2002 : साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाए जाने की घटना के बाद पूरा गुजरात सुलग उठा। सांप्रदायिक दंगे फैल गए। इन दंगों में 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।
 
3 मार्च 2002 : गोधरा में ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया  था। गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयोग का  गठन किया। पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) लगाई। केंद्र सरकार के दबाव के कारण सभी गोधरा कांड के आरोपियों से पोटा हटा लिया गया।
 
राज्य सरकार पर निष्क्रियता के आरोप : 2002 में दंगों में गुजरात पुलिस पर इस मामले में निष्क्रिय रहने के आरोप लगे थे। तीन दिन तक चली हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए थे जबकि कई लापता हो गए। यह भी आरोप था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दंगाइयों को रोकने के लिए जरूरी कार्रवाई नहीं की। उन्होंने पुलिस दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के आदेश दिए।
 
18 फरवरी 2003 : गुजरात में दोबारा भाजपा सरकार चुनी गई और गोधरा रेल के आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून  लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा में ट्रेन जलाए जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगाई।
 
4 सितंबर 2004 : जब राजद नेता लालूप्रसाद यादव के रेलमंत्री थे, तब केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति गठित हुई। इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जांच का काम दिया गया। नई गठित  संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और आरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।
 
17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया कि ट्रेन की एस-6 में लगी आग एक ‘दुर्घटना’ थी। समिति ने बाहरी तत्वों द्वारा आग की साजिश की आशंका खारिज कर दी। पोटा समीक्षा समिति ने राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत  आरोप नहीं लगाए जाएं।
 
यूपीए सरकार ने किया था एसआईटी का गठन : तत्कालीन यूपीए सरकार ने दंगों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी कोर्ट ने 1 मार्च, 2011 को गोधरा ट्रेन अग्निकांड मामले में 31 लोगों को दोषी पाया था और 63 को बरी कर दिया था। एसआईटी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी।
 
13 अक्टूबर 2006 : गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है। नानावती-शाह आयोग पहले ही दंगे के हर पहलू की जांच कर रहा है। बनर्जी समिति की जांच रिपोर्ट भी अमान्य करार दे दी गई।
 
गुजरात हाइकोर्ट में कई याचिका : गुजरात हाइकोर्ट सजा को चुनौती देते हुए कई याचिका लगाई गई। गोधरा ट्रेन अग्निकांड मामले में  गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए गोधरा दंगा मामले में 11 दोषियों की सजा फांसी से उम्रकैद में बदली।
1 मई 2009 : सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा मामले की सुनवाई से प्रतिबंध हटाया। सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाले  विशेष जांच दल ने गोधरा कांड व दंगों से जुड़े 8 अन्य मामलों की जांच शुरू की। गोधरा कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय  जेल के अंदर ही शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई अदालत को गोधरा कांड समेत गुजरात दंगों से जुड़े 9 अन्य संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका।
 
18 सितंबर 2008 : नानावती आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी। इसमें कहा कि यह पूर्व नियोजित षड्यंत्र था और एस-6 कोच को भीड़  ने पेट्रोल डालकर जलाया। गुजरात दंगे और उस पर की गई कार्रवाई पर न्यायमूर्ति नानावती-मेहता आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा 25 सितंबर 2009 को विधानसभा में पेश किया गया था।
 
28 सितंबर 2010 : मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में पूरी हुई, लेकिन शीर्ष अदालत की रोक के कारण फैसला नहीं सुनाया गया। सुप्रीम  कोर्ट ने फैसला सुनाए जाने से रोक हटाई। विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, वहीं 63 अन्य को बरी किया गया।
 
1 मार्च 2011 : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई।
 
18 नवंबर 2014 : रिटायर्ड जस्टिस नानावटी और जस्टिस मेहता ने 2014 में यह रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंप दी  थी। तब से यह रिपोर्ट गुजरात सरकार के पास ही थी।
 
11 दिसंबर 2019 को अंतिम रिपोर्ट : गुजरात विधानसभा में दंगों की जांच कर रहे नानावती आयोग की 1500 से अधिक पन्नों की अंतिम  रिपोर्ट रखी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि जांच में उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित कि राज्य के किसी मंत्री ने इन हमलों के लिए उकसाया या भड़काया। कुछ जगहों पर भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस अप्रभावी रही, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी  नहीं थे या वे हथियारों से अच्छी तरह लैस नहीं थे। आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में  क्लीन चिट दी। मुख्यमंत्री मोदी और उनके 3 मंत्रियों अशोक भट्ट, भरत बरोट और हरेन पांड्या की दंगे भड़काने में कोई भूमिका नहीं।
 
रिपोर्ट में अफसरों की नकारात्मक भूमिका : नरेंद्र मोदी पर कई गंभीर आरोप लगाने वाले तीन प्रमुख अफसरों- आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और राहुल शर्मा की नकारात्‍मक भूमिका के सबूत मिले हैं। इससे पूर्व 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों को लेकर जो एसआईटी बनाई थी उसने भी गुलबर्ग सोसायटी मामले में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दी थी।
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