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प्रशांत किशोर को ‘चुनावी चाणक्य’ बनाने वाली I-PAC की Exclusive इनसाइड स्टोरी

प्रशांत किशोर के I-PAC से अलग होने के बाद अब किनके कंधों पर I-PAC की जिम्मेदारी, I-PAC से क्यों सियासी पार्टियां कर रही समझौता?

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विकास सिंह

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022 (14:10 IST)
आखिरकार लंबे सस्पेंस के बाद अब यह साफ हो गया है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस में नहीं शामिल हो रहे है। कांग्रेस का ऑफर ठुकराने की जानकारी खुद प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर दी है। प्रशांत किशोर के कांग्रेस में नहीं शामिल नहीं होने की बड़ी वजह प्रशांत किशोर की कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) का अन्य राजनीतिक दलों के साथ काम करना है। दरअसल आईपैक (I-PAC) ने 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ करार किया है। गौर करने वाली बात यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस एक प्रमुख विपक्षी पार्टी है।

दरअसल प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद इस बात का एलान कर चुके है कि वह अब चुनावी रणनीतिकार की भूमिका में नहीं नजर आएंगे। ऐसे में अब लोगों की दिलचस्पी इस बात में बढ़ गई है कि आखिर प्रशांत किशोर की गैरमौजदूगी में I-PAC का संचालन किनके हाथों में होगा और क्या आईपैक पहले की तरह सियासी दलों का चुनावी मैंनेजमेंट करती रहेगी?

प्रशांत किशोर के I-PAC से अलग होने के बाद अब किनके कंधों पर होगी I-PAC की जिम्मेदारी, आखिर I-PAC से क्यों सियासी पार्टियां कर रही समझौता। पढ़िए 'वेबदुनिया' की खास खबर।  

PK के बाद अब इनके हाथों में कमान-चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने साल 2013 में सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गर्वनेंस संगठन की स्थापना की थी और बाद में यही इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी यानी आईपैक में बदल गई। 2104 से देश के सियासी गलियारों में सबसे विश्वसनीय, कामयाब राजनीतिक सलाहकार कंपनी के तौर पर जानी पहचानी वाली कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) की कमान अब ऐसे तीन व्यक्तियों के हाथों में है जो कंपनी को फाउंडर मेंबर भी है। 
देश की सबसे चर्चित राजनीतिक सलाहकार कंपनी आईपैक का मध्यप्रदेश से भी गहरा कनेक्शन है। मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के रहने वाले विनेश चंदेल आइपैक (I-PAC) के को-फाउंडर है। विनेश चंदेल भोपाल के एनएलआईयू से लॉ (Law) की डिग्री हासिल की है। वहीं I-PAC के दूसरे को फाउंडर ऋषिराज सिंह उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले है और कानुपर आईटी से पासआउट है। वहीं I-PAC के तीसरे को-फाउंडर झारखंड के रांची के रहने वाले  प्रतीक जैन है जो आईआईटी बॉम्बे से पासआउट है। 
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क्या है I-PAC चुनावी विनिंग फॉर्मूला?- I-PAC जो इन दिनों सुर्खियों में है वह राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति बनाने का काम करती है। आईपैक राजनीतिक दलों के साथ कांट्रेक्ट पर उनके लिए चुनावी रणनीति तैयार करने का काम करती है। राजनीतिक सलाहकार कंपनी के तौर पर अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली कंपनी आईपैक (I-PAC) के दिल्ली, कोलकत्ता, हैदराबाद और पटना स्थित अपने दफ्तरों से कामकाज का संचालन करते है। I-PAC करीब 600 प्रोफेशनल की टीम के साथ अपने काम को बाखूबी अंजाम देती है।
 
राजनीतिक सलाहकार के तौर पर काम करने वाली इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) राजनीतिक पार्टियों के चुनावी कैंपेन को डिजाइन करने के साथ-साथ पार्टी के उम्मीदवारों का ग्राउंड पर कैंपेन करती है। चुनाव के दौरान कंपनी के कर्मचारी विधानसभा/लोकसभा सीट पर उम्मीदवार के अनुसार रणनीति बनाते है। इसके साथ राजनीतिक दलों और पार्टी के उम्मीदवारों की डिजिटल मीडिया ब्रॉन्डिंग का काम भी आईपैक बाखूबी करती है। चुनावी कैंपेन में स्लोगन, कैंपेनिंग सॉन्ग लिखने और गढने का काम भी आईपैक करती है। सोशल मीडिया के इस दौरान कंपनी पार्टी की सोशल मीडिया पर बॉन्डिग का काम भी करती है।

सत्तारूढ़ दलों के लिए रोडमैप तैयार करने का काम-ऐसे राज्य जहां पार्टी सत्ता में है और I-PAC के कंधों पर चुनाव में एंटी इंकबेंसी फैक्टर को दरकिनार कर पार्टी को फिर सत्ता में वापस लाने की जिम्मेदारी होती है उसमें भी I-PAC अब तक खरी साबित हुई है। बात चाहे दिल्ली में आम आदमी पाटी को दोबारा सत्ता में वापसी की बात हो या बंगाल में ममता बनर्जी की प्रचंड जीत की I-PAC पूरी तरह से खरी उतरी है। 
 
दअसल पार्टी के सत्ता में रहने पर I-PAC सरकार की नीतियों के निर्माण में भी दखल देती है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले ममता सरकार का ‘द्वारे सरकार’, ‘पाड़ा-पाड़ा समाधान’ अभियान आईपैक की सलाह पर ही शुरु किया गया था। चुनाव में ममता की जीत के पीछे इन दोनों अभियानों की महत्ती भूमिका थी।
 
I-PAC का भविष्य का प्लान- इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) ने तेलंगाना में सत्तारूढ़ दल तेलंगाना राष्ट्र समिति से समझौता किया है। वहीं आईपैक से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कंपनी बहुत जल्द आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर साथ भी एक डील साइन करने वाली है। इसके साथ कंपनी से पश्चिम बंगाल में टीएमसी के साथ भी काम कर रही है। 
 
I-PAC का अब तक का सफर- 2014 में आईपैक ने सबसे पहले भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी के लिए चुनावी कैंपेन की जिम्मेदारी संभाली थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार राजनीतिक रणनीति, तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर भाजपा ने बड़ी सफलता हासिल की। हलांकि 2014 में भाजपा की जीत के बाद प्रशांत किशोर की कंपनी I-PAC और भाजपा की राहें अलग हो गईं। इसके बाद I-PAC ने 2015 में बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के गठबंधन को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद 2017 में पंजाब में अमरिंदर सिंह में नेतृत्व में चुनाव लड़ रही कांग्रेस के लिए रणनीति बनाते देखे गए। यहां भी उन्होंने सफलता हासिल की। 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस के लिए भी उन्होंन चुनाव में रणनीति तैयार की और जगन को सत्ता की कुर्सी दिलाई। वहीं 2019 के महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ 2020 में दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ और 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी करवाई। इन सफलताओं के साथ 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ काम करने में I-PAC के हाथ नाकामी भी लगी। 

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