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हिन्दी आत्मा के सौंदर्य को निखारने की भाषा है : डॉ. पद्मेश गुप्त

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स्मृति आदित्य

विदेशी धरा पर हिन्दी का गौरव बढ़ा रहे डॉ. पद्मेश गुप्त से वेबदुनिया की विशेष बातचीत 
 
भारत की धरा पर अंकुरित पौधे जब विदेशी धरा पर अपनी जड़ें जमाते हैं तो उसकी महक भारतीय आंगन को भी खुशनुमा बनाती हैं। विदेशों में भारत की कई विलक्षण प्रतिभाएं अपनी पहचान बना रही हैं और समय आने पर भारत की आवाज बनकर सुव्यक्त हो रही हैं।

भारत का प्रतिनिधित्व करते प्रवासी भारतीय हमारा गौरव हैं। इन्हीं में एक चिर-परिचित नाम है डॉ. पद्मेश गुप्त का। आप हिन्दी भाषा के विकास को लेकर पूरे दमखम के साथ लगे हुए हैं। डॉ. पद्मेश गुप्त 2007 से ऑक्सफ़ोर्ड में ऑक्सफ़ोर्ड बिजनेस कॉलेज के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। अब तक पद्मेशजी के तीन काव्य संग्रह, ‘आकृति’, ‘सागर का पंछी’ एवं 'प्रवासी पुत्र' तथा यूके के हिन्दी कवियों का संग्रह ‘दूर बाग़ में सौंधी मिट्टी’ प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत हैं उनके विस्तृत परिचय के साथ 'वेबदुनिया' से हुई विशेष बातचीत... 
 
प्रश्न : आप प्रवासी साहित्य को किस तरह परिभाषित करेंगे?
विदेशों में चार प्रकार के हिन्दी लेखक हैं जो हिन्दी साहित्य का सृजन कर रहे हैं। पहले जो भारतीय मूल के विदेश में जन्मे या विदेशी मूल के लेखक, दूसरे जो युवावस्था में भारत छोड़कर विदेश में आकर बस गए, तीसरे जो हिन्दी के रोजगार से जुड़े रहे जैसे अध्यापक या पत्रकार और चौथे वह जो भारत में हिन्दी साहित्य से जुड़े रहे और 30-35 वर्ष की आयु के बाद विदेश आए। भाषा और शिल्प की दृष्टि से आप सब में अंतर पाएंगे परन्तु भाव, अहसास, अनुभवों और विषयों में आप को समानता मिलेगी।

प्रवासी भाव, प्रवासी अनुभव, प्रवासी पीड़ा, संघर्ष और उपलब्धियां अपने शहर-गांव में रहने वालों के मुकाबले, दूर देश में रहने पर स्वाभाविक रूप से अलग होती हैं। 
 
इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं मानता हूं रामायण के इस सन्दर्भ को- जब प्रवासी साहित्य की बात उठती है तो मुझे जो संभवतः पहली और सबसे श्रेष्ठ और उत्कृष्ट रचना लगती है वह है-
 
'नेयं स्वर्णपुरी लंका रोचते मम लक्ष्मण।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥' 
 
अर्थात जब लंका जीतने के बाद लक्ष्मण ने राम से कहा कि यह स्वर्णपुरी सोने की लंका जीतने के बाद इसे छोड़कर हम वापस चलें? तब राम ने कहा कि हे लक्ष्मण, तुम इस स्वर्णपुरी पर आकर्षित मत हो, अपनी जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर होती है। 
  
मेरा तो मानना है कि आज हिन्दी साहित्य को सच्चे रूप में वैश्वीकरण करने का श्रेय प्रवासी लेखकों को सबसे अधिक जाता है। आज विश्वभर के अनुभवों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले प्रवासी हिन्दी लेखक ही तो हैं।  
 
भाषा की दृष्टि से देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि विश्व में कितने लोग हिन्दी बोलते हैं, कितने देश हिन्दी बोलते हैं परन्तु सोचिए,अगर आज से सौ दो सौ साल बाद, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, योरप के लोगों को यह जानना हो कि सौ दो सौ साल पहले उनकी दुनिया, उनका समाज, उनके लोग कैसे थे, और उन्हें यह पता लगे कि यह जानने के लिए उन्हें हिंदी साहित्य पढ़ना पड़ेगा, तब मैं मानता हूं कि हिन्दी का सच्चा वैश्वीकरण हुआ है। यह सिर्फ प्रवासी लेखक कर रहे हैं, जो आज दुनिया भर में, उनके समाज में, उनके निवास कर रहे देश में जो कुछ हो रहा है, वह अनुभव हिन्दी में लिख रहे है; और हिन्दी साहित्य को वैश्विक स्तर पर समृद्ध कर रहे हैं।
 
प्रश्न : भारतीय से प्रवासी भारतीय बनने तक का आपका सफर कैसा रहा?

सच पूछिए तो यह पता नहीं लगा कि मैं भारतीय से प्रवासी भारतीय कब हो गया। विद्यार्थी के रूप में फ्रांस आया था। आगे की पढ़ाई और काम इंग्लैंड ले आया। कुछ योग्यता और कुछ करियर... कुछ और... कुछ और... फिर चलते हैं भारत वापस...। और हम यहीं के हो लिए...। इस भाव पर मेरी एक कविता है- 
 
छड़ी, घड़ी और ऐनक
देकर 
मां की आंखों में 
प्रतीक्षा की झपकियां 
आया था परदेस मैं
ले कर
पीठ पर पिता की
दुआओं की थपकियां।
 
कुछ ही वर्षों में
हो गया वह सबकुछ हासिल 
जो पर्याप्त था।
पर्याप्त था
चार पहियों के वाहन के लिए
मार्बल के आंगन के लिए।
मैने भेजा मां को
एक नया ऐनक
पिता के लिए छड़ी,
एक नई घड़ी।
 
शायद उसी ऐनक को पहन कर
लिखा था मां ने,
देख सकती हूं
तुम्हारी तस्वीर मैं
बिना इस ऐनक के भी
और हमारे यहां
पिता की छड़ी
लकड़ी की नहीं
लड़के की होती है।
तुमने भेजी है
एक घड़ी,
बढ़िया...
 
किंतु यहां तो
लम्हे लम्हे आती हैं
प्रतीक्षा की 
कितनी ही घड़ियां। 
 
इससे पहले कि
रोम रोम
मेरे हृदय का
बांध पाता
निर्णय की कोई डोर,
करने लगा इशारा मस्तिष्क
मेरे पुत्र के
नन्हे, साफ-सुथरे पैरों की ओर।
 
छोड़ आया हूं 
एक नगर से 
दूसरे नगर में
अपने सफर में
संघर्ष के जो छाले
फिर उगेंगे वह
इन पैरों पर
मेरे लौटने पर...  
 
मैने रख दिया
किसी कोने में
स्वदेश लौटने का इरादा
मां को दिया हुआ
वह खामोश वायदा।
 
मुझे याद है
एक बार फिर 
लिखा था मां ने,
अब तो
कहने लगी है 
पड़ोसन भी
अपने बेटे से,
इतने भी ना लाना अंक
परीक्षा में
कि.. करनी पड़े
मेरी चिता को 
तुम्हारी प्रतीक्षा।
 
एक बार फिर
मैने मुड़ कर देखा था 
पूरब का गांव 
लेकिन
पहने हुए
पश्चिम के जूते मेरे पांव
बढ़ने लगे
चढ़ने लगे 
पकड़ कर अंगुलियां    
नई पीढ़ी की
नई सीढ़ी पर।
 
आज मेरा पुत्र
किसी और देश के
किसी और शहर में
बना रहा है नए रास्ते
अपने पुत्र के लिए।
 
और मैं,
देख रहा हूं 
सामने दीवार पर
टंगी हुई 
एक नई छड़ी,
मेज़ पर रखी हुई
एक नई घड़ी
अपनी मां के ऐनक से।
 
पीढ़ियां दर पीढ़ियां
सीढ़ियां दर सीढ़ियां  
वही छड़ी
वही घड़ी
वही ऐनक।
 
उम्र ही नहीं है
कुछ और भी है
जो देता है
चेहरों को झुर्रियां।
 
यह छड़ी
यह घड़ी
यह ऐनक
 
प्रश्न : हिन्दी भाषा के विकास को लेकर आपके प्रयासों और परिणामों के बारे में विस्तार से बताएं?

मैंने 25 वर्ष की आयु में, 1990 में यूके हिन्दी समिति की स्थापना की जो संस्था आज भी सक्रिय है।1990 में यूके हिन्दी समिति की स्थापना के साथ ही मैं लंदन में ‘हिन्दी’ नाम से एक पत्र निकालने लगा, जो 5 वर्षों तक प्रकाशित हुआ। आरंभ में इसे भारत से छपवाता फिर अपने कम्प्यूटर पर निकालने लगा। 
 
1997 से मैंने पुरवाई पत्रिका का प्रकाशन और संपादन शुरू किया जिसे मैंने 18 वर्षों तक निरंतर प्रकाशित किया। कुछ वर्ष पूर्व मैंने महसूस किया कि अब बदलते समय में पत्रिका का इतना महत्त्व और आवश्यकता नहीं रह गई है। इंटरनेट के कारण लेखकों के पास दूसरे साधन और मंच है। इस पत्रिका के माध्यम से ब्रिटेन, भारत और विश्व के अनेक नए प्रयत्नशील लेखकों के साथ साथ, स्थापित लेखकों को वैश्विक मंच मिला। 1994 से हिन्दी समिति ने ब्रिटेन में अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मलेन की परंपरा शुरू की। यह परंपरा लंदन और मेनचेस्टर- दो महानगरों से आरंभ हुई और अब ब्रिटेन के 13 शहरों में फैल चुकी है। 
 
1997 में हमने लंदन में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मलेन का आयोजन किया। अब तक हिन्दी समिति, समय-समय पर 5 अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मलेन, 1999 में छठे विश्व हिन्दी सम्मलेन के सफल आयोजन कर चुकी है। इसके अलावा हिन्दी की गोष्ठियां, अधिवेशन और शिविर भी आयोजित कर चुके हैं। इन सभी आयोजनों का संयोजक रहा। अभी इस वर्ष ब्रिटेन के तीन नगरों में हमने 'हिन्दी महोत्सव' का आयोजन किया।
 
इन सभी आयोजनों से यूके में हिन्दी का सशक्त वातावरण बना और विश्व में के मानचित्र पर यूके मुख्य केंद्र बना। 
 
प्रश्न : कला, संस्कृति, परंपरा और भाषा इन सभी के विकास में प्रवासी साहित्य की भूमिका आप कैसी पाते हैं? 
 
कला, संस्कृति, परंपरा और भाषा के साथ साथ भारत के समस्त साहित्य का वैश्वीकरण कर रहा है प्रवासी साहित्य। प्रवासी लेखक भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को तो अपने लेखन के माध्यम से दुनिया भर में विस्तार दे ही रहा है, साथ ही जिस देश में वह रहता है, वहा की संस्कृति को भी भारत से जोड़ने का कार्य कर रहा है। हिन्दी का प्रवासी लेखक जब अपने विदेशी मित्रों के साथ उठता-बैठता है, तो अक्सर अपनी कृति का अनुवाद कर उन्हें सुनाता है, और वहीं दूसरी ओर जब उसे कोई विदेशी बात भाती है, वह अपने साहित्य में उल्लेख कर उसे हिन्दी पाठकों तक पहुंचाता है। वैश्वीकरण के इस युग में, सम्पूर्ण विश्व को अपने साहित्य के माध्यम से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य कर रहा है प्रवासी लेखक।  
 
 प्रश्न : विदेशों में हिन्दी और हिन्दी भाषियों के लिए क्या संभावनाएं हैं?

हिन्दी और हिन्दी भाषियों, यह दो अलग प्रश्न हैं। हिन्दी का भाषा के रूप में देखिए तो मुझे अंग्रेजी से ज़्यादा हिन्दी सशक्त दिखाई देती है। आप ही सोचिए, आज विश्व अंग्रेजी क्यों पढ़ना चाहता है? मैं तो ऑक्सफ़ोर्ड बिज़नेस कॉलेज का निदेशक हूं और अनेक प्रकार की अंग्रेजी के कोर्सेज चला रहा हूं, और इसीलिए पूरे अधिकार के साथ कहता हूं कि हमारे यहां ऑक्सफ़ोर्ड में जहां 40 से अधिक देशों से छात्र सिर्फ अंग्रेजी पढ़ने आते हैं, किसी को भी अंग्रेजी या फिर इंग्लैंड से कोई प्रेम नहीं है। वे अंग्रेजी भौतिक प्रगति के लिए, व्यापार करने के लिए, काम करने के लिए अंग्रेजी पढ़ना चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आज जो भी व्यक्ति हिन्दी पढ़ रहा है, विश्व के किसी भी कोने में ही क्यों न हो, उसे भारत से प्रेम है, हिन्दी में उसे आत्मिक संतोष की प्राप्ति दिखती है, इसलिए वह हिन्दी पढ़ रहा है। इस रूप में मुझे हिन्दी की संभावना विश्व में अव्वल नज़र आती है।  
 
हिन्दी भाषियों का भविष्य व्यवहारिक रूप में देखिए तो संभावना वैसी ही है जैसी भारत में है। अध्यापक, पत्रकार या शायद अनुवादक।  लेकिन थोड़ी गहराई से देखने पर मुझे लगता है कि हिन्दी का व्यक्ति या फिर किसी भी भारतीय भाषा को जानने वाले व्यक्ति की दुनिया को देखने और समझने की दृष्टि औरों से अधिक वैचारिक और भावनात्मक है जिसे मैं उनकी बहुत बड़ी शक्ति मानता हूं। यही शक्ति उनकी संभावनाओं को और विशेष बनाती हैं। 
 
प्रश्न : हिन्दी को लेकर प्रवासी भारतीयों से संबंधी सरकार की नीतियों पर आप क्या कहना चाहेंगे?

मैं तो बहुत खुश हूं और संतुष्ट भी। भले ही सरकार की नज़र प्रवासी भारतीयों के धन और निवेश पर हो, सरकार की नीतियों से हमें लाभ तो अनेक मिलते हैं। पिछले 15-20 सालो में बहुत से ऐसे बदलाव आए हैं जैसे प्रवासी भारतीय मंत्रालय, प्रवासी भारतीय दिवस, OCI कार्ड वैगरह!
 
प्रश्न : भारत सरकार से कोई विशेष अपेक्षा?  
 
प्रवासी भारतीयों को सिर्फ निवेशक के रूप में नहीं बल्कि भारत के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में देखे जो भारत का सच्चा वैश्वीकरण कर रहे हैं।

प्रश्न : जैसे ब्रिटेन में हो रही हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के चयनित विजेताओं की भारत यात्रा संबंधी सहयोग अब बंद हो गया है, क्या उसे आरंभ करने के लिए कोई बातचीत या पहल की गई है? 
 
हम प्रयासरत हैं परन्तु अभी कोई आशा की किरण दिख तो नहीं रही है। आपके प्रश्न के उत्तर में यह अवश्य कहूंगा कि हम 2000 से 2005 तक भारतीय उच्चायोग में कार्यरत हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री अनिल शर्मा जोशी और 2005 से 2008 तक कार्यरत श्री राकेश दुबे के आभारी हैं जिन्होंने हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के चयनित हिन्दी विद्यार्थियों को भारत यात्रा में सरकारी सहयोग दिलवाने का क्रम शुरू करवाया था तथा ICCR भारत के निदेशक श्री पवन वर्मा एवं श्री वीरेंद्र गुप्त जी जिन्होंने इन छात्रों के दिल्ली आवास, कार्यक्रम और वाहन में सहयोग दिलवाया।
 
प्रश्न : हिन्दी के लिए, प्रवासी साहित्य को प्रोत्साहन देने के लिए आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के माध्यम से ब्रिटेन में युवा पीढ़ी और विदेशी मूल के लोगो को प्रोत्साहित करना, प्रभा खेतान फाउंडेशन भारत और वाणी प्रकाशन भारत के तत्वावधान में, ब्रिटिश कौंसिल के सहयोग से 'क़लम' के मंच को यूके में स्थापित कर प्रवासी लेखकों को हिन्दी साहित्य का वातावरण देना और हिन्दी महोत्सव जैसे आयोजन को वार्षिक रूप देने का प्रयास कर रहा हूं। हिन्दी शिक्षकों और विद्यार्थियों को हिन्दी शिक्षण संबंधी कंप्यूटर टेक्नोलॉजी से जोड़ने का प्रयास भी कर रहा हूं, जिसके लिए मैं अशोक चक्रधर एवं बालेंदु शर्मा जी के संपर्क में हूं।  
 
प्रश्न : क्या हिन्दी को लेकर एक आम भारतीय और प्रवासी भारतीय की जिम्मेदारी और अनुभूति एक सी है?
 
मेरे विचार में 'नहीं'। आम भारतीय के लिए हिन्दी आम है और प्रवासी भारतीय के लिए विदेशों में हिन्दी की कमी उसके लिए हिन्दी को खास बना देती है। यह तो मानव प्रवृत्ति है, वही चीज खास होती है जिसकी कमी हो। जैसे विदेशों में भारतीय भोजन, विदेशों में भारतीय सिनेमा और गीत-संगीत।
 
मैं अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा। घर में पिताजी के कारण हिन्दी साहित्य का वातावरण और संस्कार मिले। लेकिन सच्चे रूप में हिन्दी के महत्व और हिन्दी से प्रेम का अहसास फ्रांस जाकर हुआ। जब मैंने देखा कि फ्रांसीसी लोग अंग्रेजी को नीची निगाह से देखते हैं और अपनी भाषा को सर्वोच्च मानते हैं। जब मैंने देखा कि वे अकसर फ्रांसीसी भाषा के शब्दों को मुझसे हिन्दी में अर्थ बताने को कहते हैं और फिर मुझसे अंग्रेजी में थैंक यू की जगह धन्यवाद कहना पसंद करते हैं। हिन्दी के प्रति सम्मान को लेकर मेरी सच्चे मायने में आंख खुली। लगा कि अंग्रेजी को ऊंचे तबके की क्लास की भाषा समझने की कितनी बड़ी भूल कर रहा था मैं।
 
प्रश्न : आप जो भी गतिविधियां वहां संचालित कर रहे हैं, उसके लिए वहां आपको स्‍थानीय लोगों से किस तरह का सहयोग मिल रहा है?
 
बिना स्‍थानीय लोगों के सहयोग से मैं अकेला क्या कर सकता था? मेरे कॉलेज में मेरे सभी सहकर्मी विदेशी हैं, परंतु कभी मैं यहां हिन्दी का कार्यक्रम करता हूं तो बहुत प्रेम और आदर के साथ सब मेरा साथ देते हैं। अभी हाल में ऑक्सफोर्ड में ही हिन्दी महोत्सव का जब उद्घाटन कार्यक्रम रखा गया, तब 70 प्रतिशत लोग स्थानीय विदेशी मूल के थे। इंग्लैंड में रह रहे प्रवासी भारतीयों की बहुत बड़ी टीम है, जो हिन्दी के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में बहुत सकारात्मक काम कर रहे हैं।
 
प्रश्न : प्रवासी साहित्य में भारतीयता की सौंधी सुगंध और विदेशी धरती की अनजानी महक के बीच तालमेल कितना जरूरी है?
 
प्रवासी लेखन बिना भारत की सौंधी सुगंध के मुमकिन नहीं है। आज प्रवासी लेखक अपने आसपास होने वाली घटनाओं को हिन्दी की हर विधा में लिख रहा है। अपने अनुभवों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रहा है। हर भारतीय दुनिया को अपनी दृष्टि से देखता है जिसमें भारतीय सोच, भारतीय विचार और भारतीय संस्कार होते हैं। इसी कारण उसके लेखन में सौंधी महक प्राकृतिक रूप से अनिवार्य हो जाती है, तालमेल बिठाना नहीं पड़ता, प्रवासी लेखन में वैश्विक तालमेल अपने आप बैठ जाता है।
 
प्रश्न: क्या विदेशी धरती पर बैठकर किसी भी तरह का लेखन प्रवासी साहित्य में शामिल किया जा सकता है?
 
यदि मैं यह प्रश्न ठीक से समझ रहा हूं तो आप प्रवासी लेखन की कमजोर भाषा, शिल्प आदि के विषय में संभवत: पूछ रही हैं। मैं मानता हूं कि अधिकांश प्रवासी भारतीय जब कोई खत लिखते हैं, घर-परिवार को अपने अनुभवों और व्यथा से भरा पत्र लिखते हैं, तो आरंभ हो जाता है अत्यंत मौलिक और सच्चा हिन्दी साहित्य! वह साहित्य जो व्यक्तिगत भाव, व्यक्तिगत अनुभव होते हैं और व्यक्तिगत ही रह जाते हैं, परंतु कुछ प्रवासी अपनी लेखन क्षमता को गंभीरता से लेते हैं, लोगों के साथ बांटते हैं, प्रकाशित करवाते हैं जिसे हम आज की तारीख में प्रवासी साहित्य कहते हैं।
 
फिर आरंभ होता है, इस प्रवासी साहित्य का मूल्यांकन! यह एक बड़ा और महत्वपूर्ण विषय है। अब जब हमारे हिन्दी साहित्य के विशेषज्ञ प्रवासी साहित्य का मूल्यांकन करते हैं, तो मेरा विनम्र निवेदन है कि आप उसे भाषा या शिल्प के तराजू में ना तौलें बल्कि विषयवस्तु और मौलिकता के आधार पर तौलें। भाषा में यदि त्रुटि है या कमजोरी है, उससे वास्तविकता नहीं बदल जाती है। हां, मैं मानता हूं कि प्रवास में रह रहे कुछ लोग लंदन-अमेरिका के पते का लाभ उठा रहे हैं, दूसरी भाषा के साहित्य का अनुवाद कर अपनी मौलिक रचना बताकर अच्छे-अच्छे साहित्य विशेषज्ञों, प्रकाशकों और संस्‍थाओं को गुमराह कर अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को अंजाम दे रहे हैं, पुरस्कार पा रहे हैं, परंतु ऐसे कुछ गिने-चुने लोगों के कारण हिन्दी और भारतीय साहित्य के वैश्वीकरण को ना रोकिए। हिन्दी और साहित्य के वातावरण से बहुत दूर, नए परिवेश में, मासूम लेखन कर रहे, अत्यंत मौलिक साहित्य को प्रेरणा और मार्गदर्शन की जरूरत है।
 
मेरा निवेदन है कि जिन महानुभावों को प्रवासी लेखकों की भाषा, शिल्प इत्यादि से कष्ट है, नाराजगी है, वह अपनी जगह जायज है और बहुत जायज है; लेकिन यदि क्रोध निकालना है तो उन प्रका‍शकों, समीक्षाकारों, संपादकों और पत्रकारों पर निकालिए, जो शायद कहीं ना कहीं अपने निजी लाभ के लिए ऐसे लेखकों को छापते हैं, पुरस्कृत करते हैं या फिर ऐसी भूमिकाएं और समीक्षाएं लिखते हैं, जो प्रवासी मासूम लेखकों को गुमराह करती है। प्रवासी लेखन को examiner के रूप में नहीं, शिक्षक के रूप में देखिए और उसे प्रेरणा और मार्गदर्शन दीजिए। साहित्य संसार में प्रवेश ना देने की जगह उसे अपने प्रयासशील विद्यार्थियों की तरह पनाह दीजिए।
 
प्रवासी लेखन को तिरछी निगाह से देखने की बजाए यदि आप पलकों पर बिठाएंगे, तो हिन्दी साहित्य का ऐसा वैश्वीकरण होगा, जो दुनिया में किसी भी भाषा में नहीं हो सकता।
 
प्रश्न : क्या पुरस्कार, सम्मान, अवॉर्ड आदि को लेकर प्रवासी साहित्यकारों के बीच भी जोड़-तोड़ की राजनीति जड़ें जमा रही हैं?
 
हां, जी हां, परंतु बहुत कम। सच पूछिए तो पुरस्कार सम्मान पाने की इच्छा किसकी नहीं होती, परंतु जब इच्‍छा महत्वाकांक्षा में बदल जाती है, तो कहीं-न-कहीं राजनीति स्वाभाविक हो जाती है जिसका मुझे बहुत दु:ख और खेद है। मैं मानता हूं कि किसी भी काम का परिणाम जब मेरिट्स पर मिलता है तो असली मजा होता है, आत्मसंतोष मिलता है। जोड़-तोड़ से, राजनीति से पुरस्कार का मिलना उसी तरह लगता है, जैसे परीक्षा को नकल करके पास होना।
 
मेरा अपना मानना है कि 'जब आप बोलते हैं तो लोग सुनते हैं, लेकिन जब काम बोलता है, तो लोग बोलते हैं और कायनात सुनती है, इतिहास बनता है।' 
 
प्रश्न : भाषा, कला, संस्कृति, परंपरा और संस्कारों के विकास के लिए आप सबसे सशक्त माध्यम किसे मानते हैं?
 
सिनेमा। आज के वर्तमान काल में हिन्दी सिनेमा का हिन्दी भाषा, कला, संस्कृति, परंपरा और संस्कारों के वैश्वीकरण में जितना योगदान है, उतना किसी और प्रचलित विधा का नहीं है। आज योरप और रूस के कितने ही हिन्दी के शिक्षक हिन्दी गीतों के माध्यम से छात्रों को पढ़ा रहे हैं। मुझे यह जानकर प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भी जब ऑक्सफोर्ड में मेरे कुछ अरबी मित्रों ने बताया कि खाड़ी के देशों में उनके अभिभावक उन्हें बचपन में हिन्दी सिनेमा तो देखने की अनुमति देते थे, परंतु अमेरिकी सिनेमा नहीं। कारण कि उन्हें लगता है कि भारतीय सिनेमा उन्हें संस्कारी संदेश देते हैं।
 
साथ ही भाषा हो या संस्कृति, प्रवासी संसार के इस निर्माण में सबसे जमीनी और महत्वपूर्ण योगदान है संस्थाओं का। हजारों प्रवासी भारतीयों में से कोई एक जागरूक व्यक्त‍ि चार लोगों को एकत्रित कर एक संस्था का गठन करता है। यह संस्था न केवल अपने लोगों को बल्कि विदेशी मूल के नागरिकों को भारतीय भाषा और संस्कृति की ओर आकर्षित करती है और अपना बनाती है। यह हिन्दी और संस्कृति की संस्थाएं ही हैं, जो विश्वभर में, कोने-कोने में, गली-मुहल्लों में भारतीय भाषाओं और संस्कृति को न केवल जीवित रखे हैं, अपितु कितने ही विदेशी मूल के लोगों और नई पीढ़ी को भारत से जोड़ रही हैं।
 
प्रश्न : नित नूतन बदलती तकनीक के बीच हिन्दी का भविष्य आप कैसा देख रहे हैं?
 
शानदार! कारण यह है कि हिन्दी नई तकनीकी की रफ्तार के साथ अपनी रफ्तार को कायम किए हुए हैं। मैं मानता हूं कि अंग्रेजी से थोड़ा पीछे है, परंतु ज्यादा नहीं। पीछे इस कारण है कि अधिकांश आविष्कार अंग्रेजी में हो रहे हैं। कई आविष्कार जापान, चीन में होने के बावजूद अंग्रेजी में पहले लॉन्च होते हैं और फिर दूसरी भाषाओं का नंबर आता है। ज्यादा पीछे इसलिए नहीं कि विश्व, भारत को बहुत बड़े बाजार के रूप में स्वीकार कर चुका है और हिन्दी भारत में सबसे अधिक बोलने और समझने की भाषा है।
 
प्रश्न : आपका संदेश?
 
नई पीढ़ी को मेरा संदेश यही होगा कि, 'हिन्दी को अपने हाथ बनाओ और अंग्रेजी को हथियार।' अंग्रेजी यदि जीविकोपार्जन की भाषा है तो हिन्दी आत्मा के सौन्दर्य को निखारने की भाषा है।
 
प्रश्न: आपके सुझाव?
 
हिन्दी को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए, विश्व भाषा के रूप में प्रचलित करने के लिए, विदेशियों को हिन्दी के प्रति आकर्षित करने के लिए, हिन्दी को धर्म और देश से ऊपर रखकर प्रस्तुत करने की जरूरत है। हमें यूरोपियन या अमेरिकन मूल के नागरिक से यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि वह भारतीय देशभक्ति के गीत गाए या फिर भजन-कीर्तन सीखे। हिन्दी को इतिहास, योग, गीत-संगीत, विशाल साहित्य और प्राचीन संस्कृति की भाषा के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
 
प्रश्न : भारत की कौन-सी एक ऐसी सबसे खास बात है, जो आप वहां सबसे ज्यादा याद करते हैं?
वातावरण। वातावरण साहित्य का, वातावरण परिवार का, वातावरण त्योहारों का।
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परिचय : 
 
डॉ. पद्मेश गुप्त का जन्म 5 जनवरी 1965 को लखनऊ के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। आपने लामर्टिनियर कॉलेज, क्रिश्चियन कॉलेज एवं लखनऊ विश्वविद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा करने के उपरांत इंस्टीट्यूट आफ रूर बैतरां ड्यूपां, फ्रांस में केमिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन तथा कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज पर शोध किया। उसके उपरांत पद्मेश ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्यरत्न, एमबीए एवं इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में पीएचडी की उपाधि ग्रहण की। पद्मेश गुप्त अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू एवं फ्रेंच भाषाओं के जानकार हैं।
 
1990 में पद्मेश ने लंदन में यूके हिन्दी समिति की स्थापना की तथा 5 वर्षों तक हिन्दी पत्र का संपादन एवं प्रकाशन किया। आप 1993 में मैनचेस्टर में हुए अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के दो सत्रों हेतु सह-अध्यक्ष चुने गए। 1993 से 2013 तक प्रतिवर्ष लंदन में होने वाले अंतरराष्ट्रीय हिन्दी कवि सम्मेलन का संयोजन करते रहे हैं।
 
2001 से 2014 तक पूरे ब्रिटेन एवं यूरोप में होने वाली हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के संयोजन का भार भी पद्मेश निभाते रहे। सन् 2003 से हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के 9 विजेताओं को हिन्दी समिति भारत भ्रमण पर ले जाती है। पद्मेश की 2003 में सूरीनाम में हुए 7वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में सक्रिय प्रतिभागिता रही।
 
पद्मेश अब तक ब्रिटेन में विश्व एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए 4 सम्मेलनों, लंदन में 20 अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों, 1999 में यूके में हुए 6ठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संयोजक, सैकड़ों साहित्यिक गोष्ठियों, अध्यापकों के अधिवेशन एवं शिविर तथा हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताओं के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं।
 
आपने लंदन में टेलीविज़न चैनल पर हिन्दी कविता पर 'वाह, क्या बात है' सीरीज का कई महीनों तक संचालन किया। विश्व में मॉस्को, पोलैंड, बुडापेस्ट, बुखारेस्ट जैसे अनेक प्रतिष्ठित विश्व में व्याख्यान के अलावा आपने 2010 में दिल्ली में हुए प्रवासी फिल्म महोत्सव के अंतरराष्ट्रीय संयोजन का दायित्व भी निभाया।
 
पद्मेश गुप्त राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मानों से विभूषित हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं- 1997 में ताज महोत्सव, 2000 में उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा विदेशों में हिन्दी प्रचार, प्रवासी भारतीय दिवस 2003 में अक्षरम्, दिल्ली एवं सन् 2007 में न्यूयॉर्क में हुए 8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भारत सरकार द्वारा विश्व हिन्दी सम्मान।
 
2017 में पद्मेश गुप्त ने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा केंद्रीय हिन्दी संस्थान, मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ग्रहण किया। आपने यूके में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'पुरवाई' का 18 वर्षों तक संपादन एवं प्रकाशन किया तथा 'प्रवासी टुडे' पत्रिका का 8 वर्षों तक संपादन किया।

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