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अयोध्या का बौद्ध धर्म से नाता क्या है?

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ayodhya
भगवान राम की पवित्र नगरी अयोध्या हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर भगवान राम का जन्म हुआ था। यह राम जन्मभूमि है। राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। आधुनिक शोधानुसार भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था।
 
इतिहासकारों के अनुसार 1528 में बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। बाबर एक तुर्क था। कहते हैं कि उसने बर्बर तरीके से हिन्दुओं का कत्लेआम कर अपनी सत्ता कायम की थी। माना जाता है कि मंदिर तोड़ते वक्त 10,000 से ज्यादा हिन्दू उसकी रक्षा में शहीद हो गए थे। वर्तमान में अयोध्या पर विवाद जारी है। इस बीच बौद्धों ने भी अयोध्या पर अपना दावा ठोक दिया है। धार्मिक महत्ता की दृष्टि से अयोध्या हिन्दुओं और जैनियों का एक पवित्र तीर्थस्थल है। इसी संदर्भ में एक आलेख...
 
 
सिर्फ जन्मभूमि पर दावा :
पवित्र नगरी अयोध्या भारत के प्राचीन नगरों में से एक है। यरूशलम की तरह यह भी तीन धर्मों हिंदू, जैन और बौद्ध का प्रमुख केंद्र है। तीनों ही धर्मों के लिए यह नगर पवित्र और तीर्थ नगर है। हिन्दू संपूर्ण अयोध्या पर अपना दावा नहीं करते वे सिर्फ राम जन्मभूमि पर अपना दावा करते हैं। राम जन्मभूमि के अलावा अन्य जगहों पर जैन और बौद्ध धर्म के पवित्र स्थल है।
 
 
अयोध्या में कई महान योद्धा, ऋषि-मुनि और अवतारी पुरुष हो चुके हैं। यहीं पर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ और यहीं पर जैन धर्म के तीर्थंकर ऋषभदेव, अजीतनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ और अनंतनाथजी का जन्म भी हुआ। पार्श्वनाथ और सुपार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी में हुआ, जो कि जैन और हिन्दू दोनों ही धर्मों का बड़ा तीर्थ स्थल है। अयोध्या रघुवंशी राजाओं की बहुत पुरानी राजधानी थी। 
 
अयोध्या पर नव बौद्धों का दावा राजनीति से प्रेरित
सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री रामदास आठवले ने उज्जैन यात्रा के दौरान एक बयान में कहा था कि अयोध्या में जिस जमीन को लेकर झगड़ा हो रहा है असल में वह बौद्धों की है, जहां बौद्ध धर्म से जुड़े कला और शिल्प मिले हैं। हालांकि आठवले को पूर्ण जानकारी नहीं है।

दरअसल, 1981-1982 ईस्वीं में अयोध्या के सीमित क्षेत्र में एक उत्खनन किया गया था। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमानगढ़ी और लक्ष्मणघाट क्षेत्रों में हुआ था जहां से बुद्ध के समय के कलात्मक पात्र मिले थे। माना जाता है कि यहां बौद्ध स्तूप था। यह बौद्ध स्तूप या विहार कभी भी राम जन्मभूमि पर नहीं रहा। अयोध्या के आसपास एक नहीं लगभग 20 बौद्ध विहार होने का उल्लेख मिलता है।
 
ऐसा कहते हैं कि भगवान बुद्ध की प्रमुख उपासिका विशाखा ने बुद्ध के सानिध्य में अयोध्या में धम्म की दीक्षा ली थी। इसी के स्मृतिस्वरूप में विशाखा ने अयोध्या में मणि पर्वत के समीप बौद्ध विहार की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं कि बुद्ध के माहापरिनिर्वाण के बाद इसी विहार में बुद्ध के दांत रखे गए थे।
 
 
वर्तमान में राजनीतिक नफरत के चलते यह भी दावा किया कहा जाता है कि यहां पर कौशल नरेश प्रसेनजित ने बौद्ध भिक्षु बावरी की याद में यहां बावरी बौद्ध विहार बनवाया था। इस विहार को पुष्यमित्र शुंग ने ध्वस्त कर दिया था। बाद में इस स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया गया। दरअसल, अयोध्या विवाद में तीसरे पक्ष की दावेदारी को मजबूत करके विवाद को और बढ़ाने के लिए की गई एक राजनीतिक खुराफात हो सकती है।
 
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दरअसल, यहां पर सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे और यहां हिंदुओं का एक प्रमुख और भव्य मंदिर था। मललसेकर, डिक्शनरी ऑफ पालि प्रापर नेम्स, भाग 1, पृष्ठ 165 के अनुसार अयोध्यावासी हिंदू गौतम बुद्ध के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने उनके निवास के लिए वहां पर एक विहार का निर्माण भी करवाया था। संयुक्तनिकाय में उल्लेख आया है कि बुद्ध ने यहां की यात्रा दो बार की थी। इस सूक्त में भगवान बुद्ध को गंगा नदी के तट पर विहार करते हुए बताया गया है। इसी निकाय की अट्ठकथा में कहा गया है कि यहां के निवासियों ने गंगा के तट पर एक विहार बनवाकर किसी प्रमुख भिक्षु संघ को दान कर दिया था। वर्तमान अयोध्या गंगा नदी के तट पर स्थित नहीं है।
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उत्‍खनन का सही उल्लेख:
अयोध्या में अब तक हुए उत्खन में कहां क्या क्या निकला है इस संबंध में सोशल मीडिया में बहुत भ्रम फैलाया जाता है। दरअसल, पिछले कुछ काल में कुछ पुरातत्वविदों यथा- प्रो. ब्रजवासी लाल, हंसमुख धीरजलाल सांकलिया, हेमचन्द्र राय चौधरी, वी.सुन्दराजन और मुनीश चन्द्र जोशी ने रामायण इत्यादि में वर्णित अयोध्या में हुए उत्खनन के अवशेषों के अध्ययन किए हैं। यहां प्राप्त अवशेष हर काल के हैं। यहां हिंदू, जैन, बौद्ध और इस्लाम धर्म से जुड़ी कई चीजें मिली है। यहां से प्राप्त अधिकतर वस्तुएं राम और हिंदू धर्म से जुड़ी पाई गई। इसको अच्छे से जानने के लिए आपको उत्खनन की रिपोर्ट का अध्ययन करना चाहिए।
 
 
इन पुरातत्वविदों के अनुसार अवशेषों के आधार पर रामायण में वर्णत अन्य स्थान यथा- नन्दीग्राम, श्रृंगवेरपुर, भारद्वाज आश्रम, परियर एवं वाल्मीकि आश्रम भी निश्चित रूप से पहचाने जा सकते हैं। हालांकि तीनों में इसके काल को लेकर मतभेद है। प्रो. श्रीलाल, सांलिया के अनुसार यह अवशेष सातवीं सदी ईसा पूर्व के हैं। प्रो. श्रीलाल तथा सांकलिया का मत हेमचन्द्र राय चौधरी के मत से मिलता है जबकि मुनीश चन्द्र जोशी उनके मत से सहमत नहीं है। जोशी के अनसुार वैदिक या पौराणिक सामग्री के आधार पर पुरातात्विक साक्ष्यों का समीकरण न तो ग्राह्य है और न ही उचित।
 
 
अयोध्या क्षेत्र का सर्वप्रथम उत्खनन प्रोफेसर अवध किशोर नारायण के नेतृत्व में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एक दल ने 1967-1970 में किया था। यह उत्खनन मुख्यत: जैन घाट के समीप के क्षेत्र, लक्ष्मण टेकरी एवं नल टीले के समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ। जब तब आप उत्खनन की संपूर्ण रिपोर्ट को अच्छे से नहीं पढ़ंगे तब तक उस पर किसी निर्णय पर पहुंचना मुश्किल है। चूंकि आप जनता यह सब नहीं जानती है तो उत्खनन के नाम पर उन्हें भ्रमित किया जाता आसान है।
 
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हिंदू और बौद्ध एक ही है इसके कई प्रमाण है?
दरअसल, बौद्धकाल में हिन्दू और बौद्धों के बीच आपसी समन्वय और सहअस्तित्व की भावना देखने को मिलती है। इस भावना के ही चलते जब कोई मंदिर बनाया जाता था तो उसमें हिन्दू और बौद्ध धर्म से जुड़े प्रतीकों को स्तंभों पर अंकित किया जाता था। आज भी दुनिया में ऐसे कई भगवान विष्णु और बुद्ध के ऐसे प्राचीन मंदिर है जहां पर दोनों की ही सम्मिलित मूर्ति मिल जाएगी। ऐसी कई गुफाएं हैं जहां हिंदू और बौद्ध धर्म के समन्वय को देखा जा सकता है। थाईलैंड, म्यांमार, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गुप्तकाल में भी एक ही राजा हिन्दू, जैन और बौद्धों के मंदिर बनाता था।
 
 
जहां तक सवाल अयोध्या का है तो वहां न तो बुद्ध का जन्म हुआ, नहीं वहां उनको संबोधि घटित हुई और न ही उन्होंने वहां निर्वाण प्राप्त किया। हां, उनके द्वारा वहां पर विहार जरूर किया गया। उस काल में इन नगर को साकेत कहा जाता था। गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले हुआ था। सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद, उपनिषद्‌ और योग की शिक्षा ली थी। छत्रिय शाक्य वंश में जन्में गौतम बुद्ध ने कभी भी खंडन-मंडन या नफरत के आधार पर अपने सिद्धांत या धर्म को खड़ा नहीं किया। उन्होंने पहली दफे बिखरे हुए धर्म को एक व्यवस्था दी और बिखरे हुए प्राचीन भारतीय ज्ञान को श्रेणीबद्ध किया था। इस बात को तभी समझा जा सकता है जबकि कोई व्यक्ति वेद, उपनिषद, स्मृतियां और त्रिपिटक का गहन अध्ययन करें। जो बौद्ध हैं उन्होंने वेद और उपनिषद, स्मृतियों का पूर्ण अध्ययन नहीं किया और जो हिंदू है उन्होंने कभी भी त्रिपिटक क्या है इसे समझा नहीं। यदि ऐसा होता तो दलित और ब्राह्मणों का झगड़ा ही समाप्त हो जाता। खैर..
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अयोध्या को जानें...
रामायण में अयोध्या का उल्लेख कोशल जनपद की राजधानी के रूप में किया गया है। सरयू नदी के तट पर बसे इन नगर को स्वांभुव मनु ने बसाया था। अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है।
 
 
नाम : स्कंदपुराण के अनुसार अयोध्या शब्द 'अ' कार ब्रह्मा, 'य' कार विष्णु है तथा 'ध' कार रुद्र का स्वरूप है। इसका शाब्दिक अर्थ है जहां पर युद्ध न हो। यह अवध का हिस्सा है। अवध अर्थात जहां किसी का वध न होता हो। अयोध्या का अर्थ -जिसे कोई युद्ध से जीत न सके। राम के समय यह नगर अवध नाम की राजधानी से जाना जाता था। बौद्ध ग्रन्थों में इन नगरों के पहले अयोध्या और बाद में साकेत कहा जाने लगा। कालिदास ने उत्तरकोसल की राजधानी साकेत और अयोध्या दोनों ही का नामोल्लेख किया है।
 
 
अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों (अयोध्या, मथुरा, माया-हरिद्वार, काशी, कांची, अवंतिका-उज्जयिनी और द्वारका) में प्रथम स्थान पर की गई है। अयोध्या घाटों और मंदिरों की प्रसिद्ध नगरी है। सरयू नदी यहां से होकर बहती है। सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं। इनमें गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
 
भगवान राम का जन्म इक्ष्वाकु कुल में हुआ था। इसी कुल में जैन तीर्थंकर शांतिनाथ का भी जन्म हुआ। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में हुआ और इसी वंश में जैन तीर्थंकर नेमिनाथ का भी जन्म हुआ। तीर्थंकर पुष्पदंत की माता रमारानी इक्ष्वाकु कुल की थीं। वैवस्वत मनु के 10 पुत्रों में से 1 का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

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