कोई संन्यासी भगवा वस्त्र कब और कैसे पहन लेता है, जानिए 10 खास बातें

अनिरुद्ध जोशी

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019 (12:00 IST)
1.गेरू और भगवा रंग एक ही है, लेकिन केसरिया में मामूली-सा अंतर है। स्वयंभू संन्यासी जब ये रंग पहनता है तो यह धर्म का अपमान समझें, लेकिन किसी अखाड़े या हिन्दू संन्यासी संप्रदाय की संन्यासी परंपरा में दीक्षित होकर साधना करके भगवा रंग पहनता है तो वह सचमुच ही संन्यासी होता है। ऐसा संन्यासी जिसने धर्म, देश या मोक्ष के लिए अपना परिवार और सुख सबकुछ छोड़ दिया और ब्रह्मचर्य को धारण कर लिया है।
 
 
2.हिन्दू धर्म में भगवा, केसरिया, लाल और पीले रंग का अलग-अलग महत्व है। रंगों से आप जान सकते हैं कि कौन सा संन्यासी क्या है। केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है, जो मुमुक्षु होकर मोक्ष के मार्ग पर चलने लिए कृतसंकल्प होते हैं। ऐसे संन्यासी खुद और अपने परिवारों के सदस्यों का पिंडदान करके सभी तरह की मोह-माया त्यागकर आश्रम में रहते हैं। भगवा वस्त्र को संयम, संकल्प और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।
 
 
3.साधुओं में महंत का पद सबसे बड़ा होता है। महंत बनना असान नहीं होता यह बहुत कठिन साधना, समर्पण, सेवा और शिव एवं गुरु भक्ति के बाद प्राप्त होता है। लाखों संन्यासियों में से कोई एक महंत बनता है। हिन्दु सन्यासियों के 13 अखाड़े और दसनामी संप्रदाय है। सभी में महंत बनाने की प्रक्रिया अलग अलग होती है। दसनामियों से अलग नाथ संप्रदाय को देश का सबसे बड़ा संप्रदाय माना जाता है जिसके महंत है योगी आदित्यनाथ।
 
 
4.कैसे बने नाथ : भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। भगवान शंकर के बाद इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम भगवान दत्तात्रेय का आता है। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। दत्तात्रेय को महाराष्ट्र में नाथ परंपरा का विकास करने का श्रेय जाता है। दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है।
 
 
5. भगवान दत्तात्रेय के बाद सिद्ध संत गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने 'नाथ' परंपरा को फिर से संगठित करके पुन: उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित करने का कार्य किया। चौरासी नाथों की परंपरा में सबसे प्रमुख हैं। उन्हें बंगाल, नेपाल, असम, तिब्बत और बर्मा में खासकर पूजा जाता है।
 
 
6. गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के बाद उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ ने शैव धर्म की सभी प्रचलित धारणाओं और धाराओं को एकजुट करने 'नाथ' परंपरा को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। उनके लाखों शिष्यों में हजारों उनके जैसे ही सिद्ध होते थे।
 
 
7. इसके अलावा 'नाथ' साधुओं में प्रमुख नाम है- भर्तृहरि नाथ, नागनाथ, चर्पटनाथ, रेवणनाथ, कनीफनाथ, जालंधरनाथ, कृष्णपाद, बालक गहिनीनाथ योगी, गोगादेव, रामदेव, सांईंनाथ आदि।
 
 
8. गोरखनाथ के संप्रदाय की मुख्य 12 शाखाएं- 1. भुज के कंठरनाथ, 2. पागलनाथ, 3. रावल, 4. पंख या पंक, 5. वन, 6. गोपाल या राम, 7. चांदनाथ कपिलानी, 8. हेठनाथ, 9. आई पंथ, 10. वेराग पंथ, 11. जैपुर के पावनाथ और 12. घजनाथ।
 
 
9. महार्णव तंत्र में कहा गया है कि नवनाथ ही 'नाथ' संप्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। नवनाथों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलती है। यथाक्रम- मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, गहनिनाथ, जालंधरनाथ, कृष्णपाद, भर्तृहरिनाथ, रेवणनाथ, नागनाथ, चर्पटनाथ।
 
 
10.वर्तमान में गोरखनाथ संप्रदाय की संपूर्ण शाखाओं के प्रमुख कई महान संत हैं। उक्त सभी संप्रदाय और शाखाओं के संत गुरु गोरखनाथ पीठ से जुड़े हुए हैं जिनके महंत हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिन्हें अब महंत आदित्यनाथ कहा जाता है।
 

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