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जलवायु शिखर सम्मेलन 2025 : COP30 की ओर बढ़ते कदम

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, बुधवार, 24 सितम्बर 2025 (18:02 IST)
दक्षिण एशिया में बाढ़, उत्तरी अमेरिका में जंगल की आग और योरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने वैज्ञानिकों की वर्षों पुरानी चेतावनी को और पुख़्ता कर दिया है : जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार, राजनीतिक प्रतिक्रिया से कहीं ज़्यादा तेज़ है। इसी पृष्ठभूमि में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश, यूएन महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान, जलवायु शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं, ताकि दुनियाभर के देश, नवम्बर में ब्राज़ील में होने वाले COP30 से पहले अपने संकल्प मज़बूत करें।
 
बुधवार 24 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होने वाला यह शिखर सम्मेलन, COP30 की तैयारी के लिए आधारशिला की तरह देखा जा रहा है। यह सामान्य जलवायु वार्ताओं की तरह व्यापक नहीं होगा, बल्कि एक केन्द्रित उच्चस्तरीय बैठक होगी, जहाँ राष्ट्र प्रमुख, सरकारी नेता, व्यवसाय और नागरिक समाज, ठोस प्रतिबद्धताएँ व नई राष्ट्रीय जलवायु योजनाएँ पेश करेंगे।
 
अगले दशक के लिए साहसिक कार्रवाई
आयोजकों के अनुसार, शिखर सम्मेलन का शासनादेश बिल्कुल स्पष्ट है : पेरिस समझौते से जुड़े देशों को नए या संशोधित NDCs (राष्ट्रीय स्तर पर तय जलवायु योगदान) पेश करने होंगे, जो अगले दशक के लिए साहसिक कार्रवाई तय करेंगे। 2015 का ऐतिहासिक पेरिस समझौता, जलवायु संकट से निपटने की वैश्विक प्रतिबद्धता का आधार रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने स्पष्ट कहा है कि मौजूदा जलवायु वादे अपर्याप्त हैं। अब तक केवल कुछ ही देशों ने 2025 के लिए अपने एनडीसी (राष्ट्रीय जलवायु योगदान) संशोधित किए हैं।  UNFCCC के अनुसार, मौजूदा योजनाओं से 2030 तक उत्सर्जन में केवल 2।6% की कमी होगी, जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1।5°C तक सीमित रखने के लिए 43% कटौती ज़रूरी है।
 
इस लिहाज़ से यह शिखर सम्मेलन नेताओं के लिए चुनौती और अवसर दोनों है। उनसे उम्मीद है कि वे केवल पुराने वादे दोहराने तक सीमित नहीं रहें, बल्कि नए एनडीसी घोषित करें, उनके क्रियान्वयन की स्पष्ट योजना दें और दिखाएँ कि ये क़दम तेज़ी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के साथ कैसे मेल खाते हैं। पाकिस्तान में हाल के वर्षों में बारिश और बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है।
 
अभी क्यों?
यह शिखर सम्मेलन, वैज्ञानिक और राजनैतिक वास्तविकताओं के कारण और भी अहम हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने बताया है कि 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा, जिसमें औसत वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1।6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज हुआ। उधर, अन्तरराष्ट्रीय राजनैतिक माहौल पहले से कहीं अधिक विभाजित नज़र आ रहा है।
संयुक्त राज्य अमेरिका को अब भी दुनिया के सबसे बड़े ऐतिहासिक प्रदूषकों में गिना जाता है। मगर वह 2025 की शुरुआत में पेरिस समझौते से बाहर हो गया था। जलवायु वित्त और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने के कारण विकासशील देशों में यह सन्देह गहराता जा रहा है कि जिस मदद का उन्हें वादा किया गया था, क्या वो उन्हें वाक़ई मिल पाएगी।
 
लेकिन साथ ही कुछ सकारात्मक रुझान भी नज़र आ रहे हैं। 2024 में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश पहली बार 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया, जो जीवाश्म ईंधन में हुए निवेश से आगे निकल गया। जीवाश्म ईंधन अप्रसार सन्धि जैसे नए प्रयासों को भी समर्थन मिल रहा है। अब यह शिखर सम्मेलन तय करेगा कि क्या इन अच्छी शुरुआतों को और बड़ा रूप दिया जा सकता है।
 
छिपे संकेत
यह जलवायु शिखर सम्मेलन भले ही कोई औपचारिक वार्ता नहीं हो, लेकिन इसके नतीजे सीधे तौर पर ब्राज़ील में होने वाले COP30 की दिशा तय करेंगे। ब्राज़ील ने वादा किया है कि यह सम्मेलन जलवायु न्याय, जंगलों की रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा पर केन्द्रित होगा। लेकिन उस शिखर सम्मेलन की सफलता काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि इस सप्ताह न्यूयॉर्क में क्या हासिल होता है।
विश्लेषक तीन संकेतों पर नज़र रखेंगे। पहला, क्या बड़े उत्सर्जक देश उत्सर्जन की खाई पाटने के लिए ठोस योजनाएँ पेश करेंगे? दूसरा, क्या जलवायु वित्त, वादों से आगे बढ़कर वास्तविक रूप लेगा- ख़ासतौर पर हानि एवं क्षति कोष के लिए, जिसमें अब तक केवल 78।9 करोड़ डॉलर का ही वादा किया गया है, जबकि ज़रूरत इससे कई गुना अधिक है? 
 
और तीसरा, क्या नेता यह मानेंगे कि कोयला, तेल और गैस का विस्तार पेरिस समझौते के लक्ष्यों से बिल्कुल मेल नहीं खाते? अगर इन मोर्चों पर ठोस प्रगति नहीं हुई, तो COP30 के भी केवल अधूरी उम्मीदों का मंच बनकर रह जाने का ख़तरा है। विश्व के अनेक देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भीषण तबाही का सामना कर रहे हैं।
 
बहुत-कुछ दाँव पर
संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश के लिए यह शिखर सम्मेलन केवल औपचारिकता नहीं है। यह बढ़ते वैश्विक मतभेदों के बीच बहुपक्षवाद में भरोसा जगाने और यह दिखाने का अवसर है कि जलवायु कार्रवाई से रोज़गार, बेहतर स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसे बड़े आर्थिक व सामाजिक लाभ मिल सकते हैं। 
 
उन्होंने कहा, जलवायु कार्रवाई के अवसर पहले कभी इतने स्पष्ट नहीं रहे। लेकिन पाकिस्तान और भारत में बाढ़ से बेघर हुए लोगों के लिए, या हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में सूखे से जूझते किसानों के लिए, यह शिखर सम्मेलन अवसरों से कम और अस्तित्व की जद्दोजहद से ज़्यादा जुड़ा है। जलवायु संकट के असर और राजनैतिक प्रतिक्रिया के बीच की खाई, आज पहले से कहीं अधिक गहरी महसूस हो रही है।
 
शब्दों से आगे अब कार्रवाई की बारी
सितम्बर 2025 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन भले ही COP30 का विकल्प नहीं हो, लेकिन यह निर्णायक साबित हो सकता है। यह वह मंच है जहाँ विश्व नेता अपने जलवायु महत्वाकाँक्षाओं को नई दिशा और गति दे सकते हैं, विश्वास बहाल कर सकते हैं तथा ब्राज़ील में होने वाले बड़े सम्मेलन की राह प्रशस्त कर सकते हैं।
अगर यह शिखर सम्मेलन साहसिक संकल्प, ठोस वित्तीय समर्थन और जीवाश्म ईंधन घटाने की स्पष्ट योजना सामने लाता है, तो यह पेरिस समझौते के वादों को बचाने की दिशा में एक निर्णायक क़दम साबित होगा।
 
समाधानों के लिए संवाद
महासभा के उच्च-स्तरीय सप्ताह में राष्ट्र प्रमुखों के भाषणों से परे, ‘समाधान संवाद’ भी आयोजित किए जाएँगे। इन विषयगत सत्रों में राष्ट्रीय नेताओं के साथ स्थानीय सरकारों, व्यावसायिक जगत और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होंगे। चर्चाएँ पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर केन्द्रित होंगी।
 
उत्सर्जन में कमी : जीवाश्म ईंधन का प्रयोग घटाना और नवीकरणीय ऊर्जा को तेज़ी से बढ़ाना।
अनुकूलन : बाढ़, सूखा और लू जैसी आपदाओं से निपटने की क्षमता मज़बूत करना, जिससे वैश्विक स्तर पर समुदाय प्रभावित हैं।
वित्त : विकासशील देशों को अधिक जलवायु वित्त उपलब्ध कराना, जिसमें केवल क़र्ज़ नहीं, अनुदान को प्राथमिकता मिले।
सटीक जानकारी: जलवायु से जुड़ी अफ़वाहों और ग़लत सूचनाओं से लड़ना तथा आँकड़ों व रिपोर्टिंग में पारदर्शिता लाना।
अन्य मुद्दे : खाद्य प्रणालियों में सुधार और न्यायसंगत बदलाव पर ध्यान देना। इन संवादों से निकली सिफ़ारिशों और प्रतिबद्धताओं को एक सारांश में संकलित करके, 24 सितम्बर के समापन सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा।

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