Urdu Literature Sahitya 42
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उर्दू साहित्य
ग़ालिब का ख़त- 28
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ग़ालिब का ख़त-27
अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़्सत
अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़्सत-ए-मेहफ़िल, के उठ के वो भी चला जिसका घर न था कोई।
नसीर अंसारी की ग़ज़लें
आज तुम याद बेहिसाब आए
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं ------फ़ैज़
घर नहीं रखते
इक छत तो बड़ी चीज़ है, छप्पर नहीं रखते----------- जो घर को बनाते हैं, वही घर नहीं रखते। ----- रेहबर
वली की ग़ज़लें
ऎ वली सर्व क़द कूँ देखूँगा वक़्त आया है सरफ़राज़ी
पेड़ों की तरह बारिश में भीगा हूँ
चमकती धूप तुम अपने ही दामन में न भर लेना मैं सारी रात पेड़ों की तरह बारिश में भीगा हूँ। -----ज़ुबेर रि
पर मेरी नब्ज़ छू नहीं सकते
हाथ मुझसे मिला के महफ़िल में तुम कहाँ खो गए ख़ुदा जाने चूमती हूँ मैं इन लबों से कभी और कभी अपनी आँख
ये वार किसका है
न पूछ पीठ पे तेरी ये वार किसका है------------------ बस इतना जान के तू रिश्तेदार किसका है -----कुँवर
अखतर नज़मी की ग़ज़लें
क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके
ग़ालिब की ग़ज़ल (शे'रों के मतलब के साथ)
दुनिया में आसान से आसान काम भी मुश्किल होता है। जिसका सुबूत ये है कि आदमी वैसे तो इंसान ही है लेकिन ...
सदियों ने सज़ा पाई
वो वक्त भी देखा है, तारीख़ की नज़रों ने लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई---- मुज़फ़्फ़र रज़मी
ख़ुदा है वो भी
लोग ख़ुश हैं उसे दे-दे के इबादत का फ़रेब वो मगर ख़ूब समझता है ख़ुदा है वो भी -------- ग़नी एजाज़
ग़ज़ल : मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
पहचान क्या होगी मेरी थम कर नहीं सोचा कभी मेरे हज़ारों रूप हैं, क़तरा कभी, दरया कभी
मीर की ग़ज़लें (3)
हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम थाम लिया
नज़्म : 'ज़ख़्म और मरहम'
तुम आखिर मेरी क्या हो = सच हो या एक सपना हो जानी अन्जानी सी हो = या एक कहानी सी हो
ग़ालिब की ग़ज़ल : हर शे'र के मतलब के साथ
इस दुनिया में वफ़ा एक बेमाअनी लफ़्ज़ है। वफ़ा के नक़्श से ज़माने में किसी को तसल्ली न हुई। वफ़ा एक ऎसा लफ़्ज़...
इस बदलते दौर में
इस बदलते दौर में जो कुछ भी हूँ मैं देख लो कल जो देखोगे तो मंज़र दूसरा हो जाएगा।
वादे पे ऎतबार किया
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऎतबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया ----दाग़ देहलवी
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