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वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बुरा सपना था 2022, क्यों 2023 को है भारत से बड़ी उम्मीद

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नृपेंद्र गुप्ता

बुधवार, 21 दिसंबर 2022 (08:30 IST)
कोरोना से उबरती दुनिया के लिए 2022 एक बुरे सपने की तरह साबित हुआ। रूस-यूक्रेन युद्ध, महंगाई और कोरोनावायरस की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई को थामने के लिए जब फेडरल रिजर्व ने कड़े कदम उठाए तो कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। वहीं रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों ने समृद्ध यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्‍था को झकझोर दिया। चीन, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देश आर्थिक रूप से परेशान नजर आए। लोगों की कॉस्ट ऑफ लिविंग बढ़ गई। कई देशों को खाद्य संकट ने परेशान किया तो ईंधन की कमी ने कुछ देशों की दाल पतली कर दी।
अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष (IMF) के अनुसार, वैश्विक विकास दर 2021 में 6 प्रतिशत से घटकर 2022 में 3.2 प्रतिशत रह गई। 2023 में इसके 2.7 प्रतिशत रहने की आशंका है। 2021 में वैश्विक मंहगाई दर 4.7 फीसदी थी, 2022 में बढ़कर 8.8 प्रतिशत हो गई। हालांकि 2023 में इसके घटकर 6.5 फीसदी तक पहुंचने की संभावना है।
 
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, 2022 में अमेरिका 20.89 ट्रिलियन की इकोनॉमी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्‍था बना हुआ है। चीन 14.72 ट्रिलियन के साथ दूसरे, जापान 5.06 ट्रिलियन इकोनॉमी के साथ तीसरे नंबर पर है। जर्मनी 3.85 ट्रिलियन के साथ  चौथे नंबर पर है। ब्रिटेन और भारत में कड़ा मुकाबला है। फिलहाल 2.67 ट्रिलियन इकोनॉमी के साथ ब्रिटेन 5वें और भारत 2.66 ट्रिलियन इकोनॉमी के साथ 6ठे नंबर पर है। 
 
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क्या है अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या : इस समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या इंटरेस्ट रेट (ब्याज दर) में बढ़ोतरी है। इसे ऐसे समझते हैं कि 2020 में 10 साल का बॉन्ड यील्ड 0.25 प्रतिशत था, जो नवबंर 2022 में बढ़कर 3.83 प्रतिशत हो गया। इससे पता चलता है कि डॉलर से दुनियाभर की अर्थव्यवस्‍था का संचालन करने वाले अमेरिका में घरेलू मोर्चे पर महंगाई किस कदर कहर ढा रही है।
 
इंग्लैंड में महंगाई की मार : 2022 इंग्लैंड के लिए बुरा सपना साबित हुआ है। बोरिस जॉनसन, थेरेसा मे जैसे दिग्गज प्रधानमंत्री के रूप में ब्रिटिश अर्थव्यस्था को मजबूती देने में नाकाम रहे हैं। ऋषि सुनक के राज में भी ब्रिटेन की आर्थिक परेशानियां कम नहीं हुई हैं। मूलभूल चीजें बहुत महंगी हो गई हैं। सरकार से स्कूलों में मुफ्त भोजन दिए जाने की मांग हो रही है। बिजली, गैस, खाने  के साथ ही घर और उससे जुड़ी चीजें भी काफी महंगी हुई हैं।
 
महंगाई ने दिया 'डबल' झटका : अर्जेंटीना, वेनेजुएला, ब्राजील आदि लैटिन अमेरिकी देशों की हालत भी अच्छी नहीं है। अर्जेंटीना में महंगाई दर 1 साल में डबल हो गई। नवबंर 2021 में जिन वस्तुओं के दाम 10 रुपए थे 2022 में बढ़कर 19 रुपए हो गए हैं। 5 माह में 3 वित्तमंत्री बदले जा चुके हैं। कहा जा रहा है कि 2023 में भी इस दक्षिण अमेरिकी देश को महंगाई से राहत नहीं मिलने वाली है।
 
डॉलर से मोहभंग : 2022 में अमेरिका को आर्थिक मोर्च पर उस समय एक और बड़ा झटका लगा जब कई देशों का डॉलर से  मोहभंग होता नजर आया। यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर जब रूस पर वित्तीय प्रतिबंध लगे तो रूस और भारत ने रुपए और रुबल में कारोबार शुरू कर दिया। दोनों देशों के बीच सफल रहे प्रयोग ने तजाकिस्तान, क्यूबा और सूडान समेत कई देशों का ध्यान खींचा। 2023 में कई ऐसे देश जिनके पास डॉलर का भंडार कम है, भारत के साथ रुपए में व्यापार कर सकते हैं। श्रीलंका, मॉरिशस समेत 4 देशों ने भारत में वोस्तरो अकाउंट (भारत में रुपए में खाता) खोलने में दिलचस्पी दिखाई है।
 
भारत से क्यों है उम्मीद : एक तरफ दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं संकट के दौर से गुजर रही है। लेकिन दुनिया की तमाम रैटिंग एजेंसियों को भारत से बड़ी उम्मीदें है। आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया जैसे अभियानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों दिलचस्पी को बढ़ाया है। खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता भारत की सबसे बड़ी ताकत है। एप्पल, फॉक्सवैगन जैसी बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियां भारत में अपने प्लांट डाल रही है। जब दुनिया भर के बाजारों से निवेशकों का मोहभंग हुआ, FDI और FII ने बाजार से अपना पैसा निकाला, भारत ने नए निवेशकों को  अपनी और आकर्षित किया। संकट के इस दौर में भी भारतीय शेयर बाजार शीर्ष पर बने हुए हैं। 
 
चीन से चौकन्ना रहने की जरूरत : भारत को इस दौर में चीन से विशेष तौर पर चौकन्ना रहने की जरूरत है। पिछले 2-3 सालों  ने कई बड़ी कंपनियों ने चीन से अपना व्यापार समेट कर भारत में निवेश किया है। ऐसे में चीन भारत के सामने बड़ी बाधा  उत्पन्न कर सकता है। चीन बड़ी मात्रा में भारत से सामान निर्यात करता है। फिलिपींस समेत कई देशों के माध्यम से चीनी सामान भारत आता है। बहरहाल आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों की राह में चीन बड़ा रोड़ा बन सकता है। चालबाज चीन LAC पर तनाव बढ़ाकर भी विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश से रोकने की योजना बना सकता है।
 
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2023 में अर्थव्यवस्था पर रहेगा प्रेशर : फाइनेंशियल एक्सपर्ट और फिनेस्ट्रोसाइकल्स के फाउंडर नितिन भंडारी ने कहा कि 2023 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए थोड़ा प्रेशर दिखता है। सबसे महत्वपूर्ण चीज है इंटरेस्ट रेट। सारी कहानी अर्थ पर ही निर्भर है। जब से रूस यूक्रेन का मुद्दा शुरू हुआ है। क्रूड ऑयल की कीमतें नीचे आई हैं। जबकि कॉमन थ्योरी होती है कि युद्ध के समय क्रूड की कीमतें ऊपर जाती हैं। यह कुछ ही समय के लिए होता है। युद्ध के समय प्राइसेस नीचे ही जाती हैं और अभी भी नीचे ही है। क्रूड ऑइल मिडिल ईस्ट में होता है। वहां वेलफेयर आदि में काफी पैसा देना होता है। खुद के खर्चे भी ज्यादा हैं। वॉर के कारण इन देशों पर प्रेशर आ गया है।
 
उन्होंने कहा कि पुरी दुनिया एक दूसरे से जुड़ी हुई है। सभी देशों के निवेशक एक दूसरे के यहां डायरेक्ट या इनडायरेक्ट निवेश करते हैं। गवर्नमेंट बांड्स और स्टॉक मार्केट में होता है। सबसे ज्यादा बड़े निवेशक अमेरिका में हैं। पूरी दुनिया में पैसा लगाते हैं और घुमाते रहते हैं। इमरजिंग मार्केट में भारत, रूस, मिडिल ईस्ट आदि देश हैं। अमेरिका में इंटरेस्ट रेट बढ़ने से FPI भारत से  निवेश किया गया पैसा निकाल रहे हैं।
 
अमेरिका में पहले एक घर 10 लाख डॉलर में मिलता था तो उस पर 1 लाख डॉलर का डाउनपेमेंट करना होता था। आज अगर आप घर खरीदने जाएंगे तो आपको 1.5 लाख रुपए डाउन पेमेंट करना होगा। EMI भी 2000 डॉलर से बढ़कर 4000 डॉलर प्रतिमाह हो जाएगी। इससे लोग घर खरीदने के बजाए किराए का घर लेना पसंद करेंगे। इंटरेस्ट रेट बढ़ने की वजह से कार, रिसेल कारों की बिक्री में भी गिरावट आई है। अमेरिका ही नहीं यूरोपीय देशों में भी यही हाल है। यहां तक कि भारत में भी लोगों पर EMI का बोझ तो बढ़ा ही है।
 
भंडारी ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की समस्या चीन और यूरोप की समस्या ब्रेक्जिट से जुड़ी है। नेचरल गैस यहां बड़ा कंपोनेंट है। महंगाई भी बड़ी समस्या है। रूस गेहूं, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और रक्षा सामानों का बड़ा निर्यातक है। रूस यूक्रेन युद्ध की वजह से यूरोपीय देशों में फूड क्राइसेस बड़ी समस्या बन गया है। डिमांड सप्लाय में अंतर की वजह से महंगाई बढ़ेगी।
 
फाइनेंशियल एक्सपर्ट सागर अग्रवाल ने बताया कि 2022 में वैश्विक अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिरी है। हर देश में महंगाई बढ़ी है। बैंक ने ब्याज दर बढ़ाई इससे बैंक लोन की EMI काफी बढ़ गई। कमाई का सोर्स लिमिटेड होने से स्थिति बदतर हुई है। भारत के अलावा किसी भी देश की GDP पॉजिटिव नहीं है, 2023 में दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में भी आ सकती है। इस स्थिति में भी FII पर हमारी निर्भरता घटी है। रूस से हमने आधे से कम दाम में क्रूड खरीदा।
 
बहरहाल ऐसा माना जा रहा है कि 2022 की तरह ही 2023 में भी दुनियाभर की अर्थव्यवस्था दबाव में रहेगी। भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत दिखाई दे रही हो लेकिन अगर दुनिया की अर्थव्यवस्था गिरी तो भारत पर इसका कुछ असर तो होगा ही। 

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