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Lord rama stotram: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अमृतस्तोत्रम्

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lord ram and hanuman
- डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानन्द व्यास
 
'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अमृतस्तोत्रम्' सध्य: स्वरचित सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय प्रस्तुत है– यह रामरक्षा की भावभूमि और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के समस्त उच्चतम गुणों को ध्यान में रखकर वेदविद पंडित पूर्णानंद जी व्यास के अपार आशीर्वाद से रचा गया मौलिक स्तोत्र है, जो सभी प्रकार के सुख, चतुष्पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) और रामभक्त में उच्च गुणों की जागृति के लिए प्रार्थना करता है। पहले संस्कृत मन्त्र, उसके बाद संक्षिप्त अर्थ हिन्दी में।
 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अमृतस्तोत्रम्

 
1. मङ्गलाचार–शिरोमणिः
श्रीरामं राघुवरं सत्यधर्मपरायणम्।
वन्दे मर्यादरूपं तं करुणामृतसागरम् ॥
अर्थ: मैं श्रीराम रघुवर को प्रणाम करता हूँ, जो सत्य और धर्म के परम आश्रय हैं, जो स्वयं मर्यादा का मूर्त स्वरूप और करुणा के अमृत-सागर हैं।
 
2. सर्वसुख‑वर्द्धक श्रीराम स्मरण
रामं स्मरामि सततं सुखसारमेकं,
यो दुःखजालविलयं कुरुते क्षणेन।
स्मेराननं शिशुरिव प्रशमान्तरात्मा,
तं सीतया सह हृदि सन्नयनेन नित्यम् ॥
अर्थ: मैं सदा श्रीराम का स्मरण करता हूँ, जो सुख का एकमात्र सार हैं, जो क्षणभर में दुःखजाल का नाश कर देते हैं; जिनका मुख बालक की भाँति प्रसन्न है और जिनका अंतःकरण शान्त है – मैं सीताजी सहित ऐसे राम को हृदय और दृष्टि में बसाता हूँ।
 
3. धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष–सिद्धिद श्रीरामः
धर्मार्थकाममोक्षाणां दाता दाशरथी प्रभुः।
अनन्यभक्तिवश्यो यः स रामः शरणं मम॥
अर्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष– इन चारों पुरुषार्थों के दाता दशरथनन्दन प्रभु श्रीराम हैं; जो अनन्य भक्ति से वश में रहते हैं, वही श्रीराम मेरे शरणदाता हैं।
 
4. सत्यनिष्ठा और मर्यादा की प्रार्थना
सत्यव्रतं सत्यरूपं सुलभं सत्यभाषिणम्,
लोकहितार्थं स्वहितं यो न्यस्यति सदा स्वयम्।
तं रामं मर्यादगुरुं नमामि शिरसा मुहुः,
मयि सत्यनिष्ठां देहि धैर्यं चाविचलम् प्रभो ॥
अर्थ: जो स्वयं सत्यव्रती, सत्यस्वरूप और सदा सत्य बोलने वाले हैं; जो लोकहित के लिए अपने स्वार्थ का त्याग कर देते हैं– ऐसे मर्यादा-गुरु श्रीराम को मैं बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ; हे प्रभो! मुझमें भी सत्यनिष्ठा और अटल धैर्य प्रदान कीजिए।
 
5. विनम्रता, सरलता और उदारता
गौरवेऽपि नम्रता यस्य, बलवत्वे दयालुता।
राज्येऽपि सहजसौम्यता सीताया हृदयप्रियः।
निषदशबरसुग्रीवविभीषणाद्यनुग्रही,
तं रामं हृत्स्थं कुर्मि नमो दीनवात्सल ॥
अर्थ: जिनमें महानता के साथ विनम्रता है, सामर्थ्य के साथ दया है, राज्य के बीच भी सहज सौम्यता है, जो सीताजी के हृदय के प्रिय हैं, जो निषाद, शबरी, सुग्रीव, विभीषण आदि पर करुणा बरसाते हैं– ऐसे दीन–वत्सल राम को मैं हृदय में स्थापित करता हूँ।
 
6. कृतज्ञता का वरदान
कृतज्ञो यो लघ्वुपकारं न विस्मरति कदाचन,
यः स्मरन् शबर्याः फलानि हर्षेण स्वयमेव अश्नाति।
सुकृतिनां साहाय्यं न जहाति रघुनन्दनः,
स एव मे चेतसि नित्यं कृतज्ञभावं ददातु ॥
अर्थ: जो थोड़ा-सा उपकार भी कभी नहीं भूलते, जो शबरी के प्रेमपूर्ण फलों को स्वयं हर्षपूर्वक ग्रहण करते हैं, जो सज्जनों की सहायता को जीवन भर नहीं छोड़ते – ऐसे रघुनन्दन मेरे चित्त में सदा कृतज्ञता की भावना स्थापित करें।
 
7. करुणा और सहानुभूति–प्राप्ति
करुणामृतपूरितहृदयः सर्वजीवदयापरः,
शत्रौ अपि समदर्शिता यस्य, सीतापतिः सदा।
भक्तवत्सलो दीनबन्धुः लोकनायक ईश्वरः,
स रामो मे मनसि नित्यं सहानुभूतिं प्रसूतु॥
अर्थ: जिनका हृदय करुणा के अमृत से भरा है, जो सब जीवों पर दया करने वाले हैं, जो शत्रु में भी समभाव रखते हैं– ऐसे सीतापति, भक्तवत्सल, दीनबन्धु, लोकनायक ईश्वर श्रीराम मेरे मन में सदा निवास कर सहानुभूति (एम्पैथी) को जन्म दें।
 
8. धैर्य– Resilience– विपत्तियों में अडिगता
वनवासे न विषादोऽभूत्, न राज्येऽभिमानिता।
सीतावियोगवेदना हृदयेरपि न धर्मभ्रंशः।
लङ्कायुद्धविप्लवेऽप्यशोकधैर्यसमन्वितः,
तं रामं धृतिमूर्तिं नमामि स्थैर्यदायिनम् ॥
अर्थ: वनवास में जिनको शोक नहीं हुआ, राज्य में जिनको अभिमान नहीं हुआ, सीताजी के वियोग की पीड़ा से दग्ध होने पर भी जिनका धर्म नहीं टूटा, लंका-युद्ध के महाविप्लव में भी जो धैर्य से युक्त रहे– ऐसे धृति के मूर्तस्वरूप श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ, वे मुझे भी स्थिरता और Resilience का वर दें।
 
9. अन्तःशुद्धि और मर्यादा–संरक्षण
मनसा वाचा कर्मणा यः नित्यं सन्मार्गगोचरः,
कामक्रोधलोभादिदोषजालविरोधकः।
स्वस्योपरि नियमं स्थाप्य लोकस्य हितमीहते,
स रामो मे अन्तरङ्गे स्वमर्यादां रक्षतु नित्यम्॥
अर्थ: जो मन, वचन और कर्म से सदा सद्मार्ग पर चलते हैं, जो काम, क्रोध, लोभ आदि दोषों के पूर्ण विरोधी हैं, जो अपने ऊपर नियम रखकर भी लोकहित का प्रयास करते हैं– ऐसे श्रीराम मेरे भीतर की मर्यादा की रक्षा सदा करें।
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10. रामभक्त–गुणों की याचना
रामदास्ये प्रीतिरस्तु रामनाम्नि रतिः परा।
रामकार्यार्थनिरतो भवेदेवं मम जीवितम्।
श्रीरामपादपङ्केरुहभक्तिरेव ममाधिका,
मानदोऽहं न भूयासं, सेवकः स्यान्निरन्तरम्॥
अर्थ: मुझे रामदास्य (सेवक–भाव) में प्रेम प्राप्त हो, रामनाम में उच्चकोटि की रुचि बने, मेरा जीवन रामकार्य में निरत हो, और श्रीराम के चरण-कमलों की भक्ति ही मेरे लिए सबसे बड़ा धन बने; मैं मान (अहंकार) देने वाला न बनूँ, सदैव सेवक रहूँ।
 
11. सर्वसुख–सिद्धि और शान्ति–प्रार्थना
आनन्दसिन्धो राम त्वं, शरण्यः सर्वसिद्धिदः।
मम चित्ते नित्यमेव नित्यशुद्धः प्रकाशस्व।
दुःखसन्तापतप्तानां शरण्यं भव रघूत्तम,
सर्वानन्दान् देहि नः त्वं, धर्मयुक्तान् सुशाश्वतान् ॥
अर्थ: हे आनन्द-सागर, शरण्य, सर्वसिद्धिदाता श्रीराम! मेरे चित्त में सदा शुद्ध, निर्मल प्रकाश के रूप में प्रकट रहिए। हे रघूत्तम! जो लोग दुःख और संताप से जल रहे हैं, उनके शरणदाता बनिए, और हम सबको धर्मयुक्त, शाश्वत, अन्तःकरण–सन्तोषपूर्ण आनन्द प्रदान कीजिए।
 
12. पुरुषार्थ–सिद्धि का विशेष मन्त्र
धर्मं देहि रघुवर, मे बुद्धौ नित्यनिवासिनम्।
अर्थं देहि न निरधर्म्यं, लोकसेवोपकारकम्।
कान्तिं देहि सुशीलता–सहिताम् सत्संगसमन्विताम्,
मोक्षं देहि भवबन्धमोचनरूपं रामचन्द्र प्रभो॥
अर्थ: हे रघुवर! मेरे बुद्धि में सदा स्थित रहने वाला, अटल धर्म मुझे दीजिए। वह अर्थ दीजिए जो अधर्म से न प्राप्त हो, जो लोकसेवा और उपकार का साधन बने। ऐसी कामना (कान्ति) दीजिए जो सुशीलता और सत्संग से युक्त हो। और अंततः ऐसा मोक्ष दीजिए जो समस्त भवबन्धनों को काटने वाला है, हे रामचन्द्र प्रभु!
 
13. रामनाम–अमृत दीक्षा
श्रीराम राम रामेति, नामामृतमिदं शिवम्।
यः जपति श्रद्धया नित्यं, तस्य मौनं जपः स्मृतः।
अन्तःकरणशुद्ध्यर्थं नामैक्यं मे प्रसीदतु,
रामनाम्परमे मन्त्रे, चित्तं मे नित्यमास्थितम्॥
अर्थ: “श्रीराम राम राम” यह नाम अमृतमय और मंगलकारी है; जो इसे श्रद्धा से नित्य जपता है, उसका मौन भी जप मान लिया जाता है। मेरे अंतःकरण की शुद्धि के लिए यह रामनाम ही मेरे भीतर बस जाए, और मेरा चित्त सदा इसी परम मन्त्र में स्थित रहे।
 
14. वैश्विक शान्ति–रामराज्य–प्रार्थना
यत्र धर्मो नित्यनिवसति, यत्र लोका न भीयते।
यत्र राज्ञो मनो धर्मे, न स्वार्थे न्यस्तमेव हि।
तद् राज्यं रामराज्यं स्यात्, करुणासारसंयुतम्,
तादृशं लोकमङ्गलं नो देहि नाथ रघूपते॥
अर्थ: जहाँ धर्म सदा निवास करता हो, जहाँ लोग भयमुक्त हों, जहाँ राजा का मन अपने स्वार्थ में नहीं, धर्म में लगा हो – वही राज्य “रामराज्य” है, जो करुणा-सार से युक्त और लोकमंगलमय है। हे रघुपति! हमें ऐसा विश्व प्रदान कीजिए, कम से कम ऐसा समाज, ऐसा परिवार, ऐसा अंतःकरण तो अवश्य दीजिए।
 
15. फलश्रुति – स्तोत्रपाठ का फल
यः पठेत् प्रातरुत्थाय “श्रीराम अमृतस्तोत्रकम्”,
स दुःखनाशनं प्राप्य सर्वसौख्यसमन्वितः।
पुरुषार्थचतुष्टयं लभते नात्र संशयः,
रामभक्तिरनन्ता च तस्य हृदि प्रसीदति॥
अर्थ: जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इस “श्रीराम अमृतस्तोत्र” का पाठ करता है, वह दुःखों का नाश पाकर, समस्त प्रकार के सुखों से युक्त होता है; उसे चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्त होते हैं – इसमें कोई संशय नहीं; और उसके हृदय में अनन्त रामभक्ति जागृत होती है।
 
16. समर्पण–श्लोक
न ममास्ति बलं किञ्चिद्, न मे ज्ञानसमृद्धयः।
यदिहोक्तं स्तवं देव, तद् सर्वं त्वत्प्रसादतः।
स्वीकुरुष्व रघुश्रेष्ठ, भक्तेः सूक्ष्मानुरूपतः,
सीतायै सह रामाय, नित्यसमर्पणं मम॥
अर्थ: मेरा अपना कोई बल नहीं, न ही ज्ञान की विशेष सम्पन्नता है; हे देव! जो भी यह स्तुति कही गई, वह सब आपकी ही कृपा से है। हे रघुश्रेष्ठ! इसे मेरी सूक्ष्म भक्ति के अनुरूप स्वीकार कीजिए– यह सब सीताजी सहित श्रीराम को मेरा नित्य समर्पण है।
 
17 सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय समर्पण–श्लोक
वेदाचार्यपूर्णानन्दव्यासआशीर्वचोबलात्।
तेजप्रकाशव्यासेन रचितं भक्तिसंयुतम्॥
रामनवम्यां महापुण्ये स्तोत्रमेतद उत्तमम्।
श्रीरामपादभक्त्यर्थं पुण्यानन्दप्रदं भवेत्॥
॥ इति सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय श्रीमर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अमृतस्तोत्रं संपूर्णम ll
 
भावार्थ-
॥“वेदाचार्य पं. पूर्णानन्द व्यास के आशीर्वादबल से तेजप्रकाश व्यास द्वारा यह उत्तम स्तोत्र रामनवमी के पावन अवसर पर भक्तिभाव से रचा गया है, जो श्रीराम के चरणों की भक्ति से पूरित होकर पुण्य और आनन्द प्रदान करने वाला है।”
 
II सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय श्रीमर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अमृतस्तोत्रं संपूर्णम ll

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