पियरी का सपना : रोचक व पठनीय

स्त्री के अस्तित्व से साक्षात्कार

Webdunia
शरद सिंह
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मैत्रेयी पुष्पा स्त्रियों की स्थितियों-परिस्थितियों के सूक्ष्म आकलन तथा कुशल प्रस्तुतिकरण में सिद्धहस्त हैं। उनकी कहानियों से गुजरते हुए स्त्री के अस्तित्व के उन तमाम पक्षों से साक्षात्कार होता है जिन्हें जाने बिना स्त्री के पूरे वजूद को समझ पाना कठिन है। 'पियरी का सपना' मैत्रेयी पुष्पा का नवीनतम कहानी संग्रह है।

इस संग्रह की कहानियाँ संसार में स्त्री और स्त्री के संसार को सामने ला खड़ा करती हैं। यह स्त्री चेतना की कहानियों का अनूठा संग्रह है। इन कहानियों की स्त्री अपने प्रति समाज के रवैये से चकित है किंतु भयभीत नहीं। भले ही उसे आवारा (मुस्कराती औरतें) कहा जाए, उसे उन क्षेत्रों में घुसपैठ करने से रोका जाए जो पुरुषों के लिए रक्षित माने जाते हैं (आवारा न बन)। फिर भी वह मात देने को कमर कस कर खड़ी लड़की (रिश्ते का नक्शा) के रूप में दृढ़ दिखाई देती है।

संग्रह की पहली कहानी 'मुस्कराती औरतें' के माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के प्रति पुरुषसत्तात्मक दृष्टिकोण को उसी संवेदनशीलता के साथ सामने रखा है जिसके लिए वे सुविख्यात है। हर व्यक्ति प्रतिदिन समाचारपत्र के पन्ने पलटता है और उसे उसमें लगभग प्रत्येक संदर्भ में युवतियों के छायाचित्र रहता है।

स्वागत समारोह हो या हड़ताल हो उसमें भी स्त्रियों और लड़कियों के छायाचित्र रहते है। स्वागत समारोह हो या हड़ताल हो उसमें भी स्त्रियों और लड़कियों के छायाचित्र को प्राथमिकता दी जाती है। किसी सिनेमाघर के परिसर में भीड़ का दृश्य हो तो वहाँ भी स्त्रियों और लड़कियों को ढूँढ कर तस्वीर में कैद किया जाता है।

बारिश होने पर बारिश में भीगती युवतियों की तस्वीर तो बड़े ही रोचक ढंग से मुखपृष्ठ की वस्तु बन जाती है। अब प्रश्न उठता है कि समाचारपत्र जितनी सहजता से स्त्रियों और युवतियों को अपने कलेवर को जीवन्त करने के लिए सामने रखते हैं, क्या समाज का हर व्यक्ति उन्हें सहज रूप से स्वीकार कर पाता है?

बारिश में भीगती हुई घर लौटती युवती का छायाचित्र यदि बेपरवाह यौवन जैसे शीर्षक के साथ प्रकाशित हो और दुर्योग से वह लड़की किसी संकुचित मानसिकता वाले कस्बे और संकीर्ण विचारों वाले परिवार की हो तो उस पर क्या कहर बरसेगा, यह उसका चित्र प्रकाशित करने वाला सोच भी नहीं सकता है।

समकालीन दौर की चर्चित वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने इसी अनछुए मुद्दे को बड़ी ही बारीकी के साथ अपनी कहानी में पिरो कर एक कटु सच्चाई बयान की है कि जो बात किसी युवती के लिए जघन्य अपराध है वह किसी युवक के लिए कोई मायने नहीं रखता है। समाज का दृष्टिकोण भी पुरुष द्वारा किया गया अपराध स्त्री के सिर ही मढ़ता है।

इसीलिए बारिश में भीगती हुई तस्वीर छपने के बाद युवती का भाई उससे अकड़ कर कहता है, 'मैं लड़का हूँ सो मर्द हूँ। मेरी फोटो कोई कैसे खींचता? खींचकर करता भी क्या? कोई उसे क्यों देखता? सब लोग तेरी और रेनू की फोटो देख रहे थे आँखें फाड़-फाड़ कर और फिर आवारा कह कर एक-दूसरे को आँख मार रहे थे। मुझसे सहन नहीं हुआ, मैं भाग आया।'

जिस समाज में इश्क को सेक्स बनाकर समझा गया है उस समाज में किसी स्त्री को प्रेम की सहज अनुमति मिलना कितना कठिन है, इसे इस संग्रह की कहानियों के जरिए बखूबी समझा जा सकता है। छुटकारा बहुत पहले का चलन , जवाबी कागज, संबंध, 1857: एक प्रेम कथा वे कहानियाँ हैं जो पाठक को अपने साथ-साथ उस गोपन कक्ष में ले जाती हैं जहाँ हर उस व्यक्ति के लिए प्रवेश संभव नहीं है जिसमें विशिष्ट संवेदनाएँ नहीं हैं।

पियरी का सपना एक स्त्री के दिवास्वप्नों की कथाएँ नहीं वरन स्त्री-अस्तित्व की मर्मस्पर्शी कहानियाँ हैं जो पहली बार में ही मन-मस्तिक पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। यह बार-बार पढ़े जाने योग्य संग्रह है।

पुस्तक : पियरी का सपना
लेखिका : मैत्रेयी पुष्पा
प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन
मूल्य : 300 रुपए

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