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खंडग्रास सूर्यग्रहण क्या होता है?

अनिरुद्ध जोशी
26 दिसंबर को वर्ष का अंतिम सूर्य ग्रहण है। ज्योतिष की दृष्टि में यह खंडग्रास सूर्यग्रहण है। दक्षिण भारत में यह कंकणाकृति स्थित में वलयकार दिखाई देगा। यह सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर को सुबह 8 बजकर 17 मिनट से प्रारंभ होकर 10 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। हिन्दू माह पौष की अमावस्य को मूल नक्षत्र और धनु राशि में होने वाले इस सूर्य ग्रहण का सूतक काल एक दिन पहले बुधवार शाम 5 बजकर 31 मिनट पर प्रारंभ होगा।
 
 
खंड ग्रास का अर्थ अर्थात वह अवस्था जब ग्रहण सूर्य या चंद्रमा के कुछ अंश पर ही लगता है। अर्थात चंद्रमा सूर्य के सिर्फ कुछ हिस्से को ही ढंकता है। यह स्थिति खण्ड-ग्रहण कहलाती है, जबकि संपूर्ण हिस्से को ढंकने की स्थिति खग्रास ग्रहण कहलाती है।
 
 
सूर्य ग्रहण तब होता है जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चंद्रमा द्वारा आवृत्त हो जाए। वैज्ञानिकों के अनुसार धरती सूरज की परिक्रमा करती है और चंद्रमा धरती की परिक्रमा करता है। जब सूर्य और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है तो वह सूर्य की रोशनी को कुछ समय के लिए ढंक लेता है। इस घटना को ही सूर्य ग्रहण कहते हैं।
 
 
सरल अर्थों में जब पृथ्वी पर चंद्रमा की छाया पड़ती है तब सूर्य ग्रहण होता है और जब पृथ्वी सूर्य तथा चंद्रमा के बीच आती है, तब चंद्र ग्रहण होता है।उल्लेखनीय है कि इसके बाद अगले वर्ष 2020 में 2 सूर्य ग्रहण होंगे। पहला 21 जून को जबकि दूसरा 14 दिसंबर को।


सूर्य ग्रहण के प्रकार
1.पूर्ण सूर्य ग्रहण : चंद्रमा जब सूर्य को पूर्ण रूप से ढंग लेता है तो ऐसे में चमकते सूरज की जगह एक काली तश्तरी-सी दिखाई है। इसमें सबसे खूबसूरत दिखती है 'डायमंड रिंग।' चंद्र के सूर्य को को पूरी तरह से ढंकने से जरा पहले और चांद के पीछे से निकलने के फौरन बाद काली तश्तरी के पीछे जरा-सा चमकता सूरज हीरे की अंगूठी जैसा दिखाई देता है।
 
 
2. आंशिक सूर्य ग्रहण : आंशिक ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी लाइन में नहीं होते और चंद्रमा सूर्य के एक हिस्से को ही ढंक पाता है।
 
3. वलयाकार सूर्य ग्रहण : सूर्य ग्रहण में जब चंद्रमा पृथ्वी से बहुत दूर होता है और इस दौरान पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। ऐसे में सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन या वलय के रूप में चमकता दिखाई देता है। कंगन आकार में बने सूर्य ग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

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