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दिमाग लगाने वाला काम सुबह करना ठीक या शाम को?

हमें फॉलो करें दिमाग लगाने वाला काम सुबह करना ठीक या शाम को?
, मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019 (11:42 IST)
- विलियम पार्क
 
परीक्षा की तैयारी के लिए सुबह उठकर पढ़ाई किया करो- भारत में छात्रों के लिए मां-बाप की यह सामान्य सलाह होती है। क्या यह सलाह समझदारी भरी है? क्या सुबह की पढ़ाई ही सबसे बेहतर है?
 
 
हमारा दिमाग एकदम सही, सुचारू रूप से चलने वाली मशीन नहीं है। दिन के अलग-अलग समय हमारी प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं होतीं। भोजन के बाद एकाग्रता घटती है, यह शायद आपने भी महसूस किया होगा। लेकिन हमारी स्नायविक प्रतिक्रियाओं में दोपहर के भोजन के बाद के आलस्य की अपेक्षा कहीं अधिक उतार-चढ़ाव आता है।
 
 
सवाल है कि हम उन संकेतों को कैसे पकड़ सकते हैं कि काम के दौरान हमारा दिमाग बदल रहा है?
 
अगर आपको पता चल जाता कि आपका प्रदर्शन कब चरम पर होगा तो क्या आप अपने दिन की योजना अलग बनाते? स्नायविक बदलावों पर ध्यान देकर क्या आप अपने दिमाग को एक बेहतर श्रमिक बना सकते हैं?

 
सुबह में तनाव वाले काम
अगर सुबह उठकर काम करने में आपको परेशानी होती है तो खुद को इसके लिए मजबूर मत करें। कुछ मशहूर बिजनेस लीडर्स और फ़िटनेस के प्रति अतिरिक्त सतर्क रहने वाले सेलिब्रिटीज़ की सलाह के बावजूद यह जरूरी नहीं कि सोने का पैटर्न बदल देने से आपका प्रदर्शन सुधर जाएगा।
 
 
फिर भी सुबह का समय दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जापानी श्रमिकों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि सुबह में हम तनाव से भरे कामों को बेहतर तरीके से करते हैं।
 
 
श्रमिकों को जगने के 2 घंटे बाद या 10 घंटे बाद एक तनाव परीक्षण से गुजरने का विकल्प दिया गया। मकसद यह देखना था कि वे काम की शुरुआत में ही इसे करना चाहते थे या दिन के अंत में दफ़्तर छोड़ते समय।

 
लंबे समय तनाव में रहना ख़तरनाक
अध्ययन से पता चला कि सुबह के परीक्षण के बाद कर्मचारियों में कार्टिसोल का स्तर बहुत बढ़ गया, लेकिन शाम के परीक्षण के बाद ऐसा नहीं हुआ। जापान की होक्काइडो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर युजिरो यामानाका कहते हैं, "कार्टिसोल हमारे शरीर की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह लड़ो-या-भागो अनुक्रिया में शामिल मुख्य हार्मोन है।"
 
 
कार्टिसोल रिलीज़ न हो तो शरीर की इस अनुक्रिया के अहम हिस्से नहीं हो पाते। यह हार्मोन रक्तचाप को नियंत्रित करता है और रक्त में सुगर के स्तर को भी बढ़ाता है। यह सुनिश्चित करता है कि अगर आप तनाव में हैं तो घबराहट महसूस न करें, बल्कि आपका दिमाग चौकन्ना रहे और कुछ करने के लिए आपमें ऊर्जा भी रहे।
 
 
यह हार्मोन किसी तनावपूर्ण घटना के बाद संतुलन बहाल करता है। तनाव से भरी सुबह के बाद आप फिर से सामान्य होने में सक्षम होंगे। अगर यह शाम में होता है तो यह आपके दिमाग में चलता रहेगा। दिन के दूसरे हिस्से में बार-बार तनावपूर्ण घटनाएं हों तो मोटापा, टाइप-2 मधुमेह और अवसाद जैसी लंबी चलने वाली बीमारियां हो सकती हैं।
 
 
यामानाका कहते हैं, "यदि आप शाम में तनाव से बचकर रहें तो सुबह तनाव से भरे काम बेहतर तरीके से कर सकते हैं।"
 
 
शाम में कैसे करें बेहतर प्रदर्शन
जल्दी शुरुआत में मदद करने के लिए हो सकता है कि सुबह में कार्टिसोल का स्तर अधिक हो। मैड्रिड की कंप्लूटेंस यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक क्रिस्टिना इस्क्रिबानो बैरेनो कहती हैं, "सभी लोग सुबह के समय अधिक प्रभावी नहीं होते।"
 
 
"जो जागे सो पावे, जो सोये सो खोवे" जैसी कहावतें बताती हैं कि हमारे जीवन में सुबह का क्या महत्व है। इसलिए जो लोग सुबह में काम करना पसंद करते हैं, वे फ़ायदे में रहते हैं।
 
 
सुबह या शाम का व्यक्ति होना कई चीजों से प्रभावित होता है। जैसे- उम्र, लिंग, सामाजिक और पर्यावरणीय कारक वगैरह। सुबह जगने के तुरंत बाद हमारा शरीर हमें दिन भर के तनाव के लिए तैयार कर देता है। इसलिए इसका अधिकतम लाभ उठाना ही बेहतर है।
 
 
कुछ कार्यों के लिए रफ़्तार और लय पाने में हमारे शरीर को कुछ समय लगता है। कुछ सामान्य कार्य, जैसे- मानसिक अंकगणित शरीर के तापमान के साथ जुड़ा होता है। तापमान जितना ज़्यादा होगा, प्रदर्शन उतना ही बेहतर होगा।
 
 
गणित का शारीरिक तापमान से कनेक्शन
आम तौर पर हमारा शरीर शाम से कुछ पहले सबसे ज़्यादा गर्म रहता है। इसलिए अच्छा हो कि सामान्य मानसिक काम उसी समय किए जाएं। रोजमर्रा की हमारी लय शरीर की आंतरिक घड़ी से नियंत्रित होती है। जल्दी या देर से उठने की हमारी पसंद का इस पैटर्न पर बहुत कम असर पड़ता है।
 
 
पोलैंड की वारसा यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक कोनराड जानकोव्स्की कहते हैं, "सुबह के लोगों में यह गर्मी थोड़ी जल्दी आ जाती है और शाम के लोगों में थोड़ी देर से आती है। लेकिन इसमें बहुत बड़ा अंतर नहीं होता- ज़्यादा से ज़्यादा कुछ घंटों का।"
 
 
शरीर गर्म हो तो सेरेब्रल कॉर्टेक्स में मेटाबॉलिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। यह संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को भी तेज़ करता है। जानकोव्स्की कहते हैं, "कुछ अध्ययनों से पता चला है कि मस्तिष्क का तापमान सिनैप्टिक ट्रांसमिशन से संबंधित है।"
 
 
"कृत्रिम रूप से शरीर का तापमान बढ़ाने से भी प्रदर्शन सुधरता है, लेकिन ऐसा सिर्फ़ 37 डिग्री सेल्सियस से थोड़ा ऊपर ही हो पाता है। उबलता हुआ मस्तिष्क सही से काम नहीं करता।"
 
 
जानकोव्स्की का कहना है कि नींद, सतर्कता, याददाश्त और यहां तक कि व्यायाम प्रदर्शन भी शरीर के तापमान की लय से जुड़े होते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि तापमान इन सभी प्रक्रियाओं को सीधे प्रभावित करता है। "शरीर की आंतरिक घड़ी तापमान और शरीर के अन्य कार्यों को प्रभावित करती है, इसलिए तापमान प्रोफाइल के आधार पर हम अपने प्रदर्शन का अनुमान लगा सकते हैं।"
 
 
उदाहरण के लिए, सुबह के समय जब शरीर का तापमान कम रहता है, नींद ज़्यादा आती है और सतर्कता कम होती है उस समय हादसों का ख़तरा ज़्यादा होता है।
 
 
समय पर सोएं
अधिक जटिल कार्यों के लिए दिन का कौन सा समय सबसे बेहतर है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप सुबह के व्यक्ति हैं या शाम के। सबसे महत्वपूर्ण है शेड्यूल से विचलित न होना। इसका सबसे अच्छा तरीका है कि आप समय से सोएं और समय से जगें।
 
 
जानकोव्स्की कहते हैं, "असल ज़िंदगी में जो लोग बहुत ही जटिल कार्य करते हैं उनको विचलन से अलग रहने की जरूरत होती है। वे उन घंटों में काम करते हैं जब दुनिया सोयी रहती है।"
 
 
"सुबह के लोगों के लिए यह पौ फटने से पहले का समय होगा, जब दूसरे लोग सोये रहते हैं। शाम के लोगों के लिए यह सबके सो जाने के बाद का समय होगा।"
 
 
प्रेजेंटेशन या किसी संघर्ष से निपटने जैसे तनावपूर्ण कार्यों को सुबह करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे बाद के काम के लिए खुद को समायोजित करने का अवसर मिल जाता है। शाम में उन कार्यों को करने में भी मदद मिलती है जिनमें ज़्यादा दिमाग लगाने की जरूरत होती है। यहां थोड़ा लचीलापन रखना भी जरूरी है।
 
 
निष्कर्ष यह कि दिन के कार्यों के लिए दिमाग को तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका आपके बिस्तर पर जाने और वहां से उठने के समय से निर्धारित होता है।
 
 

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