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हिमाचल: बारिश ने हजारों से छीने आशियाने, कुल्लू में हर तरफ तबाही की कहानी-ग्राउंड रिपोर्ट

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himachal rain
दीपक शर्मा, बीबीसी संवाददाता
Himachal Pradesh rain : भारी बारिश के कारण तबाही का सामना कर रहे हिमाचल प्रदेश की सरकार ने शुक्रवार को पूरे राज्य को "प्राकृतिक आपदा प्रभावित इलाक़ा" घोषित कर दिया है। सरकार का कहना है कि इस साल मॉनसून के दौरान भारी बारिश के कारण जानोमाल की भारी तबाही हुई है, कई लोगों की जानें गई हैं, साथ ही सार्वजनिक और निजी संपत्ति को भी बड़ा नुक़सान हुआ है।
 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक बारिश और बाढ़ से जुड़े हादसों में कम से कम 217 लोगों की मौत हुई है। 11 हज़ार से ज़्यादा घरों और करोड़ों रुपये की संपत्ति को नुक़सान हुआ है। बड़ी आबादी अब भी दिक्कतों से जूझ रही है।
 
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, "पूरा राज्य बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन जैसी घटनाओं से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हज़ारों घर या तो तबाह हो गए हैं या फिर रहने लायक नहीं रह गए हैं। बारिश और बाढ़ के कारण हुई तबाही को देखते हुए सरकार ने पूरे राज्य को प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्र घोषित करने का फ़ैसला किया है।"
 
10,000 करोड़ का नुक़सान हुआ- सीएम
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि बारिश के कारण प्रदेश में दस हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुक़सान हुआ है।
 
उन्होंने कहा, "अगर आने वाले समय में बारिश थम गई तो राहत कार्य में तेज़ी आएगी और संभव हुआ तो हम सब्ज़ियां और सेब बाज़ार तक पहुंचाएंगे।"
 
मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने इस विषय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी।
 
सीएम सुखविंदर सिंह ने बताया "उन्होंने दिशानिर्देश भी दिए थे जिससे काम में तेज़ी आई है। हमें केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री से विशेष पैकेज की उम्मीद है, देखना है पैसा कब पैसा मिलेगा। जल्दी पैसा मिलेगा तो हम और तेज़ी से काम करेंगे। हमारा पूरा ध्यान प्राकृतिक आपदा से लड़ने पर है। अभी तो हम अपने संसाधनों से कम कर रहे हैं।"
 
बीते कुछ दिनों से हिमाचल प्रदेश भारी बारिश और बाढ़ से हुई तबाही का सामना कर रहा है। यहां के शिमला में भूस्खलन की तीन अलग-अलग घटनाओं में अब तक 22 मौतें हो चुकी हैं।
 
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि प्रदेश सरकार को राजनीति में नहीं उलझना चाहिए बल्कि आपदा के वक्त राहत कार्य पर ध्यान देना चाहिए। प्रदेश में फिलहाल कांग्रेस की सरकार है।
 
जयराम ठाकुर ने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार हिमाचल प्रदेश के लिए ज़रूरी मदद दे रही है। उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार की ओर से प्रदेश के लिए पहले 364 करोड़ और फिर गृह मंत्रालय की तरफ से 190 करोड़ की आर्थिक मदद की घोषणा की गई है।"
 
वहीं आपदा से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 11 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की है और राजस्थान ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी 15 करोड़ रुपये की अर्थिक मदद की घोषणा की है।
 
शिमला शिव मंदिर हादसा: अब तक मिले 16 शव
14 अगस्त को हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले में शिव मंदिर बावड़ी के पास भूस्खलन हुआ। शिमला में मौजूद बीबीसी के सहयोगी पत्रकार पंकज शर्मा ने बताया कि हादसे में क़रीब 21 लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई गई थी। अब तक यहां 16 शव मिले हैं।
 
अभी भी चार से पांच और लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है। शनिवार को हादसे के छठे दिन भी उनकी तलाश का काम जारी है।
 
इस घटनास्थल पर हो रहे सर्च ऑपरेशन में भारतीय सेना, एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़, पुलिस, होमगार्ड के साथ-साथ बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जुटे हुए है।
 
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सबसे बड़ी चुनौती
पंकज शर्मा बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश की इस जगह पर सबसे बड़ी चुनौती यहां बड़ी संख्या में मौजूद देवदार के पेड़ और मलबा है। रेलवे ट्रैक के भूस्खलन की चपेट में आने से भी यहां सर्च ऑपरेशन में भारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है।
 
यहां सबसे बड़ी मुश्किल पहाड़ी का ढलानदार होना भी है, जिसकी वजह से यहां बने नाले में जेसीबी मशीन और दूसरी मशीनरी ले जाना आसान नहीं है।
 
भूस्खलन से बने नाले में टनों के हिसाब के इकट्‌ठा हुआ मलबे के कारण प्रशासन और स्थानीय जनता को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
 
कुल्लू पर बारिश की मार
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू को पर्यटकों की पसंदीदा जगह के तौर पर जाना जाता है। बीते दिनों प्रदेश में जो तबाही हुई है उसकी सबसे ज़्यादा मार कुल्लू ज़िले पर पड़ी है। यहां के लोगों का कहना है कि इस तरह के मंज़र के बारे में उन्होंने अब तक केवल सुना ही था।
 
क़रीब छह लाख की आबादी वाले इस इलाक़े में लगभग हर शख़्स के पास बर्बादी की अपनी कहानी है, किसी का खेत बह गया तो किसी का घर बारिश लील गई।
 
दो बार घर टूट गया- पूनम देवी
मणिकर्ण की पूनम देवी ने अभी कुछ साल पहले ही कुल्लू के गांधीनगर इलाक़े में घर बनवाया था। वो कहती हैं कि नौ जुलाई को नदी में उफ़ान देखकर वो लोग डर गए, जिसके बाद उनके परिवार के पांच लोग अभी घर से निकले ही थे कि उनका आशियाना ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
 
पूनम राष्ट्रीय जल विद्युत निगम में अस्थायी कर्मचारी हैं और उनके पति एक दुकान में सेल्समैन का काम करते हैं।
 
इससे पहले 2015 में मणिकर्ण में उनका घर पहाड़ से खिसकती चट्टानों की भेंट चढ़ गया था।
 
पूनम कहती हैं, "थोड़ी-थोड़ी कमाई जोड़कर हमने बड़ी मुश्किल से ये घर बनाया था। इसमें हमने अपनी सारी कमाई लगाई दी जो देखते ही देखते चली गई। पता नहीं चला। समझ नहीं आता कैसे इस तबाही को पकड़ें?"
 
पूनम नहीं जानतीं कि वो अपना तीसरा घर अब कभी बना भी पाएंगी या नहीं। हालांकि उनका परिवार सुरक्षित है और इसलिए वो खुद को ख़ुशनसीब मान रही हैं।
 
शादी के दो हफ़्ते बाद मातम
48 साल के बुद्धि की दुनिया एक दिन में बदल गई। 14 अगस्त की रात वो सपरिवार अपने छोटे भाई के घर पारंपरिक उत्सव मनाने आए थे।
 
उस रात उस दोमंज़िला घर में लगभग 18 लोग सोए थे। सुबह चार बजे के आसपास अचानक ज़मीन खिसकी और निचली मंज़िल में सोए सात लोगों को संभलने का कोई मौक़ा तक नहीं मिला।
 
मरने वालों में उनकी भांजे, भतीजी और अन्य रिश्तेदारों के अलावा 19 साल की बहू भी थी जिसे वो अभी दो हफ़्ते पहले ही ब्याहकर लाए थे।
 
हादसे के बाद बेटा सदमे में है और बेसुध है। इलाक़े के हालात ऐसे हैं उसे अस्पताल तक पहुंचाने का कोई ज़रिया नहीं है।
 
भर्राई आवाज़ में बुद्धि सिंह कहते हैं, "ये हमारी आत्मा ही जानती है जो इस वक्त हमारे परिवार पर गुज़री है। जो बच्चियां गईं, उनके बदले मैं ही जाता तो अच्छा था।"
 
ऐसा नुक़सान पहले नहीं होता था- झाबे राम
राज्य में जुलाई के बाद से अब तक कम से कम 217 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
 
राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में सेब का मौसम सिर पर है लेकिन फसल को बाज़ार तक पहुंचाने वाली सड़कें बंद हैं।
 
इलाक़े के बड़े-बुज़ुर्गों का कहना है कि उन्होंने भी सेब की फसल की ऐसी बर्बादी पहले नहीं देखी है।
 
कुल्लू और मंडी की सीमा पर बसे पिपसु गांव के 75 साल के किसान झाबे राम बताते हैं, "नदी तो पहले भी आती थी लेकिन ऐसा नुक़सान पहले नहीं होता था। इस बार हालात बहुत खराब हैं।"
 
सेब की फसल बुरी तरह प्रभावित
राज्य की जीडीपी में सेब की बाग़वानी से होने वाली आमदनी का हिस्सा लगभग 5 फ़ीसदी है। पूरे देश में उगने वाले कुल सेब का 26 फ़ीसदी हिमाचल प्रदेश से ही आता है।
 
लेकिन इस बार बारिश और भूस्खलन के कारण बंद पड़ी सड़कों के कारण सेब की फसल को को मंडियों में पहुंचाना मुश्किल साबित हो रहा है।
 
स्थानीय सेब उत्पादक वरुण सूद की राय में सेब की फसल इस बार अच्छी नहीं रहेगी। उनके मुताबिक़ इस बार उनके बगीचों में पिछले साल के मुक़ाबले सिर्फ 30 फीसदी ही फसल होने का अनुमान है।
 
वरुण बताते हैं, "लंबे मॉनसून की वजह से सेबों में फंगस की बीमारियां लग रही हैं जिसके चलते सेब की क्वालिटी पहले जैसी तैयार नहीं हो पाई है।"
 
वरुण के मुताबिक़ राज्य सरकार सेब के बाग़वानी करने वालों के लिए अपने स्तर पर काम कर रही है लेकिन केंद्र सरकार को भी पैकेज घोषित करना चाहिए।
 
वो कहते हैं, "ख़राब सड़कों के चलते किसानों को बड़ी गाड़ियों के बजाए छोटी गाड़ियों में सामान मंडियों तक भेजना पड़ रहा है। इसके चलते उनका ख़र्च बढ़ रहा है। किसानों को इसकी वजह से इस साल माल ढुलाई में सब्सिडी मिलनी चाहिए।"
 
'कारोबार चौपट है'
कुल्लू इलाक़े में सब्ज़ी का कारोबार करने वाले करन वर्मा बताते हैं, "सड़कें बंद होने से और बारिश के कारण कई दिनों में कारोबार लगभग चौपट है। बड़े कारोबारी तो फिर भी झेल जाएंगे लेकिन किसानों की तो कई महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल रही है।"
 
एक परेशानी ये भी है कि सड़कें बंद होने के कारण टैंकरों की सप्लाई में रुकावट आई है और कुल्लू प्रशासन को पेट्रोल और डीज़ल की भी राशनिंग करनी पड़ी है। प्रशासन छोटे चौपहिया वाहनों को 10 लीटर से ज़्यादा तेल भरवाने की इजाज़त नहीं है।
 
कुल्लू के स्थानीय कारोबारी वासु सोनी कहते हैं, "मैं दो किलोमीटर दूर अपने घर से पेट्रोल भरवाने निकला था और अब तक चार पंपों के चक्कर काट चुका हूं। पेट्रोल पंपों पर भी लंबी कतारें हैं। अगर सारा दिन तेल ही भरवाते रहेंगे तो काम कब करेंगे?"
 
सरकारी कर्मचारियों की दिक्कतें
कुल्लू के पास बजौरा में पिछले पांच दिनों से सड़क पर फंसे ट्रक चालक प्रदीप कुमार का दावा था कि पिछली रात गाड़ी हटाने को लेकर पुलिसवालों के साथ उनकी तीखी नोंकझोंक हुई थी।
 
रेस्क्यू से लेकर सड़क खुलवाने और सड़क पर ट्रैफिक बहाल करने से लेकर प्रोटोकॉल में मुस्तैदी दिखाने की तमाम चुनौतियां पुलिसवालों के सामने भी है।
 
कुल्लू में बाढ़ के दौरान ड्यूटी दे रहे एक पुलिसकर्मी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, "ख़राब मौसम में एक दफा मां से चार दिन तक मेरी बात नहीं हो पाई। फ़ोन नहीं चल रहे थे। इस दौरान वो एक पल के लिए नहीं सो पाईं। किसी तरह वायरलैस ने मैंने उन तक सूचना पहुंचाई तब जाकर उनकी जान में जान आई।"
 
पहाड़ों का काटना, खुदाई बड़ा कारण
कई सालों के इंतज़ार के बाद इस साल मई में मंडी से कुल्लू को जोड़ने वाली सड़क के बीच की पांच अत्याधुनिक सुरंगों को खोला गया था।
 
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने तब इनमें से एक सुरंग का वीडियो रीट्वीट कर सोशल मीडिया पर शेयर किया था। उन्होंने बताया कि कैसे लोग इस सड़क का मज़ा ले रहे हैं।
 
लेकिन आज कई जगहों पर ये पहचान पाना भी मुश्किल है कि वहां सड़क थी तो कहां थी।
 
देश की सुरक्षा के नज़रिए से अहम चंडीगढ़-मनाली सड़क जो आगे लेह में चीन की सीमा से जाकर मिलती है उसके बारे में ये सवाल उठ रहा है कि ऐसी अहम सड़क का बुरा हाल क्यों है?
 
कुल्लू में इन दिनों गांव-देहात के लोग भी आपको इसकी वजह गिनाते हैं, "पहाड़ खड़े काटे गए।"
 
हिमालय के इलाक़ों में पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे समाजसेवी संगठनों के समूह हिमालय नीति अभियान के संजोयक गुमान सिंह मानते हैं कि तिब्बत में चीन की देखादेखी यहां भी सड़कों के निर्माण पर ज़ोर दिया लेकिन इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया कि तिब्बती पठार की ज़मीन पक्की है जबकि हिमालय अभी विकसित होते पहाड़ हैं।
 
उन्होंने बताया, "हम लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि पहाड़ों पर सड़कें ‘कट एंड फिल’ तरीक़े से बनाई जाएं। यानी पहले रिटेनिंग वॉल दी जाए, फिर उसे मलबे से भरा जाए और उसके बाद पहाड़ों को 45 डिग्री से ज़्यादा ढलान में ना काटा जाए। लेकिन उनका पालन कम ही होता है।"
 
कुल्लू में हुई तबाही का जायज़ा लेने के लिए नितिन गडकरी जुलाई में यहां दौरे पर आए थे। उस वक्त उन्होंने माना कि राजमार्ग जिन पहाड़ों पर बना है उसकी चट्टानें कच्ची हैं।
 
उन्होंने कहा था कि देश के साथ विदेश के भी तकनीकी जानकारों की सलाह के बाद समस्या के हल के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जाएगी।

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