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30 साल से लेता है साँप के ज़हर का इंजेक्शन फिर भी ज़िंदा है

Webdunia
बुधवार, 22 मार्च 2017 (11:52 IST)
- रेडाक्शियोन (बीबीसी मुंडो)
 
"मैंने पूरी ज़िंदगी साँपों के बारे में पढ़ाई की है। जब मैं छह साल का था तब मैंने साँप पाला था।" स्टीव लुडविन बीबीसी से बातचीत में बताते हैं, "मैं बचपन में मियामी गया था जहाँ मैने बिल हास्ट को देखा, वो साँप का ज़हर अपने शरीर में इंजेक्ट किया करते थे। हास्ट मानते थे कि ज़हर से शरीर को फ़ायदा होता है। मुझे ये विचार पसंद आया। 17 साल की उम्र में मैंने भी वही किया।"
सांप के ज़हर का लेते हैं इंजेक्शन : पिछले 30 सालों से वे शहर में साँप का ज़हर इंजेक्ट कर रहे हैं। स्टीव के पास कई साँप हैं जिनसे वे ज़हर निकालते हैं। वे कहते हैं कि ये दर्दनाक प्रक्रिया है और साँप को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। 
 
जिस ज़हर को उन्होंने बीबीसी के सामने ख़ून में इंजेक्ट किया वो हेमोटॉक्सिन है जो रेड बल्ड सेल को नष्ट कर देते हैं और अंगो को काफ़ी नुकसान पहुँचा सकते हैं। स्टीव पहले ज़हर को त्वचा पर रखते हैं और फिर सुई के ज़रिए शरीर में डालते हैं। बीबीसी के एक टीवी शो में शामिल रहे डॉक्टर गेब्रिइल वेस्टन के मुताबिक स्टीव खुशकिस्मत हैं कि वो ज़िंदा हैं।
डॉक्टर गेब्रिइल वेस्टन अपने ख़ून का नमूना लेकर बताते हैं कि जब ख़ून में हिमोटॉक्सिन मिलता है तो क्या होता है। वे बताते हैं, कुछ ही सैकेंड में ख़ून एक तरह के जैल या थक्कों में बदल जाता है। अगर ये ख़ून आपकी धमनियों में हो तो ये बहना बंद कर देगा और आप मर जाएँगे।
 
लेकिन स्टीव कैसे ज़िंदा हैं?
 
डॉक्टर गेब्रिइल वेस्टन बताते हैं, "जैसे दवाइयाँ हमारे शरीर पर काम करती हैं ये कुछ वैसा ही है। दवाइयाँ हमारे शरीर में कम स्तर पर टॉक्सिन जमा करती हैं। ये मात्रा इतनी ज़्यादा नहीं होती कि शरीर को नुकसान पहुँचाए ताकि हमारा शरीर एंटीबॉडी के ज़रिए इनसे लड़ना सीख ले। एंटीबॉडी टॉक्सिन या वायरस से लड़ती हैं।"
स्टीव ने शुरु में ज़हर का छोटा डोज़ लेना शुरु किया था। उसके शरीर ने अलग अलग तरह के ज़हरों को पहचानना सीख लिया और इसके जवाब में अलग-अलग एंडीबॉडी बनाने लगा। वैसे लोगों को साँप के ज़हर से बचाने के लिए दवाई बनाने पर शोध चल रहा है।

साँप के काटने पर एंटीवेनम नाम की एक तरह की दवाई उपलब्ध है लेकिन दुनिया भर में इसकी बहुत किल्लत है। डॉक्टर वेस्टन कहते हैं कि ये दवा घोड़े के खून से लिए गए एंटीबॉडी से बनती है इसलिए मनुष्यों में इस्तेमाल के अपने ख़तरे हैं।
 
इसलिए वैज्ञानिक मनुष्यों के ख़ून से बनी एंटीबॉडी बनाने चाहते हैं जिसमें स्टीव का ख़ून काम आ रहा है। स्टीव कहते हैं, "अब मैं ख़ुशी ख़ुशी मर सकता हूँ कि मैं मैने कुछ सकारात्मक किया।"
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