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ये मौका आसमान में टूटते तारों की आतिशबाज़ी देखने का है

Webdunia
गुरुवार, 10 अगस्त 2017 (11:19 IST)
- निमिष कपूर (वरिष्ठ वैज्ञानिक)
अब से कुछ ही समय के बाद हम इस मौसम के श्रेष्ठ और रंगीन उल्कापात- पेर्सेइड मेटेओर शावर का आनंद लेने जा रहे हैं। खगोल वैज्ञानिक गणनाओं के आधार पर 11-12 अगस्त 2017 और 12-13 अगस्त 2017 की मध्यरात्रि से भोर के झुटपुटे तक पेर्सेइड उल्कापात के विहंगम दृश्य का अवलोकन किया जा सकता है।
 
आसमानी आतिशबाज़ी की यह घटना 12-13 अगस्त की मध्यरात्रि से भोर तक अपने चरम पर होगी। उल्कापात एक खगोलीय घटना है जिसमें रात्रि आकाश में कई उल्काएं एक बिंदु से निकलती नज़र आती हैं।
 
पृथ्वी की सतह से...
ये उल्काएं या मेटिअरॉइट (सामान्य भाषा में टूटते तारे) धूमकेतु या पुच्छल तारों के पीछे घिसटते धूल के कण, पत्थर आदि होते हैं जो पृथ्वी के वातावरण में बहुत तीव्र गति से प्रवेश करते हैं और हमें आसमानी आतिशबाज़ी का नज़ारा दिखाई देता है। अधिकांश उल्काएँ आकार में धूल के कण से भी छोटी होती हैं जो विघटित हो जाती हैं और सामान्यतः पृथ्वी की सतह से नहीं टकरातीं।
 
यदि उल्कापात के दौरान उल्काओं का कुछ अंश वायुमंडल में जलने से बच जाता है और पृथ्वी तक पहुँचता है तो उसे उल्कापिंड या मेटिअरॉइट कहते हैं। हर वर्ष 17 जुलाई से 24 अगस्त के दौरान हमारी पृथ्वी स्विफ़्ट टटल धूमकेतु के पास से गुज़रती है।
 
सूर्य की परिक्रमा
स्विफ़्ट टटल धूमकेतु ही पेर्सेइड उल्कापात या पेर्सेइड मेटेओर शावर का सूत्रधार है। धूमकेतु पत्थर, धूल, बर्फ़ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे खण्ड जो ग्रहों के समान सूर्य की परिक्रमा करते हैं। स्विफ्ट टटल धूमकेतु का मलबा इसकी कक्षा में बिखरा रहता है जो हमें स्पष्ट रूप से अगस्त के पहले हफ्ते के बाद पृथ्वी से दिखाई देता है।
 
पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुज़रा बुध
स्विफ्ट टटल धूमकेतु के छोटे अंश तेज़ी से घूमते पेर्सेइड उल्का के रूप में पृथ्वी के ऊपरी वातावरण में 2 लाख, 10 हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की गति से घूमते हैं जो रात्रि आकाश में तीव्र चमक के साथ बौछार करते नज़र आते हैं।
 
अंडाकार कक्षा में परिक्रमा
रोशनी वाले स्थान से दूर रात्रि आकाश में सैंकड़ों उल्काएँ नज़र आती हैं जो पेर्सेइड उल्कापात को यादगार बना देती हैं। स्विफ़्ट टटल धूमकेतु एक विकेन्द्री (अव्यवस्थित केन्द्रक के साथ) अंडाकार कक्षा में परिक्रमा करता है जो लगभग 26 किलोमीटर चौड़ी होती है।
 
जब यह सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तो यह प्लूटो की कक्षा के बाहर होता है और जब सूर्य के बहुत नज़दीक होता है तो पृथ्वी की कक्षा के अन्दर होता है। यह 133 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
 
सूर्य के नज़दीक
अपने परिक्रमा पथ में जब यह धूमकेतु सूर्य के नज़दीक आता है तो सूर्य की गर्मी से इस पर जमी बर्फ़ पिघल जाती है जिसकी वजह से कुछ नया पदार्थ इसके परिक्रमा पथ में शामिल होता जाता है। स्विफ़्ट टटल धूमकेतु सूर्य के अति निकट बिंदु यानी 'पेरीहेलिओन' पर दिसम्बर 1992 में पहुंचा था। इस स्थान पर अब यह जुलाई 2126 में पहुंचेगा।
 
पेर्सेइड उल्कापात उत्तरी गोलार्ध में देखा जा सकता है जहाँ यह आसमान के उत्तरी-पूर्वी भाग में नज़र आता है जिसे आखों से देखा जा सकता है। इसे देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं हैं।
 
प्रकाश वर्ष की दूरी
पेर्सेइड उल्कापात की बौछार या प्रकाश बिंदु पेर्सेयस के दोहरे तारामंडल (पेर्सेयस डबल क्लस्टर) की पृष्ठभूमि में नज़र आता है और पेर्सेयस के नाम पर ही पेर्सेइड उल्कापात का नामकरण किया गया है। हालाँकि यह महज़ एक संयोग है क्योंकि पेर्सेयस तारामंडल हमसे कई प्रकाश वर्ष की दूरी पर है जबकि पेर्सेइड उल्का पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किलोमीटर दूर प्रकाशित होते हैं।
 
पेर्सेइड उल्कापात से जुड़ी एक प्राचीन यूनानी किवदंती है कि जब ईश्वर ज़ीउस ने मरणासन्न युवती डेनी से विवाह रचाया उसी समय पेर्सेइड उल्कापात के रूप में स्वर्ण वर्षा हुई और पेर्सेयस नक्षत्र मंडल का जन्म हुआ। तभी से पेर्सेइड उल्कापात पेर्सेयस नक्षत्र मंडल की पृष्ठभूमि में ही होता आ रहा है।
 
गुरुत्वाकर्षण प्रभाव
पेर्सेइड उल्कापात से जुड़ी एक प्राचीन यूनानी किवदंती है कि जब ईश्वर ज़ीउस ने मरणासन्न युवती डेनी से विवाह रचाया उसी समय पेर्सेइड उल्कापात के रूप में स्वर्ण वर्षा हुई और पेर्सेयस नक्षत्र मंडल का जन्म हुआ। तभी से पेर्सेइड उल्कापात पेर्सेयस नक्षत्र मंडल की पृष्ठभूमि में ही होता आ रहा है।
 
गुरुत्वाकर्षण प्रभाव
स्विफ़्ट टटल धूमकेतु हर समय सूर्य की परिक्रमा करता है। इसके परिक्रमा पथ में धूमकेतु के पीछे घिसटते धूल के कण, पत्थर आदि का मलबा ही उल्का प्रवाह या मेटिअर स्ट्रीम कहलाता है। समय के साथ विशाल ग्रहों, खासकर ब्रहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण इन धूल कणों के परिक्रमा पथ में कुछ बदलाव आ जाता है। इसी कारण से पृथ्वी से इसकी दूरी बदलती रहती है।
 
यदि इन परिवर्तनों से धूमकेतु के धूलकणों का परिक्रमा पथ पृथ्वी के निकट आ जाता है तो पेर्सेइड उल्कापात का नज़ारा सामान्य से कहीं अधिक विहंगम हो जाता है। वर्ष 2016 में ब्रहस्पति के प्रभाव के चलते पेर्सेइड उल्का प्रवाह की दर लगभग दोगुनी हो गई थी। इन खगोलीय गणनाओं के आधार पर ही उल्का प्रवाह के चरम स्तर के दिन व समय का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
 
उल्का प्रवाह की दर
एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी ऑफ दि करीबियन की रिपोर्ट के अनुसार ला पिटाहाया, कबो रोजो, पुएर्टो रिको में पेर्सेइड उल्का की भव्य बरसात 12 अगस्त 2016 को भोर से पूर्व हुई थी। यहाँ स्थानीय समय प्रातः 3:40 से 4 बजे के बीच 20 मिनट में 150 उल्काएं देखी गई थीं। लियोनिड उल्कापात जो कि नवम्बर में होता है, पेर्सेइड उल्कापात के श्रेष्ठ प्रदर्शन से भी 10 गुना भव्य होता है।
 
अभी तक के उल्का इतिहास में लियोनिड उल्कापात सबसे बड़े उल्कापात के रूप में दर्ज है जो कि 12 नवम्बर 1833 में हुआ था और इसमें प्रति सेकंड 20 से 30 उल्काओं की बौछार हुई थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस वर्ष पेर्सेइड उल्कापात में 150 उल्का प्रति घंटे नज़र आयेंगी जो सामान्य से अधिक हैं परन्तु उल्काओं की यह बढ़ी संख्या चन्द्रमा की चमक में छुप जाएगी।
 
चंद्रमा की चमक
इस दौरान चन्द्रमा चमकदार और उभरा हुआ दिखाई देगा यानी पेर्सेइड उल्कापात का नज़ारा कुछ कमज़ोर पड़ जाएगा, जैसा कि नासा के उल्का विशेषज्ञ बिल कूक का कहना है। खगोलविद उम्मीद जता रहे हैं कि पेर्सेइड उल्कापात की चमक चन्द्रमा की रोशनी से अधिक नहीं दबेगी और फिर देखने वालों का उत्साह इसकी चमक को बरकरार रखेगा।
 
पेर्सेइड उल्कापात की समाप्ति पर और सुबह के झुटपुटे पर पूर्व की ओर चमकीला ग्रह शुक्र देखा जा सकता है, जो कि सूर्य और चन्द्रमा के बाद तीसरा सबसे चमकदार ग्रह है। तो आइये पेर्सेइड उल्कापात की दुर्लभ घटना का गवाह बनने की तैयारी करें।
 
(लेखक भारत सरकार के साइंस फ़िल्म्स डिविज़न के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।)
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