पेट से जुड़ा है दिमाग़ी सेहत का राज़

शनिवार, 9 मार्च 2019 (11:10 IST)
- डेविड रॉबसन
 
कहते हैं कि दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है। पर, अगर हम ये कहें कि हमारे ज़हन का रास्ता भी पेट से होकर है, तो आप मानेंगे? न मानने वाले तो इस बात से एक सदी से इनकार करते आए थे और अब मान रहे हैं। हमारे ज़हनी सुकून, दिमाग़ी सेहत का हमारे पेट से गहरा वास्ता है. डिप्रेशन की जड़ तलाशने वाले अगर पेट खंगालें, तो शायद जवाब वहां से मिले।
 
 
ब्रिटिश मनोचिकित्सक डॉक्टर जॉर्ज पोर्टर फिलिप्स ने पिछली सदी की शुरुआत में ऐसा ही तजुर्बा किया था। एक दिन डॉक्टर फ़िलिप्स लंदन के बदनाम (बदनाम इसलिए क्योंकि यहां मनोरोगी रखे जाते थे, सो ये पागलख़ाने के नाम से कुख्यात हो गया) अस्पताल बेथलहम रॉयल अस्पताल में दौरे पर थे।
 
 
डॉक्टर फ़िलिप्स ने महसूस किया कि दिमाग़ी ख़लल के शिकार उनके मरीज़ों को अक्सर क़ब्ज़, पेट में जलन और खाना न पचने जैसी शिकायत रहा करती थी। उनके नाख़ून बड़े नाज़ुक होते थे। बालों में चमक नहीं होती थी। चेहरा भी ज़र्द रहता था।
 
 
ऐसे मरीज़ों को देखकर अक्सर मान लिया जाता है कि चूंकि इन लोगों को ज़हनी सुकून नहीं है, सो उनका हुलिया इसी वजह से बिगड़ा हुआ है। पर, डॉक्टर फ़िलिप्स के दिमाग़ में सवाल आया कि कहीं इन मरीज़ों की पेट की बीमारी तो, उनको डिप्रेशन होने की वजह नहीं। क्या उनकी पेट की बीमारी का इलाज कर के उनकी दिमाग़ी परेशानी दूर की जा सकती है?
 
 
पेट का दिमाग़ी सेहत से ताल्लुक़
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए डॉक्टर फ़िलिप्स ने 18 मरीज़ों पर एक प्रयोग किया। इसके तहत उनके खाने से मछली को छोड़कर हर तरह का मांस हटा दिया गया। उन्हें फ़िर के नाम का फर्मेंटेड दूध दिया गया। ऐसे दूध में लैक्टोबैसिलस कीटाणु होते हैं, जो पेट के लिए फ़ायदेमंद माने जाते हैं। कहते हैं कि लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया खाना पचाने में सहायक होते हैं।
 
 
डॉक्टर फ़िलिप्स का प्रयोग कामयाब रहा। जिन 18 मरीज़ों पर ये तजुर्बा किया गया था, उनमें से 11 पूरी तरह से ठीक हो गए। दो और मरीज़ों की दिमाग़ी सेहत में काफ़ी सुधार देखा गया। हमारे पेट का हमारी दिमाग़ी सेहत से गहरा ताल्लुक़ बताने वाला ये पहला तजुर्बा था।
 
 
आतों में आबाद अरबों कीटाणु हमारी सेहत से गहराई से जुड़े हैं। लेकिन, इनका हमारी दिमाग़ी सेहत से भी वास्ता है, इस बात को मानने में दुनिया ने एक सदी गुज़ार दी। डॉक्टर फ़िलिप्स के तजुर्बे को बाद की पीढ़ी ने नहीं माना। अब आंतों के कीटाणुओं पर रिसर्च करने वाले तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारी दिमाग़ी सेहत का आंतों के बैक्टीरिया से सीधा ताल्लुक़ है।
 
 
रिसर्च क्या कहते हैं?
कनाडा की मैक्मास्टर यूनिवर्सिटी की जेन एलिसन फोस्टर कहती हैं कि, "इस पर कोई वाद-विवाद नहीं है। पेट के बैक्टीरिया हमारे दिमाग़ पर गहरा असर डालते हैं। इसका मतलब ये है कि हम पेट का इलाज कर के अपने दिमाग़ का इलाज कर सकते हैं। इस बारे में नई दवाओं के विकास की अपार संभावनाएं दिख रही हैं।"
 
 
जेन फोस्टर कहती हैं कि दिमाग़ी परेशानी के लिए कई कारण ज़िम्मेदार होते हैं। पेट में दिक़्क़त होना उनमें से एक वजह हो सकती है। जिन लोगों के पेट में कोई न कोई परेशानी रहती है, उनका इलाज हो तो उनके दिमाग़ को भी राहत महसूस होगी।
 
 
इस बारे में सबसे चर्चित रिसर्च जापान की क्यूशू यूनिवर्सिटी में 2004 में हुआ था। यहां पहले कुछ ऐसे चूहे पाले गए, जिनमें एक भी बैक्टीरिया नहीं थे। इन चूहों में कॉर्टिकोस्टेरोन और एसीटीएच नाम के हारमोन में बहुत उतार-चढ़ाव देखा गया। ऐसा आम तौर पर तब होता है, जब तनाव होता है। इसका ये मतलब निकाला गया कि दूसरे चूहों के पेट में मौजूद बैक्टीरिया उनकी दिमाग़ी सेहत को संतुलित बनाए हुए थे।
 
 
इन चूहों के बैक्टीरिया को निकालकर उन्हें कीटाणु मुक्त चूहों में डाला गया। अब ज़्यादा तनाव में दिखने वाले कीटाणु रहित चूहों में तनाव कम होता देखा गया। रिसर्च से ये भी पता चला है कि चूहों से इंसानों या फिर इंसानों से चूहों में अगर बैक्टीरिया का ट्रांसप्लांट हो, तो उनका असर दिमाग़ी सेहत पर भी पड़ता है।
 
 
चूहों को भी डिप्रेशन हो गया
चीन की चोंगक़िंग यूनिवर्सिटी में डिप्रेशन के शिकार मरीज़ों के पेट से कीटाणु निकालकर उन्हें चूहों के पेट में डाला गया। इसके बाद उन चूहों का बर्ताव अजीब हो गया। वो पलायनवादी हो गए। जब उन्हें तैराक़ी के लिए मजबूर किया गया, तो वो अक्सर भागने की कोशिश करते। इसी तरह जब उन्हें पिंजरे में रखा जाता, तो वो एक कोने में छुपकर बैठ जाते थे।
 
 
इसका मतलब ये निकला कि डिप्रेशन के शिकार इंसानों के बैक्टीरिया जब इन चूहों के पेट में गए, तो उन पर भी असर डाला। चूहों को भी डिप्रेशन हो गया। ये रिसर्च पेपर लिखने वाले अमरीकी वैज्ञानिक जुलियो लिसिनियो कहते हैं कि, "आप पेट के बैक्टीरिया को बदलते हैं, तो बर्ताव भी बदल जाता है।"
 
 
इन प्रयोगों के बाद इंसानों के पेट के बैक्टीरिया के दिमाग़ी सेहत से ताल्लुक़ पर और भी रिसर्च हुई हैं। ये तो साफ़ है कि पेट के कीटाणु हमारे दिमाग़ पर असर डालते हैं। मगर किसी ख़ास नस्ल के बैक्टीरिया ऐसा करते हों, ये बात साफ़ नहीं है।

 
आंतों और दिमाग़ के बीच संवाद
कीटाणुओं की कई नस्लें आंतों की दीवारों की हिफ़ाज़त करती हैं। इससे आंतों में मौजूद तत्व ख़ून में नहीं मिल पाते। वरना, पेट ख़राब होने, जलन और पेट में संक्रमण की शिकायत हो सकती है।
 
 
पर, माना जाता है कि आंतों की दीवारों की रक्षा करने वाले ये कीटाणु मूड ख़राब होने और आलस की वजह बन सकते हैं। ये हालात लंबे वक़्त तक रहने पर बीमारी डिप्रेशन में तब्दील हो जाती है। आंत में मौजूद बैक्टीरिया हमें डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे हारमोन पचाने में भी मदद करते हैं।
 
 
हमारी आंतों का सीधा ताल्लुक़ दिमाग़ से होता है। वेगन नाम की तंत्रिका के ज़रिए दिमाग़, आंतों के काम-काज पर कंट्रोल रखता है। वेगस तंत्रिका के ज़रिए आंतों और दिमाग़ के बीच संवाद होता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके ज़रिए अगर दिमाग़ कोई संदेश आंतों को दे सकता है, तो आंतों के हालात का असर इससे होते हुए दिमाग़ तक भी पहुंचता है। जेन फ़ोस्टर कहती हैं कि आंतों के बैक्टीरिया के दिमाग़ से संबंध पर लगातार रिसर्च हो रही है। उम्मीद है कि डिप्रेशन को हराने का ज़रिए आंतों के बैक्टीरिया के रास्ते निकलेगा।
 
 
इंसानी आंत से जुड़ा है इलाज
डिप्रेशन कम करने के लिए दी जाने वाली जो मौजूदा दवाएं हैं, वो हर इंसान के लिए कारगर नहीं होतीं। 10 में से 2 मरीज़ों को ही उनसे फ़ायदा होता देखा गया है। ऐसे में वैज्ञानिकों को लगता है कि दिमाग़ और आंतों के बैक्टीरिया के रिश्ते की बारीक़ी समझकर इससे डिप्रेशन जैसी बीमारियों का इलाज खोजा जा सकता है।
 
 
पर डॉक्टर फ़िलिप्स का 1910 में किया प्रयोग हो या फिर हालिया रिसर्च, ये बहुत छोटे पैमाने पर हुए हैं। इसलिए अभी खान-पान में बदलाव से डिप्रेशन को हराने को लेकर बड़े प्रयोग होने ज़रूरी हैं।
 
 
जेन फ़ोस्टर कहती हैं कि हर इंसान के आंतों में अलग तरह के कीटाणु होते हैं। इसलिए हर शख़्स के हिसाब से इलाज भी बदल जाएगा। अब ज़रूरत इस बात की है कि इंसानों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया को कुछ ख़ास दर्जों में बांटा जाए, ताकि ऐसे इंसानों के लिए एक तरह का इलाज विकसित हो सके।
 
 
दिमाग़ और आंत के रिश्ते
लिसिनियो भी मानते हैं कि भविष्य में होने वाली रिसर्च दिमाग़ और आंतों के रिश्ते के ज़रिए डिप्रेशन का इलाज खोजने की कोशिश करेंगी। पर, फिलहाल तो डॉक्टर ये कहते हैं कि अच्छे खान-पान से हम अपनी दिमाग़ी सेहत बेहतर कर सकते हैं।
 
 
इसके लिए मेडिटेरेनियन डाइट यानी भूमध्य सागर के आस-पास के देशों के खान-पान को अपनाने की सलाह दी जाती है। इसमें फल, सब्ज़ियां, नट्स, समुद्री खाना और वनस्पति तेल की तादाद ज़्यादा होती है। मांस ख़ास तौर से लाल मांस और चीनी की मात्रा कम होती है।
 
 
ऑस्ट्रेलिया की डीकिन यूनिवर्सिटी की फेलिस जैका कहती हैं कि, "दिमाग़ी सेहत और खान-पान के बीच गहरे ताल्लुक़ को साबित करने से जुड़े तमाम आंकड़े मौजूद हैं। हमें ज़हनी सुकून चाहिए, तो खान-पान बेहतर करना ही होगा।" इस में कोई दो राय नहीं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग़ होता है।
 

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