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बिहार में शराबबंदी पर नीतीश कुमार को क्यों देना पड़ा बयान?

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BBC Hindi

, मंगलवार, 13 दिसंबर 2022 (08:25 IST)
चंदन कुमार जजवाड़े, बीबीसी संवाददाता, पटना (बिहार) से
बिहार में शराबबंदी के लागू हुए छह साल से ज़्यादा वक़्त हो चुका है, लेकिन इस पर बयानबाज़ी बंद नहीं होती है। शराबबंदी पर कभी पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बोल पड़ते हैं तो कभी जीतन राम मांझी का बयान आता है। विरोधी इस पर नीतीश को घरेने की कोशिश करते हैं तो जेडीयू के नेता शराबबंदी की पैरवी में खड़े मिलते हैं।
 
रविवार को जेडीयू के अधिवेशन में नीतीश कुमार ने कहा कि चाहे कोई कुछ बोले बिहार में शराबबंदी के फ़ैसले पर कोई असर नहीं होगा। नीतीश कुमार ने दावा किया कि शराबबंदी शुरू करते समय किसी भी पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया था और आज इससे कई परिवारों की स्थिति सुधरी है।
 
नीतीश ने तीख़े शब्दों में शराबबंदी को लेकर विरोधियों पर हमला किया है। उनका कहना है कि 'कुछ लोग शराब पीकर बहुत बड़े आदमी बन जाते हैं, हमने महिलाओं की मांग पर यह क़ानून लागू किया था और इसका फ़ायदा भी हुआ है।'
 
नीतीश को क्यों आना पड़ा शराबबंदी की बहस में?
बिहार सरकार में मद्य निषेध विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़ शराबबंदी लागू होने यानी 1 अप्रैल 2016 से अब तक इस शराबबंदी क़ानून के तहत साढ़े छह लाख़ से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया है।
 
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी के मुताबिक़, गिरफ़्तार किए गए लोगों में बड़ी संख्या कमज़ोर तबके के लोगों की है। पिछड़े वर्ग के लाखों लोग जेल में हैं और यह नाराज़गी कुढ़नी में हुई वोटिंग में भी रही है।
 
पटना में पीटीआई के पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, "शराबबंदी क़ानून में लोगों की गिरफ़्तारी के अलावा जो लोग ज़हरीली शराब से मरते हैं, उन्हें कोई सरकारी मुआवज़ा भी नहीं मिलता है क्योंकि शराब पीना ग़ैरक़ानूनी है। ये सारी बातें अब बैकफ़ायर कर रही हैं। इसलिए नीतीश कुमार को ख़ुद इस बहस में उतरना पड़ा है।"
 
जेडीयू के पूर्व नेता और किसी समय नीतीश कुमार के बेहद क़रीबी रहे आरसीपी सिंह ने दावा किया है, "बिहार में लोग अवैध शराब का धंधा कर रहे हैं, बिहार में शराब बिक रही है। नीतीश कुमार ज़िद पकड़े हुए हैं। बिहार की जनता उनको बता देगी, उनको साल 2024 के लोकसभा चुनाव में एक वोट नहीं मिलने वाला है।"
 
दरअसल बिहार के कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आठ दिसंबर को आए थे। यहां बीजेपी उम्मीदवार केदार प्रसाद गुप्ता ने जनता दल यूनाइटेड के मनोज कुशवाहा को 3649 वोट से हरा दिया था।
 
कुढ़नी में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के एक साथ चुनाव प्रचार करने के बाद भी जेडीयू की यहां से हार हुई। जबकि 2020 के विधानसभा चुनावों में जेडीयू और बीजेपी एक साथ थी, फिर भी आरजेडी ने यह सीट जीत ली थी।
 
इस सीट पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के क़रीब 60 हज़ार वोटर हैं। यहां वोटरों की नाराज़गी वोटिंग में भी दिखी है। यहां 4448 वोटरों ने किसी भी पार्टी को वोट न देकर 'नोटा' का बटन दबाया था। यानी कुढ़नी में नोटा को हार-जीत के अंतर से ज़्यादा वोट मिला था।
 
नीतीश रहे हैं विरोधियों के निशाने पर
आरसीपी सिंह का दावा है कि 'नीतीश कुमार को ये नीति वापस लेनी पड़ेगी। बीते सात साल में बिहार को एक लाख़ करोड़ से ज़्यादा का नुक़सान हुआ है। पैसे कहां से आएंगे। जिस पैसे से बिहार का भला होता उसका भी नुक़सान हो रहा है।'
 
बिहार में भले ही सरकारी एजेंसियों का क़ानून को सख़्ती से लागू करने का दावा हो। इसके लिए सीमा पर चौकसी, अवैध ठिकानों पर छापेमारी सबकुछ हो रहा है और क़ानून तोड़ने के आरोप में लोगों पर मुक़दमा और उनकी गिरफ़्तारी तक हो रही है। लेकिन इसके बावज़ूद शराबबंदी क़ानून को तोड़ने के मामले कम नहीं हो रहे हैं।
 
शराबबंदी लागू होने के बाद से बिहार में आम लोगों के पास ही नहीं बल्कि विधानसभा परिसर और मंदिरों तक में शराब की बोतल पाई गई है। यही नहीं कई बार ऐसी भी ख़बरें आई हैं कि बिहार में हज़ारों लीटर ज़ब्त शराब को चूहे ने गटक लिया।
 
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास कहते हैं, "बिहार में सैंकड़ों-हज़ारों लीटर शराब के सैंपल जांच के नाम पर रखे रहते हैं। जो जांच आप 50 या 100 एमएल सैंपल में कर सकते हैं, उसके लिए एक लीटर रखने की क्या ज़रूरत है।"
 
उनका कहना है कि अगर आप सैंपल के तौर पर कम शराब रखेंगे और उससे पता लगा लेंगे कि यह कैसी शराब थी, तो ऐसी ख़बरें भी नहीं आएंगीं कि हज़ारों लीटर शराब चूहे पी गए।
 
विद्यार्थी विकास कहते हैं, "यह भी सच है कि 30 से 40 फ़ीसदी लोग मान नहीं रहे हैं। इसलिए शराबबंदी सौ फ़ीसदी सफल नहीं हो रही है। इसके लिए ज़्यादा ताक़तवर 'एंटी लीकर सेल' बनाना होगा और उसे पुलिस से अलग रखना होगा।"
 
वहीं पटना में समाचार एजेंसी पीटीआई के पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, "शराबबंदी से हर जगह औरतों को परेशानी होती है। लेकिन जिस सख़्ती से बिहार में इसे लागू किया गया, वह बिल्कुल अलग है।"
 
उनका कहना है कि यहां अगर डॉक्टर किसी को सेहत के लिए थोड़ी-सी भी शराब पीने की सलाह दे तो वो नहीं पी सकता। कोई बाहर से लाकर अपने घर में शराब का सेवन करे तो वो भी ग़ैरक़ानूनी है, जबकि गुजरात की शराबबंदी में ऐसा नहीं है।
 
क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?
बिहार सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, इस साल राज्य में क़रीब 40 लाख़ लीटर अवैध शराब ज़ब्त की गई है। इसमें क़रीब आधी मात्रा विदेशी शराब की है जबकि आधे से कुछ ज़्यादा देशी शराब है। अवैध शराब के मामलों में इस साल एक लाख 38 हज़ार से ज़्यादा मामले भी दर्ज किए गए हैं।
 
केवल नवंबर महीने में ही सरकारी एजेंसियों ने तीन लाख लीटर से ज़्यादा शराब ज़ब्त किया है। बिहार राज्य में साल 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। बीबीसी के पास मौजूद 21।11।2022 तक के आंकड़ों के मुताबिक़, बिहार में अब तक शराबबंदी क़ानून तोड़ने के मामले में कुल पांच लाख से ज़्यादा 5,05,951 केस दर्ज हो चुके हैं।
 
बीते छह साल में क़रीब ढाई करोड़ लीटर (24226060) अवैध शराब ज़ब्त की गई है। इस दौरान शराबबंदी क़ानून तोड़ने के मामले में साढ़े छह लाख से ज़्यादा (655770) लोगों की गिरफ़्तारी भी हुई है।
 
बिहार सरकार की शराबबंदी क़ानून के मुताबिक़ ज़ब्त की गई शराब की बोतलों को तोड़कर ख़त्म किया जाता है। वहीं 5 दिसंबर तक के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में क़रीब आठ लाख 40 हज़ार लीटर शराब को अभी भी नष्ट किया जाना बाक़ी है।
 
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शराब का अवैध कारोबार
बिहार में शराबबंदी को लेकर पुलिस को भी शपथ दिलाई जाती है कि वो इस क़ानून को सख़्ती से लागू कराएंगे। लेकिन इस क़ानून को तोड़ने का सिलसिला थमता नहीं दिखता है।
 
बिहार में बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल आरोप लगाते हैं, "बिहार में शराब का अवैध कारोबार पुलिस के ही संरक्षण में हो रहा है। नीतीश सरकार ने आज तक पुलिस के किसी बड़े अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाया है, इसलिए यह कारोबार रुक नहीं रहा है।"
 
समाचार एजेंसी पीटीआई के पत्रकार नचिकेता नारायण इस मामले में अलग राय रखते हैं। उनका कहना है, "जो लोग शराब के आदि हैं उनकी आदत तो क़ानून से ख़त्म नहीं हो जाती। इसकी मांग तो बनी रहती है।
 
शराबबंदी को दुनिया के कई देशों ने लागू करने की कोशिश की। अमेरिका में में 1930 के दशक में एक कोशिश हुई थी और भारत के कई राज्य यह प्रयोग कर चुके हैं। लेकिन यह सफल नहीं रहा है।"
 
पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं कि पुलिस अगर बिना हेलमेट के पकड़ ले तो लोग 50 रुपये देकर फ़ौरन बचकर निकलना चाहते हैं। यही काम शराब का अवैध कारोबार करने वाले भी करते हैं।
 
नीतीश सरकार पर यह आरोप भी लगता है उसने राज्य की पुलिस को मुख्य रूप से अवैध शराब पकड़ने के काम में लगा दिया है, इसलिए दूसरे अपराधों पर पुलिस का ध्यान कम हो रहा है।
 
राजस्व का नुक़सान
मोटे तौर पर शराबबंदी से बिहार को हर महीने क़रीब छह हज़ार करोड़ के नुक़सान का दावा किया जाता है। इसका एक बड़ा हिस्सा शराब का अवैध कारोबार करने वालों के पास पहुंचने का आरोप भी लगता है।
 
बिहार में बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल का आरोप लगाते हैं, "आज अधिकारियों के घरों से शराब मिल रही है, पुलिस थाने से शराब बंट रही है। दरअसल अवैध शराब के धंधे में इतना पैसा है कि बड़ी संख्या में युवा भी शॉर्ट कट से पैसे कमाने के लिए इस धंधे में आ गए हैं।"
 
वहीं नचिकेता नारायण मानते हैं कि शराब बहुत महंगी कर दी जाए ताकि यह हर तबके की पहुंच में न हो तो शायद सरकार को भी इसका राजस्व मिल सकता है।
 
लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता। जीतन राम मांझी भले ही ताड़ी के समर्थन में बोलते हों, लेकिन कोई भी अन्य पार्टी शराबबंदी का खुलकर विरोध नहीं करती क्योंकि शराब को सामाजिक तौर पर भी अच्छा नहीं माना जाता।
 
प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास राजस्व के नुक़सान को अलग नज़रिए से देखते हैं। उनका कहना है, "मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो बताते हैं कि वो महीने में 28-30 दिन शराब पीते थे। अब 2 दिन पीते हैं।"
 
प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास कहते हैं, "शराबबंदी सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छी चीज़ है। इससे शांति स्थापित होती है। सड़कों पर छेड़खानी की घटना कम होती है और मारपीट या झगड़े भी कम होते हैं। इसलिए इसे कोई ग़लत बता ही नहीं सकता।"
 
"एक तरफ सरकार को राजस्व का नुक़सान हुआ है, लेकिन कई परिवारों के पास पैसे बचे हैं जिसका इस्तेमाल वो बच्चों की पढ़ाई या अन्य ज़रूरी मदों में करते हैं।"

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