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वहीदा रहमान: कैमरे के सामने नहीं, किरदार के भीतर जीने वाली अदाकारा

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हमें फॉलो करें वहीदा रहमान: कैमरे के सामने नहीं, किरदार के भीतर जीने वाली अदाकारा

समय ताम्रकर

, मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026 (08:22 IST)
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी मौजूदगी शोर नहीं मचाती, बल्कि समय के साथ गहराती चली जाती है। वहीदा रहमान उन्हीं में से एक हैं। वे उस दौर की अभिनेत्री हैं, जब अभिनय का मतलब संवादों की ऊंची आवाज़ नहीं, बल्कि आंखों की भाषा, चेहरे के भाव और भीतर बहती भावनाओं को संयम के साथ परदे पर उतारना होता था। वहीदा रहमान ने लगभग पांच दशकों तक सिने प्रेमियों के दिलों पर राज किया, लेकिन कभी स्वयं को सितारों की चकाचौंध में नहीं ढाला। उनकी पहचान हमेशा कलाकार की रही, एक ऐसी कलाकार, जिसने अपने नाम के अर्थ ‘लाजवाब’ को हर भूमिका में सच कर दिखाया।
 
3 फरवरी 1938 को तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में जन्मी वहीदा रहमान का बचपन अनुशासन और संस्कृति के बीच बीता। उनके पिता अधिकारी थे, कठोर अनुशासन वाले, लेकिन कला की गहरी समझ रखने वाले। उन्होंने बहुत पहले पहचान लिया था कि उनकी बेटी का मन पढ़ाई से अधिक लय और ताल में बसता है। यही कारण था कि छोटी उम्र में ही वहीदा को भरतनाट्यम सीखने की अनुमति मिली। यह नृत्य प्रशिक्षण केवल शारीरिक अनुशासन नहीं था, बल्कि भावनाओं पर नियंत्रण और अभिव्यक्ति की कला भी सिखाता था, जो आगे चलकर उनके अभिनय की आत्मा बना।
 
तेरह वर्ष की उम्र में वहीदा रहमान मंच पर नृत्य प्रस्तुत करने लगीं। उनके भाव, उनकी आंखें और शरीर की भाषा दर्शकों को बांध लेती थी। धीरे-धीरे फिल्म निर्माताओं की नजर उन पर पड़ी, लेकिन पिता ने स्पष्ट शब्दों में इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया। उनका मानना था कि वहीदा अभी बच्ची हैं और यह उम्र पढ़ने-लिखने की है। शायद यदि पिता जीवित रहते, तो वहीदा का सिनेमा से रिश्ता कुछ और समय बाद बनता।
 
लेकिन जीवन ने अचानक करवट ली। पिता के निधन के बाद घर की आर्थिक जिम्मेदारी वहीदा के कंधों पर आ गई। यह वही क्षण था, जब कला शौक से निकलकर जीवन का सहारा बनी। पिता के एक मित्र की मदद से वहीदा को तेलुगू सिनेमा में काम करने का अवसर मिला। पहली ही फिल्म में उनके अभिनय ने यह साबित कर दिया कि वे केवल नृत्यांगना नहीं, एक संपूर्ण कलाकार हैं।
 
तेलुगू फिल्म के प्रीमियर के दौरान हैदराबाद में मौजूद गुरु दत्त के एक वितरक वहीदा के अभिनय से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने गुरु दत्त से मिलने की सलाह दी। गुरु दत्त ने स्क्रीन टेस्ट लिया और वहीदा रहमान हिंदी सिनेमा में प्रवेश कर गईं। ‘सीआईडी’ में उनका किरदार छोटा था, लेकिन उनकी मौजूदगी नोटिस में आ गई।

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फिल्म निर्माण के दौरान गुरु दत्त ने वहीदा को नाम बदलने की सलाह दी, लेकिन वहीदा ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उनका नाम वहीदा ही रहेगा, क्योंकि वहीदा का अर्थ होता है ‘लाजवाब’। यह केवल नाम से जुड़ी जिद नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान के प्रति आत्मसम्मान था। समय ने साबित किया कि वहीदा ने अपने नाम को अभिनय से अर्थ दिया।
 
1957 में आई ‘प्यासा’ वहीदा रहमान के करियर का निर्णायक मोड़ बनी। गुलाबो का किरदार एक वेश्या, लेकिन आत्मा से शुद्ध, हिंदी सिनेमा के सबसे मानवीय किरदारों में गिना जाता है। वहीदा ने गुलाबो को न दया का पात्र बनाया, न करुणा का। उन्होंने उसे गरिमा दी। उनकी आंखों में छुपा दर्द और प्रेम आज भी दर्शकों को भीतर तक छू जाता है।
 
इसके बाद ‘कागज के फूल’ आई। एक ऐसी फिल्म, जो अपने समय से बहुत आगे थी। वहीदा ने इसके प्रीमियर पर कहा था कि यह फिल्म नहीं चलेगी, क्योंकि यह बहुत भारी है। वह सही थीं। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन समय के साथ यह भारतीय सिनेमा की महानतम कला फिल्मों में गिनी गई। वहीदा का किरदार शांति, गुरु दत्त के निजी जीवन की प्रतिछाया बन गया।
 
1960 में ‘चौदहवीं का चांद’ ने वहीदा रहमान को सौंदर्य का प्रतीक बना दिया। गीत की पंक्तियां- “जो भी हो तुम खुदा की कसम, लाजवाब हो”,  मानो वहीदा के लिए ही लिखी गई थीं। लेकिन वहीदा केवल सुंदर चेहरा नहीं थीं। यह उन्होंने ‘साहब बीवी और गुलाम’ में साबित किया। छोटी बहू का किरदार न मिलने का दुख उन्होंने अपने भीतर रखा, लेकिन जो छोटा रोल मिला, उसमें भी अपनी छाप छोड़ दी।
 
1965 में आई ‘गाइड’ वहीदा रहमान के करियर की सबसे साहसी फिल्म मानी जाती है। रोजी का किरदार सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ता था। उन्हें चेतावनी दी गई कि दर्शक इस किरदार को स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन वहीदा ने जोखिम उठाया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने न केवल दर्शकों का दिल जीता, बल्कि सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी हासिल किया।
 
‘खामोशी’ में वहीदा रहमान का अभिनय चरम पर पहुंचता है। एक नर्स, जो पागल मरीजों का इलाज करते-करते खुद मानसिक रूप से टूट जाती है। यह किरदार संवादों से नहीं, मौन से बोलता है। वहीदा ने दर्द को आंखों में इस तरह उतारा, मानो अभिनय नहीं, जीवन जी रही हों।
 
सत्तर के दशक में वहीदा ने गरिमा के साथ चरित्र भूमिकाएं स्वीकार कीं। ‘कभी कभी’, ‘त्रिशूल’, ‘चांदनी’ और ‘लम्हें’ जैसी फिल्मों में वे मां या मार्गदर्शक के रूप में दिखाई दीं, बिना अपने कद को छोटा किए। इसके बाद उन्होंने लंबा विराम लिया, लेकिन 2000 के बाद ‘वाटर’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘दिल्ली 6’ से यह साबित किया कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं होती। 


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