Publish Date: Sat, 21 Feb 2026 (11:47 IST)
Updated Date: Sat, 21 Feb 2026 (11:49 IST)
आज के दौर में जहां 'मिस इंडिया' का खिताब जीतने वाली सुंदरियों को फिल्मों में काम करने के अवसर सहजता से मिल जाते हैं, वहीं हिंदी सिनेमा की महान अभिनेत्री नूतन को अभिनय की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। 4 जून 1936 को मुंबई में जन्मीं नूतन के लिए अभिनय केवल पेशा नहीं, बल्कि विरासत थी।
नूतन की मां शोभना समर्थ अपने दौर की जानी-मानी अभिनेत्री थीं। घर में फिल्मी माहौल होने के कारण नूतन बचपन से ही शूटिंग सेट पर जाया करती थीं। यहीं से उनके मन में अभिनेत्री बनने का सपना आकार लेने लगा। उन्होंने बतौर बाल कलाकार फिल्म नल-दमयंती से अपने सिने करियर की शुरुआत की।
सौंदर्य प्रतियोगिता जीतने के बावजूद संघर्ष
नूतन ने अखिल भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें तुरंत फिल्मों में पहचान नहीं मिली। वर्ष 1950 में रिलीज हुई फिल्म हमारी बेटी से उन्हें बतौर नायिका पहला बड़ा मौका मिला। इस फिल्म का निर्देशन स्वयं उनकी मां शोभना समर्थ ने किया था। इसके बाद हम लोग, शीशम, नगीना और शबाब जैसी फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म सीमा नूतन के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने विद्रोही और सशक्त नायिका का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें अपने करियर का पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला। इसके बाद नूतन ने देव आनंद के साथ पेइंग गेस्ट और तेरे घर के सामने जैसी फिल्मों में हल्के-फुल्के और चुलबुले किरदार निभाकर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। 1958 में सोने की चिड़िया की सफलता के बाद नूतन का नाम इंडस्ट्री में गूंजने लगा।
बोल्ड भूमिकाएं और छवि परिवर्तन
दिल्ली का ठग में स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहनकर नूतन ने उस दौर की सामाजिक सोच को चौंका दिया। वहीं फिल्म बारिश के कुछ बोल्ड दृश्यों को लेकर उनकी आलोचना भी हुई। लेकिन बिमल रॉय की फिल्मों सुजाता और बंदिनी में उनके संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय ने उनकी छवि को पूरी तरह बदल दिया।
1959 की फिल्म सुजाता में अछूत कन्या का किरदार निभाकर नूतन ने दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीत लिया और दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किया। 1963 में आई बंदिनी को आज भी भारतीय सिनेमा की श्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए नूतन को तीसरी बार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
ट्रेजडी क्वीन से हरफनमौला अभिनेत्री तक
सुजाता, बंदिनी और दिल ने फिर याद किया के बाद उन्हें ट्रेजडी क्वीन कहा जाने लगा, लेकिन छलिया और सूरत जैसी फिल्मों में कॉमिक रोल निभाकर उन्होंने आलोचकों को करारा जवाब दिया। 1965 से 1969 के बीच नूतन ने गौरी, मेहरबान, खानदान, मिलन और भाई-बहन जैसी सुपरहिट सामाजिक-पारिवारिक फिल्मों में काम किया। 1968 की सरस्वतीचंद्र और 1973 की सौदागर में उनका अभिनय आज भी याद किया जाता है।
दिग्गजों के साथ अविस्मरणीय अभिनय
राज कपूर के साथ अनाड़ी, अशोक कुमार के साथ बंदिनी और देव आनंद के साथ पेइंग गेस्ट—नूतन हर अभिनेता के साथ उसी के रंग में रंग जाती थीं। 80 के दशक में नूतन ने चरित्र भूमिकाएं निभानी शुरू कीं। मेरी जंग, नाम और कर्मा में उनके मां के किरदार को खूब सराहा गया। मेरी जंग के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। फिल्म कर्मा में दिलीप कुमार के साथ उनका अभिनय और गाना “दिल दिया है जान भी देंगे…” आज भी लोकप्रिय है।
नूतन को अपने करियर में कुल 5 फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। अभिनय के साथ-साथ उन्हें गीत और ग़ज़ल लिखने का भी शौक था। करीब चार दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली यह अभिनेत्री 21 फरवरी 1991 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं, लेकिन उनका अभिनय आज भी अमर है।
WD Entertainment Desk
Publish Date: Sat, 21 Feb 2026 (11:47 IST)
Updated Date: Sat, 21 Feb 2026 (11:49 IST)