Article 370 movie review: यामी गौतम और प्रिया मणि के दमदार एक्टिंग से सजी यह मूवी क्या है देखने लायक

समय ताम्रकर
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024 (14:25 IST)
Article 370


article 370 movie review: आर्टिकल 370 क्या है? जम्मू और कश्मीर के लिए इसका क्या महत्व रहा? इसके पीछे कितने राजनीतिक षड्यंत्र हुए? इसे हटाने में मोदी सरकार को किन परेशानियों से जूझना पड़ा? क्यों इसका विरोध हुआ? इन सवालों के जवाब फिल्म 'आर्टिकल 370' के जरिये देने की कोशिश की गई है।
 
निर्देशक (आदित्य जांभले) और लेखकों की टीम (आदित्य धर, अर्जुन धवन, आदित्य जांभले, मोनल ठाकर) ने फिल्म को इस तरह से पेश किया है कि यदि कोई आर्टिकल 370 के बारे में कुछ भी नहीं जानता हो तो भी उसे सारा मुद्दा समझ में आ जाए। 
 
इसके लिए फिल्म की शुरुआत में अजय देवगन की आवाज वाला वाइस ओवर नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि आर्टिकल 370 का इतिहास इसी में बताया गया है। होना ये चाहिए था कि इसे भी फिल्मकार ज्यादा महत्व देते हुए स्क्रीन पर ज्यादा समय देते तो बात और स्पष्ट होती क्योंकि आर्टिकल 370 क्यों और कैसे लागू की गई, ये बात बहुत ही कम लोग जानते हैं।  
 
5 अगस्त 2019 को इसे हटाने की घोषणा की गई थी। फिल्म मुख्यत: 2016 से 2019 के बीच का समय दिखाती है कि कैसे इसे हटाने की रणनीति बनी और किस तरह से सरकार ने चतुराईपूर्वक काम किया। 
 
फिल्म का भार दो महिला किरदारों ज़ूनी हक्सर (यामी गौतम) और राजेश्वरी स्वामीनाथन (प्रियामणि) के कंधों पर है और दोनों लीडिंग लेडीज़ ने अपना काम बहुत ही शानदार तरीके से किया है। 

 
ज़ूनी ग्राउंड में है और कश्मीर में अलगाववादियों, आतंकवादियों और वहां के उन नेताओं से भिड़ रही है जो नहीं चाहते कि इस खूबसूरत घाटी में कभी शांति हो। दूसरी ओर राजेश्वरी सरकार की रणनीति बनाने में जुटी हुई है और उस चुनौती का सामना कर रही है जिसमें आर्टिकल 370 खत्म करने के तमाम रास्ते बंद कर दिए हैं। 
 
फिल्म दो ट्रैक पर चलती है जो अक्सर एक भी हो जाते है। जम्मू और कश्मीर में अशांति के हालात क्यों पैदा हुए और क्या राजनीतिक स्वार्थ है, इस ट्रैक में भरपूर एक्शन डाला गया है और पुलवामा की घटना का भी जिक्र है। 
 
दूसरी ओर राजेश्वरी वाला ट्रैक पॉलिटिकल ड्रामा है जिसमें बताया गया है कि किस तरह से भारत के प्रधान मंत्री और गृह मंत्री अपनी रणनीति के तहत इस मुद्दे को लेकर मीडिया और पड़ोसी देशों को भ्रमित करते हैं और राज्यसभा में कम संख्या के बावजूद कामयाब होते हैं। साथ ही वे एक ऐसा षड्यंत्र भी पकड़ते हैं जिसमें पूर्व सरकार ने एक क्लॉज़ हटाकर कर आर्टिकल 370 हटाने के सभी रास्ते बंद कर दिए थे। 

 
शुरुआत में फिल्म धीमी लगती है, साथ में बहुत ज्यादा किरदार पेश कर दिए हैं जिससे ये समझने में दिक्कत होती है कि कौन क्या है, लेकिन ये परेशानी दूर होते ही दर्शक फिल्म से जुड़ जाते हैं। फिल्म के कई किरदारों के लुक से आप पहचान सकते हैं कि ये कौन से नेता का किरदार है। 
 
निश्चित रूप से फिल्म के नाम पर लिबर्टी ली गई है और लेखकों ने अपनी ओर से भी कुछ जोड़ा है, लेकिन ये ऐसा नहीं है जो फिल्म देखने का मजा किरकिरा करे। 
 
निर्देशक आदित्य जांभले की इस बात की तारीफ की जा सकती है कि उन्होंने 'आर्टिकल 370' को प्रोपगैंडा मूवी बनने से बचाए रखा। उन्होंने कोशिश की है फिल्म तथ्यों के करीब हो और जानकारी जस की तस पेश की जाए। कहीं-कहीं ड्रामेटाइजेशन जरूर उन्होंने किया है। 
 
साथ ही दो ट्रेक पर चलती कहानी का संतुलन उन्होंने अच्छे से बनाए रखा है। राज्यसभा वाला दृश्य उन्होंने अच्छे से फिल्माया है। एक्शन सीन लंबे हैं, जिससे फिल्म थोड़ी लंबी हो गई है। मीडिया वाले सीन कहानी में विशेष प्रभाव नहीं जोड़ते हैं। इंटरवल उन्होंने ऐसे सीन पर किया है जो दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है। 
 
यामी गौतम लगातार अलग-अलग किरदारों में अपनी एक्टिंग के जरिये प्रभावित कर रही हैं और 'आर्टिकल 370' में भी उन्होंने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से अदा किया है। एक्शन सीक्वेंसेस में भी वे कम नहीं रही हैं। प्रिया मणि ने गरिमापूर्ण तरीके से अपने किरदार का निर्वाह किया है। 
 
होम मिनिस्टर के रूप में किरण करमाकर जमे हैं जबकि प्राइम मिनिस्टर के रूप में अरुण गोविल नजर आए हैं। वैभव तत्ववादी, राज जुत्शी, दिव्या सेठ शाह, राज अर्जुन ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।
 
आर्टिकल 370 के इतिहास के बारे में फिल्म कम जानकारी देती है, लेकिन इसे कैसे हटाया गया इस पर फोकस ज्यादा है। 
 

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