राणा नायडू रिव्यू : सेक्स, शराब और गाली-गलौज में लिपटी टूटे परिवार की कहानी

समय ताम्रकर
शनिवार, 18 मार्च 2023 (15:17 IST)
Rana Naidu review वेबसीरिज में अपशब्दों की भरमार होना इन दिनों कोई नई बात नहीं है। आटे में नमक बराबर ये चल जाती हैं, लेकिन नमक में आटा मिलाया जाए तो कानों को कष्ट होता है। हाल ही में नेटफ्लिक्स पर 'राणा नायडू' वेबसीरिज आई है। इसके हर संवाद में अपशब्द है। आज तक हिंदी में कोई ऐसी वेबसीरिज नहीं आई जिसमें इतनी गालियां हों और राणा नायडू ने सारे कीर्तिमान तोड़ डाले हैं। कहीं-कहीं तो डायलॉग सुन कर लगता है मानो संवाद लिखने वाले ने पहले अपशब्द लिखे हों और फिर उनके बीच में काम की बातें लिखी हों। यदि आप हजारों गालियां सुनने के लिए तैयार हों तो यह सीरिज देखी जा सकती है, बशर्ते आप इनको इग्नोर करें। 
 
राणा नायडू में कैरेक्टर्स बहुत जोरदार हैं जिनके इर्दगिर्द कहानी बुनी गई है। राणा नायडू खुद अनोखा किरदार है। मुंबई के कुछ सेलिब्रिटीज उसके क्लाइंट हैं। वे काले कारनामे करते हैं और राणा उन पर परदा डालता है। उसके पास अपनी टीम है। पुलिस और नेताओं से कनेक्शन है़ और राणा खुद सौ के बराबर है। इसलिए उसे 'फिक्सर ऑफ द स्टार' कहा जाता है। 
 
दूसरा दिलचस्प किरदार है नागा नायडू का, जिसे वेंकटेश ने अभिनीत किया है। नागा, राणा का पिता है जो 15 साल बाद छूटा है। वह जेल क्यों गया? इसके पीछे दिलचस्प कहानी है। राणा अपने पिता से बहुत ज्यादा नफरत करता है तो दूसरी ओर नागा अपने बेटे से संबंध सुधारना चाहता है। नागा की राणा की लाइफ में 15 साल बाद एंट्री भूचाल ला देती है। राणा की पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ के तार जुड़ जाते हैं और बात उसकी फैमिली तक आ पहुंचती है। इस फिक्सर को दो मोर्चों पर जूझना पड़ता है। 
 
इसके अलावा भी कुछ और जोरदार कैरेक्टर्स हैं। जैसे राणा के दो भाई, तेज और जफ्का। राणा का अंकल, सूर्या। राणा की पत्नी, नैना। ये सब कैरेक्टर्स मिलकर कहानी को ठोस बनाते हैं। 


 
राणा नायूड 2013 की क्राइम टीवी सीरिज 'रे डॉनोवेन' का ऑफिशियल एडॉप्टेशन है। कर्मायन आहूजा, अनन्य मोदी, बीवीएस रवि, वैभव विशाल और करण अंशुमन ने मिल कर इसे भारतीय परिवेश में ढाला है। लेखकों की इस टीम ने अच्छा काम किया है और उम्दा तरीके से भारतीय करण किया है। चूंकि इस सीरिज में ज्यादातर कलाकार दक्षिण भारत से हैं और इसे हिंदी में बनाया गया है, इसलिए किरदार को मूलत: हैदराबाद का रहने वाला बताया गया है। इस वजह से हैदराबादी लहजे में बोली गई हिंदी अच्छी लगती है।
 
करण अंशुमन और सुपर्ण वर्मा ने इस सीरिज को निर्देशित किया है। कहानी का प्रस्तुतिकरण उम्दा है। 45 से 50 मिनट के 10 एपिसोड हैं। हर एपिसोड में नए-नए किरदारों को पेश किया गया है साथ ही चौंकाने वाले ट्विस्ट भी रखे गए हैं जिसके कारण दर्शकों की रूचि इस बात में बनी रहती है कि आगे क्या होने वाला है और आप एपिसोड दर एपिसोड देखते चले जाते हैं। 
 
कहानी में भाइयों की बॉडिंग, पिता-पुत्र का नफरत भरा रिश्ता, राणा का अपनी फैमिली को लेकर नजरिया, फिल्म इंडस्ट्री की अंदरुनी बातें उभर कर आती हैं। दूसरी ओर राणा की बेटी और उसका एक लड़के के प्रति आकर्षित होने वाला ट्रैक फिजूल है। इसे काफी लंबा खींचा गया है जो बोर भी करता है। राणा की पत्नी नैना के बारे में कम जानकारी दी गई है। नागा के प्रति एकाएक तारा का आकर्षित हो जाना और तेज के प्रति नर्स का आकर्षित होना में जल्दबाजी नजर आती है। क्लाइमैक्स और बेहतर हो सकता था, बेहतर फिल्माया जा सकता था। 
 
करण और सुपर्ण ने ड्रामे को लेकर जो माहौल बनाया है वो उम्दा है। किरदारों की लाइफ स्टाइल, उनका व्यवहार, घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया देना, पर बारीकी से काम किया गया है और निर्देशक की पकड़ सीरिज पर नजर आती है। गुत्थियों को जिस तरह से उन्होंने सुलझाया है वो तारीफ के काबिल है। करण और सुपर्ण ने जहां संवादों में पूरी छूट ली है वहीं बोल्ड दृश्यों की भी भरमार रखी है। 
 
राणा नायडू में सबसे कमाल की एक्टिंग की है वेंकटेश दग्गूबाती ने। वेंकटेश ने जिस तरह से अपने रंगीले किरदार को जिया है वो स्क्रीन पर निखर कर सामने आया है। उनके कैरेक्टर में हर रंग है और वेंकटेश ने दर्शकों को चौंकाया है। पूरी सीरिज में वे छाए रहते हैं। राणा दग्गूबाती की शख्सियत उनकी किरदार को सूट करती है। वे ऐसे शख्स लगे जो हर चीज को फिक्स कर सकता है। उन्हें संवाद कम मिले इसलिए बॉडी लैग्वेंज और एक्सप्रेशन पर उन्हें ज्यादा मेहनत करना पड़ी। 
 
राणा के भाई के रोल में सुशांत सिंह और अभिषेक बनर्जी ध्यान खींचते हैं। दोनों ही किरदार मनमौजी हैं और मनोरंजन करते हैं। आशीष विद्यार्थी का किरदार सीरिज को एक अलग ही रंग देता है और आशीष ने इसे बहुत ही सहजता के साथ निभाया है। सुरवीन चावला, गौरव चोपड़ा सहित तमाम सपोर्टिंग कास्ट की एक्टिंग अच्छी है। 
 
जया कृष्णा गुम्मदी की सिनेमाटोग्राफी शानदार है। उन्होंने डार्क और वॉर्म टोन का इस्तेमाल किया है जो कैरेक्टर्स के अंदर चल रहे तनाव को दर्शाता है। निनंद खनोलकर और मनन अश्विन मेहता की सिनेमाटोग्राफी सराहनीय है। 
 
राणा नायडू एक टूटे परिवार की कहानी है, जिसकी पृष्ठभूमि में क्राइम है। सेक्स, शराब और गाली-गलौज में लपेट कर इस कहानी को पेश किया गया है जिसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं है। 
 

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