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वैश्विक मंदी की संभावित काली छाया और उसके निदान

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शरद सिंगी

दिवाली के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हम विश्व और भारत की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा करेंगे। पिछले कुछ महीनों से मिल रहे संकेतों के अनुसार आने वाला वर्ष, विश्व के लिए आर्थिक दृष्टि से थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहेगा। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जिनमें विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष शामिल हैं, ने चेतावनी दी है कि इस वर्ष 90 प्रतिशत से अधिक देश आर्थिक मंदी की चपेट में रहेंगे।
 
उन्होंने वैश्विक विकास दर के पिछले एक दशक में सबसे कम हो जाने का एलान भी कर दिया है। उनका मानना है कि भारत और ब्राजील जैसे उभरते बाजारों में यह मंदी और भी अधिक स्पष्टता से दिखेगी। वित्तीय संस्थाओं के अनुसार विकास दर के कमजोर होने का कारण व्यापार में बढ़ती बाधाएं और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव हैं। वर्तमान वित्तीय संकट के इन्हीं कारणों की संक्षेप में चर्चा हम इस लेख में करेंगे।  
 
आपको बता दें कि तेजी या मंदी आना विश्व के लिए कोई नई बात नहीं है। ये आती जाती रहती है। यह एक चक्र है किन्तु यदि यह  चक्र जल्दी जल्दी घूमने लगे तो वैश्विक व्यापार स्थिर नहीं हो पाता और यह स्थिति विकास में अवरोध बन जाती है। मंदी किसी को अच्छी नहीं लगती किन्तु विडम्बना है कि अधिकांश मंदी मानव निर्मित ही होती हैं। इसके पीछे कोई आसमानी ताकत नहीं होती। सन 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट का यदि आपको स्मरण हो तो वह मंदी बैंकों द्वारा आवासीय क्षेत्र को बेतहाशा ऋण देने की वजह से आई थी। तब ऋण चुकाने के लिए उपभोक्ता के पास धन नहीं था और कई वित्तीय संस्थाएं डूब गई थीं।
 
वर्तमान संकट भी मानव निर्मित है। इसका पहला कारण है बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के बीच ट्रेड वॉर या वाणिज्यिक युद्ध, विशेषकर चीन और अमेरिका के बीच। अमेरिका के राष्ट्रवादी राष्ट्रपति को अमेरिका और चीन के बीच व्यापार असंतुलन और चीन की तरफ डॉलर के प्रवाह की बात खटकी और उन्होंने चीन से आयात होने वाले सामान पर वित्तीय कर चस्पा कर दिए। चीन ने भी जवाबी कार्यवाही की।
 
वैश्वीकरण की ओर तेजी से अग्रसर दुनिया को यकायक एक झटका लगा। चूंकि यह झगड़ा विश्व की पहले और दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्थाओं के मध्य था और व्यापार का परिमाण भी इतना बड़ा था कि इस युद्ध ने पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया।  व्यापार में जैसे ही आत्मविश्वास में कमी होती है, व्यापारी और निवेशक पूंजी निवेश से बचते नज़र आते हैं और इसलिए दुनिया पूंजीगत व्यय में कटौती की ओर अग्रसर होती दिख रही है।
 
दूसरा बड़ा कारण है ब्रेक्जिट। यूरोप के सारे देश मिलकर यूरोपीय संघ बनाते हैं जो सम्मिलित रूप से एक बड़ी अर्थव्यस्था है। पिछले दो वर्षों से यूरोप, इंग्लैंड को लेकर अनिर्णय की स्थिति में है। ब्रेक्सिट यानी ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर आने के पश्चात होने वाली अनिश्चित स्थिति के डर से निवेशक निवेश नहीं कर रहे।
 
ऐसे में इंग्लैंड, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों की अर्थव्यवस्था आईसीयू में पहुंच चुकी है। विशेष रूप से चिंता बीमार ऑटोमोबाइल क्षेत्र की है। जर्मनी और जापान जैसे बड़े निर्यातक देशों, जहां की अर्थव्यवस्था वाहनों के निर्यात पर आधारित है, ये मंदी सिरदर्द बन चुकी है। मांग सिकुड़ रही है, इसलिए उत्पादन को कम कर दिया गया है। उधर अमेरिका में भी गैर-आवासीय निवेश तीन वर्षों में पहली बार सिकुड़ गया है।
 
अब बात करें अंतिम कारण भू-राजनीतिक तनावों की। अरब और मध्य पूर्व के देशों में इस समय कई क्षेत्रों में युद्ध के हालात हैं। पहले इंग्लैंड ने ईरान के तेल के एक जहाज को जब्त किया तो बदले में ईरान ने इंग्लैंड का एक जहाज अगवा कर लिया। फिर ओमान की खाड़ी में सऊदी जहाजों पर हमला हुआ और बाद में सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों पर ड्रोन द्वारा हमला।
 
इधर सऊदी अरब के बंदरगाह जेद्दाह के पास  ईरान के एक तेल टैंकर में विस्फोट के बाद आग लगने से अमेरिका और ईरान के संबंधों में तनाव बढ़ चुका है। इराक में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं, तुर्की ने सीरिया में एक आक्रामक अभियान शुरू किया हुआ है और हांगकांग में प्रजातंत्र के लिए चल रहा आंदोलन आदि अर्थव्यवस्था में मंदी लाने के कारण बन रहे हैं। दूसरी तरफ अर्जेंटीना एक और वित्तीय संकट का सामना कर रहा है तथा इक्वाडोर, पेरू और वेनेजुएला जैसे देश राजनीतिक समस्याओं में उलझे हुए हैं। इनके अतिरिक्त और भी कई देश हैं जहां अराजकता फैली हुई है। इससे तेल की कीमतों में उछाल का खतरा बना हुआ है।
 
इन्हीं सब कारणों से अगला वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियों से परिपूर्ण होगा। किन्तु चूंकि समस्या की जड़ मालूम है, अतः हल निकलना भी आसान है। सबसे पहले अमेरिका और चीन में कोई समझौता हो जाता है तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में समय नहीं लगेगा।
 
ब्रेक्जिट की समस्या अपने अंतिम दौर में है और शीघ्र ही निर्णय के आसार हैं। अरब देशों में चल रहे युद्धों से निपटने के लिए महाशक्तियों को अपने अहम को छोड़कर साथ आना होगा। इस लेखक का मानना है कि समाधान सीधे हैं केवल हित आड़े न आएं तो समस्याएं बहुत आसानी से सुलझाई जा सकती हैं, अन्यथा (ईश्वर न करे) आगामी वर्ष में आम जनता को मुश्किलों का सामना करना होगा। अगले अंक में वैश्विक अर्थव्यवस्था के उपरोक्त विश्लेषण के प्रकाश में हम भारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करेंगे। 

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