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दुनिया में चल रहा है भाषा, संस्कृति, समाज और धर्म का ध्रुवीकरण, क्या आप भी हैं इसकी चपेट में?

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WD Feature Desk

, मंगलवार, 27 जनवरी 2026 (13:22 IST)
What is polarization: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए ऐसा लग सकता है कि दुनिया "पहचान के संघर्ष" (Identity Crisis) के दौर से गुजर रही है। इतिहासकार सैमुअल पी हंटिंगटन ने इसे "Clash of Civilizations" कहा था, जहाi  भविष्य के युद्ध देशों के बीच नहीं, बल्कि संस्कृतियों और धर्मों के बीच होने की भविष्यवाणी की गई थी। कुछ ऐसे धर्म और देश हैं जो दूसरे के धर्म और देश के अस्तित्व को मिटाना चाहते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए हर देश में पिछले कई वर्षों से ध्रुवीकरण की राजनीति में तेजी आई है, लेकिन इसके विपरीत भी हो रहा है।
 

1. ध्रुवीकरण (Polarization) का अर्थ

ध्रुवीकरण वह स्थिति है जब समाज, समूह या विचार दो परस्पर विरोधी छोरों में बंट जाते हैं। यह केवल मतभेद नहीं, बल्कि संवाद का अंत है।
परसेप्शन का जाल: इसमें व्यक्ति तथ्यों से दूर होकर एक ऐसा 'परसेप्शन' बना लेता है जो सत्य से कोसों दूर होता है।
शत्रुता का भाव: दूसरे पक्ष के तर्क को सुनना बंद कर दिया जाता है और विरोधी को 'गलत' या 'दुश्मन' माना जाने लगता है।
 

2. ध्रुवीकरण के विभिन्न आयाम

राजनीतिक ध्रुवीकरण:
राजनीति में अब तथ्यों और विकास के मुद्दों से ज्यादा महत्व 'निष्ठा' (Loyalty) को दिया जाता है। किसी भी राष्ट्रीय या सामाजिक मुद्दे पर आम सहमति बनना लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि पार्टियां और मतदाता दो धड़ों में विभाजित होते हैं।
 
दक्षिणपंथ के भीतर विखंडन:
वोट बैंक: वर्तमान में सत्ता प्राप्ति और वोट बैंक के लिए दक्षिणपंथ के भीतर ही सामाजिक विखंडन देखा जा रहा है:
 
वैश्विक उदाहरण: मुस्लिम देशों में शिया बनाम सुन्नी का संघर्ष, कैथोलिक बनाम प्रोटेस्टेंट का संघर्ष। इन संघर्षों के बीच छोटे धर्म या सामाजिक समूह का अस्तित्व संकट में है। जैसे यजीदी, अहमदिया, पारसी, बहाई, दाऊदी बोहरा, वूडू आदि। शिया-सुन्नी और इजरायल-फिलिस्तीन जैसे संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक हैं। यदि यहाँ धार्मिक कट्टरवाद कम नहीं हुआ, तो यह क्षेत्र लंबे समय तक अस्थिरता का केंद्र बना रहेगा, जिससे वैश्विक ऊर्जा (Oil & Gas) संकट और शरणार्थी समस्या और गंभीर हो सकती है।
 
भारतीय संदर्भ: हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण, भाषावाद और आरक्षण के जरिए एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ खड़ा करना। इन रणनीतियों के कारण हर धर्म का 'अल्प वर्ग' या हाशिए पर रहने वाला समूह और अधिक असुरक्षित हो गया है। असंतोष भी भावना अपने चरम पर है। यदि धार्मिक और भाषाई कट्टरता बढ़ती है, तो भारत सहित संपूर्ण एशिया आपसी कलह में उलझकर अपनी आर्थिक शक्ति खो सकता है।
 
वामपंथ का आंतरिक विभाजन और बदलता स्वरूप:
वामपंथ अब केवल आर्थिक समानता तक सीमित नहीं है, इसके कई उप-विभाजन हो चुके हैं:
विचारधारात्मक विविधता: मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिनवाद और माओवाद से लेकर अब 'नया वामपंथ' उभर आया है।
लोकतांत्रिक समाजवाद: क्रांतिकारी हिंसा के बजाय चुनावी प्रक्रिया और 'जन-कल्याणकारी' मॉडल पर जोर (जैसे नॉर्डिक देश)।
नया एजेंडा: आधुनिक वामपंथ अब पर्यावरण, नारीवाद और मानवाधिकारों पर केंद्रित है।
नकारात्मक पक्ष: आरोप है कि यह समूह भी सत्ता के लिए इतिहास की व्याख्या अपने चश्मे से करता है और एक विशेष धर्म के पक्ष में खड़े होकर सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करता है।
 

3. ध्रुवीकरण के घातक परिणाम

जब भाषा, जाति और धर्म को हथियार बनाया जाता है, तो समाज निम्नलिखित खतरों की ओर बढ़ता जाता है। जब तक नेतृत्वकर्ता या आम जनता इस खतरों को समझने पाती है तब तक देर हो चुकी होती है।
 
'हम बनाम वे' (Us vs Them): समाज में मनोवैज्ञानिक विभाजन पैदा होता जाता है।
इतिहास के साथ छेड़छाड़: राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
असहिष्णुता और कट्टरपंथ: लोगों में एक-दूसरे को समझने की शक्ति खत्म हो जाती है, जिससे सामाजिक शत्रुता, अलगाववाद, उग्रवाद बढ़ता है।
नागरिक अशांति और गृहयुद्ध: लोग संविधान को मानना छोड़कर आंतरिक तनाव बढ़ने से वर्ग संघर्ष, पलायन और अंततः गृहयुद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। 
 
परिणाम: ध्रुवीकरण चाहे दक्षिणपंथ की ओर से हो या वामपंथ की ओर से, यह अंततः मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक एकता को नष्ट करता है। यह 'परसेप्शन' की ऐसी लड़ाई है जिसमें सत्य की बलि चढ़ जाती है। कोई भी वर्ग यह सोचने की समझने की क्षमता खो देता है कि किस तरह हमारा ब्रेनवॉश या उपयोग करने हमें दूसरे के खिलाफ खड़ा करने हमारे ही समाज और देश को नष्ट कर दिया गया।
 

4. ध्रुवीकरण क्यों और कैसे होता है?

सोशल मीडिया: एक आभासी 'इको चैंबर'
सोशल मीडिया: सोशल मीडिया वह मंच प्रदान करता है जहाँ सूचनाएं बिना किसी फिल्टर के तेजी से फैलती हैं। यह वैचारिक ध्रुवीकरण का मुख्य आधार बन गया है।
 
इको चैंबर (Echo Chambers): यहाँ लोग केवल उन्हीं समूहों या व्यक्तियों से जुड़ते हैं जो उनकी विचारधारा का समर्थन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति को लगता है कि उसकी सोच ही 'सार्वभौमिक सत्य' है।
 
संवाद का अंत: यह मंच विपरीत विचारधारा वाले लोगों से स्वस्थ चर्चा करने के बजाय उन्हें ब्लॉक करने या उन पर हमला (Trolling) करने की सुविधा देता है, जिससे वास्तविक संवाद पूरी तरह बंद हो जाता है।
 
एल्गोरिदम: पूर्वाग्रहों का तकनीकी सुदृढ़ीकरण:
एल्गोरिदम: एल्गोरिदम वह अदृश्य गणितीय कोडिंग है जो बैकग्राउंड में काम करती है और यह तय करती है कि आपकी स्क्रीन पर क्या दिखेगा। एल्गोरिदम आपकी पसंद और नापसंद को ट्रैक करता है। यदि आप किसी नेता या धर्म के पक्ष या विपक्ष में वीडियो देखना शुरू करते हैं, तो एल्गोरिदम आपको लगातार उसी प्रकार की सामग्री परोसता रहता है।
 
मानसिक बदलाव का चक्र: उदाहरण के तौर पर, यदि कोई तटस्थ व्यक्ति लगातार एक ही तरफा नैरेटिव (जैसे मोदी-विरोधी या मोदी-समर्थक) वीडियो देखता है, तो एल्गोरिदम उसे उसी दिशा में इतना गहराई तक ले जाता है कि उसकी पूरी धारणा बदल जाती है। यह तकनीकी प्रक्रिया हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को कट्टरता में बदल देती है। इसका परिणाम यह होता है कि जहाँ सोशल मीडिया हमें एक बंद कमरे (इको चैंबर) में रखता है, वहीं एल्गोरिदम उस कमरे की दीवारों को और मजबूत करता जाता है, जिससे बाहर की दुनिया की सच्चाई हमें दिखना बंद हो जाती है।
 
पहचान की राजनीति: जब नेता या संगठन अपनी सत्ता के लिए लोगों की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान को हथियार बनाते हैं तो वे अपने भाषणों, पोस्टरों, पर्चों और संगठन की गतिविधियों के माध्यम से लोगों का परसेप्शन बदलते हैं। 
 
विश्वास की कमी: जब समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद टूट जाता है और अफवाहें जगह ले लेती हैं। सच से ज्यादा अफवाहें ही लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती है। 
 
इसके परिणाम क्या होते हैं?
सहिष्णुता में कमी: लोग अलग विचार रखने वालों के प्रति आक्रामक हो जाते हैं फिर चाहे वह उनके परिवार का सदस्य हो या कार्य स्थलपर कार्य करने वाला सहकर्मी।
हिंसा का खतरा: ध्रुवीकरण अक्सर जोरदार बहस, लड़ाई-झगड़ा से आगे दंगों या नागरिक अशांति का कारण भी बनता है। 
लोकतंत्र की कमजोरी: जब संवाद बंद हो जाता है, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं ठीक से काम नहीं कर पातीं क्योंकि समझौते की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
 
संक्षेप में: ध्रुवीकरण एक ऐसी खाई है जो समाज को जोड़ने वाले पुलों को तोड़ देती है। जैसा कि हमने पिछले चर्चा में एशिया के संदर्भ में बात की थी, वर्तमान में यह "पहचान की जंग" का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि हम "अपनी पहचान बचाने" के नाम पर दूसरों को कितना स्वीकार करते हैं। यदि संवाद (Dialogue) हावी रहा तो परिणाम विकास होगा, और यदि अहंकार हावी रहा तो परिणाम अस्थिरता। 
 

5. वैश्विक ध्रुवीकरण: समाज और राजनीति का विखंडन:

एशिया: एशिया के संदर्भ में सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक संघर्ष विशेष रूप से जटिल हैं क्योंकि यह महाद्वीप दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं और सबसे विविध विचारधाराओं का घर है। यहाँ चल रहे संघर्षों ने अतित में कई नए देशों को जन्म दिया है और आने वाले समय में अब इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
 
'सॉफ्ट पावर' का पुनरुत्थान
आजकल युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि 'नैरेटिव' (Narrative) के माध्यम से लड़ा जा रहा है। जो संस्कृति अपनी भाषा, कला और मूल्यों को तकनीक के माध्यम से बेहतर ढंग से पेश करेगी, वह वैश्विक प्रभुत्व बनाए रखेगी। अंग्रेजी के साथ-साथ अब मंदारिन, हिंदी और स्पेनिश जैसी भाषाएं डिजिटल स्पेस में अपनी ताकत बढ़ा रही हैं।
 
भाषाई और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
वैश्वीकरण (Globalization) के जवाब में अब 'स्थानीयता' (Localization) पर जोर दिया जा रहा है। कई देश अपनी मूल भाषा और परंपराओं को बचाने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। यह विविधता को बचाने के लिए अच्छा है, लेकिन अगर यह 'अलगाववाद' में बदल जाए, तो वैश्विक व्यापार और कूटनीति में बाधा आ सकती है। एशिया में अंग्रेजी और मंदारिन के बढ़ते प्रभाव के बीच एशिया की हज़ारों स्थानीय भाषाएं लुप्त होने की कगार पर हैं।
 
इसके परिणाम स्वरूप कई समुदायों में अपनी भाषाई विरासत खोने का डर 'भाषाई राष्ट्रवाद' को जन्म दे रहा है। भारत जैसे देश में क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे तमिल, बंगाली, मराठी) को बढ़ावा देने की मांग इसी का हिस्सा है। यदि इसे सही ढंग से प्रबंधित नहीं किया गया, तो यह आंतरिक भाषाई संघर्षों को जन्म दे सकता है।
 
धार्मिक पहचान और राष्ट्रवाद का उदय
एशिया के कई देशों में धर्म को राष्ट्रीय पहचान के साथ जोड़ा जा रहा है। जैसे भारत में हिंदुत्व, मध्य-पूर्व में इस्लामी पहचान, और दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे म्यांमार और श्रीलंका) में बौद्ध राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ़ा है। इससे बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे अल्पसंख्यकों के साथ तनाव बढ़ने और सामाजिक ताने-बाने के टूटने का खतरा भी बढ़ गया है। 
 
चीन का सांस्कृतिक और भाषाई प्रभुत्व
चीन अपनी 'सॉफ्ट पावर' और 'मंदारिन' भाषा के माध्यम से पूरे एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
परिणाम: दक्षिण-पूर्व और मध्य एशिया के देशों में चीनी भाषा और संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके जवाब में वियतनाम, जापान और फिलीपींस जैसे देश अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता को बचाने के लिए अधिक मुखर हो रहे हैं। यह 'सांस्कृतिक प्रतिरोध' भविष्य में कूटनीतिक तनाव का कारण बन सकता है।
 
भारत बनाम चीन: वैचारिक संघर्ष
एशिया के दो सबसे बड़े देश अलग-अलग मॉडलों का प्रतिनिधित्व करते हैं- एक तरफ लोकतांत्रिक विविधता (भारत) है और दूसरी तरफ एकदलीय केंद्रीकृत व्यवस्था (चीन)। इसके परिणाम स्वरूप एशिया के अन्य देश इन दोनों में से किसी एक मॉडल की ओर झुक सकते हैं। यदि भारत अपनी लोकतांत्रिक साख और सांस्कृतिक विविधता को सफलतापूर्वक बनाए रखता है, तो वह पूरे एशिया के लिए एक 'सॉफ्ट पावर' का केंद्र बनेगा।
 

6. अंत में क्या होगा भविष्य?

एशिया में इस संघर्ष का परिणाम 'संवाद' पर निर्भर करेगा। 'सिल्क रोड' जैसी प्राचीन परंपराओं की तरह, यदि व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला, तो परिणाम सुखद होंगे, अन्यथा आंतरिक अस्थिरता, युद्ध और विभाजन जैसी चीजें विकास को बाधित करती रहेगी और लोगों का जीवन संकट में डालती रहेगी।
 
इतिहास गवाह है कि बड़े संघर्षों के बाद अक्सर 'सहमति' का दौर आता है। यदि मानवता इस सांस्कृतिक घर्षण से यह सीख ले कि विविधता कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है, तो परिणाम एक "बहु-ध्रुवीय विश्व" होगा जहाँ कोई एक संस्कृति श्रेष्ठ नहीं होगी, बल्कि सब सह-अस्तित्व में रहेंगी। यदि एशिया के देश अपनी विविधता को स्वीकार कर 'विविधता में एकता' के मंत्र पर चलते हैं, तो यह महाद्वीप 21वीं सदी में दुनिया का नेतृत्व करेगा। 

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