Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

बंगाल की राजनीति का ‘रक्तचरित्र, 'पोरिबोर्तन' या प्रतिशोध?

Advertiesment
West Bengal political violence
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'सत्ता परिवर्तन' शब्द मात्र एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक हिंसक अनुष्ठान बन चुका है। दशकों से बंगाल की माटी ने मतपेटियों के साथ-साथ बारूद की गंध और अपनों का रक्त भी देखा है। आज जब राज्य एक बार फिर वैचारिक और चुनावी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, तो सवाल यह उठता है कि क्या बंगाल में 'पोरिबोर्तन' (परिवर्तन) की इबारत हमेशा रक्त से ही लिखी जाएगी?

हिंसा का विरासत मॉडल: एक ऐतिहासिक निरंतरता

बंगाल का राजनीतिक 'रक्तचरित्र' नया नहीं है। यह एक ऐसी विरासत है जो सत्ता के केंद्रों के साथ हस्तांतरित होती रही है, पश्चिम बंगाल में चुनावी परिणाम अक्सर मतगणना केंद्रों पर खत्म नहीं होते। कई बार वे सड़कों, पार्टी कार्यालयों और गांवों की गलियों में हिंसा की नई पटकथा लिखते हैं। बंगाल की राजनीति में ‘पोरिबोर्तन’ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लंबे समय से एक रक्तरंजित राजनीतिक संक्रमण का पर्याय बनता गया है।


कांग्रेस से वामपंथ: 60 और 70 के दशक का नक्सलबाड़ी आंदोलन और फिर सिद्धार्थ शंकर राय के दौर की हिंसा ने राजनीतिक विरोध को 'शारीरिक उन्मूलन' (Physical Elimination) में बदल दिया।

वामपंथ का 'काडर राज': 34 वर्षों के शासन में वामपंथियों ने हिंसा को संस्थागत रूप दिया। मरीचझापी से लेकर नंदीग्राम और सिंगूर तक, सत्ता को बचाए रखने के लिए बल प्रयोग को एक जायज हथियार माना गया।

ममता का 'खेला' और भाजपा का उत्कर्ष: 2011 में जब ममता बनर्जी ने 'मां, माटी, मानुष' का नारा दिया, तो लगा कि हिंसा थमेगी। लेकिन, सत्ता का व्याकरण नहीं बदला। आज भाजपा की प्रचंड जीत और उसके बाद की चेतावनियों के बीच वही पुराना चक्र फिर से घूम रहा है।

विचारधारा का 'मस्कुलराइजेशन'

हालिया वर्षों में बंगाल की राजनीति का स्वरूप और अधिक आक्रामक हुआ है। अब यह केवल दो दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि दो भिन्न 'पहचानों' का टकराव बन गया है। एक ओर 'सबआल्टर्न' हिंदुत्व की राजनीति है जो सुवेन्दु अधिकारी जैसे नेताओं के माध्यम से घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव को अस्तित्व का खतरा बताती है।

दूसरी ओर, वह क्षेत्रीय अस्मिता है जो खुद को बचाने के लिए आक्रामक रुख अपनाती है। जब राजनीतिक विमर्श में "सबक सिखाना", "इजरायल जैसा जवाब" और "बाहर खदेड़ना" जैसे शब्दों का प्रयोग होने लगता है, तो लोकतंत्र की शब्दावली पराजित हो जाती है और 'रक्तचरित्र' प्रभावी हो जाता है।

'पुश-इन' और सीमावर्ती कूटनीति का संकट

बौद्धिक स्तर पर देखें तो बंगाल की हिंसा अब केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है। बांग्लादेशी विदेश मंत्री की हालिया चेतावनी यह दर्शाती है कि बंगाल का आंतरिक राजनीतिक संघर्ष अब एक भू-राजनीतिक तनाव केंद्र (Geopolitical Flashpoint) बन चुका है। जब घरेलू चुनावी वादों (जैसे 1 करोड़ लोगों को बाहर करना) का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ता है, तो राज्य की हिंसा 'डिप्लोमैटिक वॉर' में बदल सकती है।

क्या "पोरिबोर्तन" केवल चेहरों का है?

बंगाल की त्रासदी यह है कि यहाँ शासन बदल जाता है, लेकिन शासन करने की पद्धति (Methodology) नहीं बदलती। वोटर लिस्ट से नाम हटाना, 90 लाख नामों का कटना, जिसमें एक बड़ा हिस्सा एक विशेष समुदाय का है, इसे कुछ लोग 'सफाई' कह रहे हैं तो कुछ 'लोकतांत्रिक हत्या'।

“भाजपा नेतृत्व का दावा है कि वह दशकों पुराने कैडर राजको समाप्त कर लोकतांत्रिक स्पेस बहाल कर रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस आरोप लगाती है कि भाजपा की राजनीति बंगाल की सामाजिक संरचना को ध्रुवीकरण की ओर धकेल रही है।“

ज़मीनी कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक हिंसा का प्रतिशोध : राजनीति यहाँ 'जीतो और राज करो' के बजाय 'जीतो और नष्ट करो' के सिद्धांत पर चलने लगी है। नतीजों के कुछ ही घंटों के भीतर हत्याओं का दौर शुरू हो गया, जिसने चुनावी शुचिता को तार-तार कर दिया है।

कार्यकर्ताओं की बलि : हावड़ा में भाजपा कार्यकर्ता जादव बार और उत्तर 24 परगना में मधु मोंडल की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। वहीं बीरभूम में टीएमसी समर्थक आबीर शेख की हत्या और भांगड़ में ISF द्वारा की गई तोड़फोड़ ने साबित किया कि हिंसा सर्वव्यापी है।


हाई-प्रोफाइल मर्डर: 6 मई की रात बारासात में सुवेन्दु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या, नई सत्ता के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती और सीधी चेतावनी बनकर उभरी है।

लोकतंत्र या प्रतिशोध का नया व्याकरण?

भाजपा नेतृत्व द्वारा शांति की बार-बार की गई अपीलों के बावजूद जमीनी हकीकत भयावह है। बंगाल का 'रक्तचरित्र' यह बताता है कि यहाँ शासन तो बदल गया है, लेकिन 'राजनैतिक शत्रु' को पूरी तरह मिटा देने की मानसिकता आज भी बरकरार है। कई नगर निकायों में जबरन ताले लटकाकर भाजपा के झंडे फहराना यह दर्शाता है कि अब सत्ता का व्याकरण 'डायलॉग' से नहीं बल्कि 'डिक्टेशन' से तय हो रहा है।

यदि "पोरिबोर्तन" का अर्थ केवल एक दल के गुंडों की जगह दूसरे दल के बाहुबलियों का आना है, और यदि लोकतंत्र की जीत बुलडोजर की गड़गड़ाहट और गोलियों की तड़तड़ाहट से तय होनी है, तो बंगाल की माटी कभी शांति का स्वाद नहीं चख पाएगी। क्या यह जीत वास्तव में जनता की है, या यह केवल 'रक्तचरित्र' के एक नए और अधिक हिंसक अध्याय की शुरुआत है? यह प्रश्न आज हर उस बंगाली के मन में है जो शांतिपूर्ण भविष्य का सपना देख रहा है।

यदि बंगाल को वास्तव में 'पोरिबोर्तन' की आवश्यकता है, तो वह केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी बदलने से नहीं आएगा। वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब बंगाल की राजनीति अपने 'रक्तचरित्र' का त्याग करेगी।
लोकतंत्र में जीत का अर्थ 'प्रतिशोध का लाइसेंस' नहीं होना चाहिए। यदि सत्ता परिवर्तन की कीमत सामाजिक ताने-बाने का बिखराव और पड़ोसियों से युद्ध जैसी स्थिति है, तो यह 'पोरिबोर्तन' भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। क्या बंगाल कभी मतपत्रों की गरिमा को गोलियों की गूँज से ऊपर रख पाएगा? यह प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

पहलगाम हमले से ऑपरेशन सिंदूर तक, पहली बरसी पर जानिए पूरा घटनाक्रम