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Saphala ekadashi: सफला एकादशी 2025: व्रत, नियम और पारण का शुभ मुहूर्त

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WD Feature Desk

, सोमवार, 15 दिसंबर 2025 (09:22 IST)
Saphala ekadashi: सफला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसे मोक्ष और सौभाग्य प्रदान करने वाला माना जाता है। वर्ष 2025 में इस पवित्र तिथि से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां और पालन किए जाने वाले आवश्यक नियम नीचे दिए गए हैं। सफला एकादशी का व्रत 15 दिसंबर 2025 सोमवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन व्रत रखने से मानसिक, शारीरिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है, साथ ही यह जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करता है। हिंदू धर्म में सफला एकादशी एक विशेष दिन होता है, जिसे प्रत्येक साल पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से उपवास रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने का महत्व है।
 
एकादशी तिथि का आरम्भ: 14 दिसम्बर 2025, शाम 06:49 बजे
एकादशी तिथि की समाप्ति: 15 दिसम्बर 2025, रात 09:19 बजे
पारण (व्रत तोड़ने की) तिथि: 16 दिसम्बर 2025, मंगलवार
द्वादशी समाप्ति समय: 16 दिसम्बर 2025, रात 11:57 बजे
 
पारण (व्रत खोलने) का शुभ मुहूर्त
एकादशी व्रत का समापन यानी 'पारण', व्रत के अगले दिन सूर्योदय के उपरान्त ही किया जाता है।
पारण का शुभ समय: 16 दिसम्बर को प्रातः 07:07 ए एम से 09:11 ए एम तक।
 
व्रत पारण के आवश्यक नियम: 
द्वादशी तिथि: पारण करना व्रत का एक अभिन्न अंग है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना अति आवश्यक माना गया है। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले व्रत न खोलना पाप के समान माना जाता है।
 
हरि वासर से बचाव: व्रत तोड़ने के लिए सबसे पहले 'हरि वासर' समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है। इस समय में पारण करना वर्जित है।
 
उत्तम समय: व्रत तोड़ने का सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।
 
मध्याह्न से परहेज: श्रद्धालुओं को मध्याह्न (दोपहर) के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। यदि किसी कारणवश प्रातःकाल में पारण संभव न हो, तो उसे मध्याह्न के बाद ही व्रत खोलना चाहिए।
 
द्विदलीय एकादशी का नियम (दो दिन का व्रत): द्विदलीय एकादशी: कभी-कभी एकादशी तिथि लगातार दो दिनों तक रहती है, जिसे 'द्विदलीय एकादशी' कहते हैं।
 
स्मार्त और गृहस्थ: जो लोग गृहस्थ जीवन से जुड़े हैं, उन्हें पहले दिन एकादशी का व्रत करना चाहिए।
 
दूजी एकादशी: एकादशी के दूसरे दिन को दूजी एकादशी कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष की तीव्र इच्छा रखने वाले भक्तों के लिए निर्धारित है।
 
वैष्णव एकादशी: जब दो दिन एकादशी होती है, तो दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी प्रायः एक ही दिन पड़ती हैं।
 
परम भक्ति: जो भक्त भगवान विष्णु का अखंड प्रेम और स्नेह पाना चाहते हैं, उन्हें दोनों ही दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।
 

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