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Book Review : .मैं जया हूं...

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डॉ. छाया मंगल मिश्र

बेटियां जब रचती हैं, सृजन करतीं हैं तो दिल बसंत और उमंग सावन हो जाती हैं। भतीजी जया ने भी मनोयोग से जीवन के सभी रंगों को समाहित कर पन्नों पर फाग के रंग बिखेर दिए हैं। उसकी तीसरी पुस्तक मैं जया हूं में उसने अपने विचारों के समुद्र में आध्यात्म की लहरों को समेटने का निश्छल प्रयास किया है।
 
उपनिषद कहते है-चरैवेति, चरैवेति अर्थात् चलते रहो। चलते रहने का नाम जीवन है। हर स्थिति और परिस्थिति में आगे ही बढ़ते जाने का नाम जीवन है। जीवन की इस जगत में माया जगदीश ने रची है। कहते हैं चिकित्सक, वैद्य, डॉक्टर धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप हैं इसी नाते वे इस जीवन,जगत् और जगदीश के रहस्यों को ज्यादा करीब से देखते समझते हैं। इसी अहसास को जया ने इस पुस्तक में साझा किया है।
 
हमारे जन्म से मृत्यु के बीच की कालावधि ही जीवन कहलाती है जीवन का तात्पर्य अस्तित्व की उस अवस्था से है जिसमे वस्तु या प्राणी के अन्दर चेष्टा, उन्नति और वृद्धि के लक्षण दिखायी दें. अगर कोई वस्तु चेष्टारहित है तो फिर उसे सजीव या जीवनयुक्त नहीं माना जाता है। प्रथम भाग इसी जीवन आशाओं से जुड़ी 28 कविताओं का संकलन है।
 
दूसरे खंड में जगत अर्थात् संसार; विश्व; दुनिया, पृथ्वी का वह खंड जिसमें जीव निवास करते हैं, चेतना-संपन्न सृष्टि, किसी विशिष्ट प्रकार के कार्य-क्षेत्र अथवा उसमें रहनेवाले जीवों, पिंडों आदि का वर्ग या समूह, संसार में रहने वाले लोग, किसी के वे सभी अनुभव जो यह निर्धारित करते हैं कि उसको वस्तुएं कैसी दिखाई देती हैं या प्रतीत होती हैं। वह लोक जिसमें हम प्राणी रहते हैं, संसार या भूमंडल का वह भाग जो विशेषकर अलग समझा जाता है। पृथ्वी का वह खंड जिसमें जीव निवास करते है, चेतना-संपन्न सृष्टि, किसी विशिष्ट प्रकार के कार्य-क्षेत्र से संबद्ध जीवों का समूह या वर्ग. चेतन; जागता हुआ; सचेत को लेकर 24 कविताएं रचीं है।
 
और उसके तीसरे खंड में जगदीश में आध्यात्म का कलश है जिसमें प्रभु के प्रति समर्पण, आस्था, भक्ति, विनय और शक्ति का जल छलकता है। जगदीश, ईश्वर, प्रभु, पालनहार, ब्रह्मा-विष्णु-महेश अपनी शक्ति-संगिनी संग जब जगतजीवों की सृष्टि का ताना-बना बुनते हों, उनकी महिमा शब्दों से परे है. भाव-भक्ति से ही हम उन्हें इस अमूल्य जीवन के प्रति आभार प्रकट कर सकते हैं। बस जया ने भी अपनी 13 कविता हम सभी जीवन की ओर से इस जगत में रहने वालों की सुख शांति की प्रार्थना स्वरूप हमारे जगदीश के चरणों में इस पुस्तक के रूप में की है।
 
“डॉ.जया अग्निहोत्री मिश्रा किसी परिचय की मोहताज नहीं। मन की सुंदर भावनाओं से दमकती जया की खूबसूरती को उसकी विनम्रता और प्यार भरी मिलनसारिता चार चाँद लगा देती है। मेरी भतीजी है इसलिये नहीं बल्कि उसमें भी जीवन, जगत् और जगदीश के अंश साक्षात् नजर आते हैं तभी तो अपनी पहचान बना पाई है... वह कह पाई है... मैं जया हूं...मैं जया हूं...मैं जया हूं...

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