हिन्दी कविता : बड़े खुश हैं हम...

सुशील कुमार शर्मा
बादल गुजर गया लेकिन बरसा नहीं, 
सूखी नदी हुआ अभी अरसा नहीं,
धरती झुलस रही है लेकिन बड़े खुश हैं हम।


 
नदी बिक रही है बा-रास्ते सियासत के,
गूंगे-बहरों के शहर में बड़े खुश हैं हम।
 
न गोरैया न दादुर न तीतर बोलता है अब,
काटकर परिंदों के पर बड़े खुश हैं हम।
 
नदी की धार सूख गई सूखे शहर के कुएं,
तालाब शहर के सुखाकर बड़े खुश हैं हम। 
 
पेड़ों का दर्द सुनना हमने नहीं सीखा,
काटकर जिस्म पेड़ों के बड़े खुश हैं हम।
 
ईमान पर अपने कब तलक कायम रहोगे तुम, 
बेचकर ईमान अपना आज बड़े खुश हैं हम।
 
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