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नई कविता : मगरूर

देवेन्द्र सोनी
आते हैं जब 
इस दुनिया में हम
कितने सहज, सौम्य और 
निश्छल होते हैं।
 
धीरे-धीरे होते हैं प्रभावित
और अपनाने लगते हैं 
उस वातावरण को 
जो कराता है हमसे मनमानी
बनाता है क्रमश: हमको मगरूर।
 
सिखाने लगता है
दुनियादारी और
बोने लगता है 
मन में हमारे 
बीज मगरूरता के
करते रहने को मनमानी।
 
हां, हर कहीं भी नहीं पनपते हैं 
मगरूरता और मनमानी के ये बीज 
इन्हें चाहिए होता है
वह खाद-पानी भी 
जो मिल जाता है आसानी से
हमारे ही आस-पास के परिवेश में।
 
बदलते युग में मिल रही
मनचाही सुविधाएं भी
एक बड़ा कारण होता है
मगरूर और मनमौजी होने का हमारे
उन सबके बीच जो
वंचित हैं इन सुविधाओं से।
 
मगरूर या मनमर्जी के होना
कोई अच्छी निशानी नहीं है
व्यक्तित्व के हमारे
मगर करते कहां हैं 
परवाह हम इसकी।
 
यही लापरवाही, अनदेखी
कर देती है हमारे अंदर 
मगरूर और मनमर्जी के 
पेड़ को इतना बड़ा
कि जब वह होता है फलित तो
देने लगता है ऐसे विषैले फल
जो करते हैं, केवल और केवल
हमारा ही संहार।
 
सोचना और लाना होगा 
वह परिवर्तन जो 
बचा दे हमको 
मगरूरता या मनमर्जी के इस पेड़ से 
और सफल कर दे, 
जीवन हमारा।

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