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हिन्दी कविता : कहर बरसना चाहिए इन आर्थिक लुटेरों पर...

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poem on Economy
'उनका' संकल्प है कि भेजकर ही रहेंगे वे,
हर भ्रष्टाचारी को जेल की सलाखों में।
जिन्होंने अर्जित की है अनाप-शनाप संपत्ति,
झोंक कर धूल प्रशासन की/कानून की आंखों में।।1।।
 
खूब किया उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग,
धज्जियां उड़ा कर जनता के विश्वास की।
फिर भी आज तक वे बने रहे 'माननीय',
करके इंतिहा मर्यादा/नैतिकता के उपहास की।।2।।
 
करते रहे इस भोले देश के साथ वे धोखा,
देखिए तो! उनकी संपत्तियों का है न ओर-छोर।
अब तक बने रहे दूध के धुले वे, अग्रगण्य,
चिल्ला-चिल्ला कर नए पदधारियों के लिए 'चोर-चोर'।।3।।
 
अब खुल रही है कलाई उन सब की,
बड़े-बड़े धुरंधर वकील भी न दिला पाए उन्हें जमानत। 
मानो या न मानो, भोले जन-मन की कसैली हाय,
अंततः बरपाएगी इन लुटेरों पर घोर कयामत।।4।।
 
कौन हैं, कितने हैं, कहां-कहां पर छुपे हैं ये,
निश्चय ही ढूंढ लेंगे इन्हें कानून के लंबे हाथ।
ये सफेद-पोश डाकू हैं, अर्थव्यवस्था के घुन,
नहीं होनी चाहिए कोई रियासत/मुरव्वत इनके साथ।।5।।

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